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लोगों की मकान की ज़रूरत क्यों नहीं पूरी कर पा रहा है जर्मनी?- दुनिया जहान
इस साल सितंबर में जर्मनी के चांसलर ओलाफ़ शोल्ज़ ने देश में मकानों की किल्लत पर गहरी चिंता व्यक्त की थी.
उनकी सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी ने चुनाव के दौरान वादा किया था कि उनकी सरकार देश में नये मकानों की किल्लत से निपटने के लिए प्रति वर्ष चार लाख मकान बनवाएगी.
सितंबर 2023 में सरकार का आधा कार्यकाल पूरा हो गया लेकिन वो अपने लक्ष्य से बहुत दूर रह गई.
यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में अब कंस्ट्रक्शन यानि भवन निर्माण क्षेत्र में दशकों में सबसे बड़ी गिरावट आई है.
इस समस्या से निपटने के लिए चांसलर ओलाफ शोल्ज़ ने कंस्ट्रक्शन क्षेत्र से जुड़े प्रमुख लोगों के साथ एक आपात बैठक की है.
हम इस सप्ताह दुनिया जहान में यह जानने की कोशिश करेंगे कि आख़िर जर्मनी पर्याप्त संख्या में मकान क्यों नहीं बना पा रहा है?
लक्ष्य से दूर है सरकार
जर्मनी के प्रॉपर्टी बिल्डर यानि भवन निर्माता संघ के प्रमुख डर्क सालेवस्की ने बीबीसी के साथ एक इंटरव्यू में कहा कि सरकार अपने लक्ष्य से बहुत दूर है.
''सरकार ने सालाना चार लाख मकान बनवाने का लक्ष्य रखा था. लेकिन सालाना ढाई लाख मकान ही बन पा रहे हैं और यह संख्या लगातार तेज़ी से कम हो रही है. पिछले साल के मध्य में इस समस्या की गंभीरता का पता चला. उस समय बिक्री बिल्कुल रुक गयी. अब धीरे धीरे मकानों की बिक्री शुरू हो रही है.''
इस साल की शुरुआत में सैकड़ों कंस्ट्रक्शन कंपनियां दिवालिया हो गईं. इस उद्योग में इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, आर्किटेक्ट से लेकर मज़दूरों तक कई किस्म के लोग काम करते हैं. डर्क सालेवस्की कहते हैं एक मकान बनाने में 42 विभागों के अलग-अलग हुनर वाले लोग काम करते हैं. यह जर्मनी की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. ऐसे ही कुछ अन्य कारण भी हैं जिसकी वजह से कई देशों की अर्थव्यवस्था कमज़ोर हो रही है.
डर्क सालेवस्की ने बताया कि पहले कोरोना वायरस और फिर युद्ध का अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ा है. मकानों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली हर चीज़ महंगी होती गई है. मिसाल के तौर पर इस्पात की कीमत चार गुना बढ़ गई है.
ब्याज दर में वृद्धि का भी कई तरह के व्यापारों पर असर पड़ा है. डर्क सालेवस्की कहते हैं कि पहले ब्याज दर एक प्रतिशत होती थी जो बढ़ कर अब चार से पांच प्रतिशत तक पहुंच गई है. अब लोगों के लिए मकान बनाने के लिए इस ब्याज दर पर कर्ज़ लेना मुश्किल हो गया है. कई प्रोजेक्ट बंद कर दिए गए और नए प्रोजेक्ट शुरू नहीं किए जा रहे हैं. वहीं भवन निर्माण संबंधी नियम और सरकारी प्रक्रियाओं की वजह से दिक्कत और बढ़ रही है.
इमारतें बनाने के लिए ज़मीन तैयार करने की मंज़ूरी लेने में दो साल से बीस साल तक का समय लग जाता है. यह प्रक्रिया डिजिटल नहीं है. सबकुछ कागज़ पर होता है और दस्तावेज़ों को तैयार करके मंज़ूरी लेने में अधिक समय लगता है. यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद उस ज़मीन पर बनने वाली हर इमारत के लिए अलग से मंज़ूरी लेनी पड़ती है.
डर्क सालेवस्की कहते हैं, ''जर्मनी में सोलह राज्य हैं और हर राज्य के नियम भवन निर्माण संबंधी क़ानून भी अलग हैं. अगर आपके पास बर्लिन में मकान बनाने का अच्छा नक़्शा और प्लान है तो ज़रूरी नहीं कि उसके मुताबिक आप म्यूनिख़ में भी मकान बना लें. आप को जिस शहर में मकान बनाने हैं उसके दिशा-निर्देशों और नियमों के अनुसार प्लान बना कर मंज़ूरी लेनी पड़ती है. एक ही शहर में एक जैसी दूसरी इमारत बनाने के लिए भी नए सिरे से मंज़ूरी लेनी होती है. और पूरी प्रक्रिया शुरू से करनी पड़ती है.''
इस प्रक्रिया में छह महीने से तीन साल तक लग सकते हैं. इसके बाद ही इमारत का निर्माण शुरू हो सकता है. लेकिन कई बार मंज़ूरी मिलने में इतना समय लग जाता है कि बिल्डरों के हालात बदल जाते हैं और उनके पास निर्माण के लिए धन उपलब्ध नहीं रहता.
पिछले साल के पहले छह महीनों की तुलना में इस वर्ष के पहले छह महीनों में मंज़ूरी प्राप्त इमारतों के निर्माण में बड़ी कमी देखी गई है. अनुमान है कि आने वाले महीनों में इसमें और गिरावट आएगी. इस दौरान सस्ते मकानों की मांग लगातार बढ़ रही है.
डर्क सालेवस्की ने कहा, ''2021 में हमारी आबादी आठ करोड़ थी जो अब बढ़ कर आठ करोड़ चालीस लाख हो गई है. पिछले साल यूक्रेन से पंद्रह लाख लोग यहां आए हैं. यूक्रेन के अलावा दूसरे देशों से भी लोग जर्मनी आ रहे हैं और बड़े शहरों में बस रहे हैं, इसलिए हमें तेज़ी से मकान बनाने होंगे.''
ताज़ा अनुमान के अनुसार जर्मनी में और सात लाख मकानों की ज़रूरत है. हाल में जर्मनी के चांसलर ने निर्माण क्षेत्र की कंपनियों के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात की. उसी दिन सरकार ने निर्माण संबंधी कई नियमों में ढील देने और आने वाले चार सालों के लिए समाज कल्याण योजनाओं पर 19 अरब यूरो खर्च करने की घोषणा की. यह केंद्र और ज़िला प्रशासन द्वारा प्रायोजित 47 अरब यूरो की लागत वाले प्रोजेक्ट का हिस्सा है. मगर क्या यह कदम उद्योग में नई जान फूंक पाएगा? केवल जर्मनी ही नहीं यह समस्या यूरोप के दूसरे देशों के सामने भी है.
यूरोप की आवास समस्या
हाउसिंग यूरोप नाम की संस्था की शोधकार्य निदेशक एलिस पटीनी का मानना है कि जर्मनी में आवास की समस्या पर और देशों को भी नज़र रखनी चाहिए क्योंकि ऐसी ही स्थिति यूरोप में डेनमार्क, ऑस्ट्रिया, फ़्रांस और दूसरे देशों में भी पनप रही है. इसकी एक वजह यह है कि धन की कमी के कारण सोशल हाउसिंग यानि कम आय वाले लोगों के लिए सस्ते मकानों के प्रोजेक्ट घटते जा रहे हैं.
वो कहती हैं, ''कई दशकों से गरीबों के लिए सस्ते मकानों के निर्माण में कमी आती गई है. अब मकानों की किल्लत की समस्या गंभीर होती जा रही है. ख़ासतौर पर यूरोप के शहरी इलाकों में यह साफ़ दिखाई दे रहा है. ब्रसेल्स में तीन साल पहले 49 हज़ार परिवारों ने सस्ते मकानों के लिए रजिस्टर किया था. अब यह संख्या बढ़ कर 52 हज़ार हो गई है. ताज़ा शोधकार्यों के अनुसार बेघर लोगों की तादाद 30 प्रतिशत बढ़ गई है.''
नए मकान बनाना ही इस समस्या का समाधान है. कई देशों में ख़ाली पड़े मकानों की मरम्मत करा के उन्हें ज़रूरतमंद लोगों को दिया जा सकता है, लेकिन उसके लिए भी धन की ज़रूरत होगी. सस्ते मकान बनाने की व्यापक योजनाओं को अंजाम देने में तीस से चालीस साल लग सकते हैं. इस क्षेत्र में आर्थिक निवेश और स्थिरता लाना अत्यंत आवश्यक है. इसी महीने जर्मनी ने भवन निर्माण संबंधी कुछ नियमों को स्थगित करने का फ़ैसला किया है.
पटीनी ने कहा, ''नीति में इस प्रकार का लचीलापन ज़रूरी है. 2015 में सीरिया से बड़ी संख्या में शरणार्थियों के यूरोप पहुंचने के बाद यह समस्या गहरी हो गई और डेनमार्क जैसे देशों ने इस कारण पैदा हुई आवासीय समस्या से निपटने के लिए मकान बनाने संबंधी कई नियमों में अस्थायी तौर पर ढील दी. मगर इन मकानों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री का पर्यावरण पर जो असर पड़ेगा उसे भी ध्यान में रखने की ज़रूरत है.''
एलिस पटीनी की राय है कि कुछ देश इस समस्या से बेहतर तरीके से निपट रहे हैं. मिसाल के तौर पर फ़्रांस और डेनमार्क ने पिछले दस सालों में इस क्षेत्र में निरंतर निवेश किया है. सस्ते मकानों की किल्लत के बावजूद इस क्षेत्र में कुछ अच्छे बदलाव भी आए हैं.
वो कहती हैं, ''यूरोप में मकान बनाने में इस्तेमाल होने वाले सामान की कीमत में गिरावट आई है. लेकिन इसके बावजूद आने वाले कुछ सालों में यूरोप में मकानों की किल्लत की समस्या बढ़ सकती है.''
इसकी एक वजह है निर्माण क्षेत्र में मज़दूरों की कमी. एलिस पटीनी की राय है कि कोविड महामारी के प्रभाव से कई कंस्ट्रक्शन कंपनियां दिवालिया हो गई थीं. वहां काम करने वाले मज़दूर दूसरे क्षेत्र में चले गए जिस कारण अब कुशल मज़दूरों की कमी हो गई है.
जर्मनी ने क्या ग़लतियां कीं
डब्लिन यूनिवर्सिटी कॉलेज में सामाजिक नीति की प्रोफ़ेसर मिशेल नॉरिस की राय है कि कंस्ट्रक्शन उद्योग में आयरलैंड ने भी जर्मनी की ग़लतियों को दोहराया. जर्मनी में भी कम आय के लोगों के लिए सस्ते मकान बनाने के ठेके निजी कंपनियों को दिए गए थे, लेकिन उन मकानों की मिलकियत बाद में भी इन कंपनियों के पास ही रही. सस्ते मकानों के निर्माण का निजीकरण आयरलैंड में भी हुआ था. 2008 के आर्थिक संकट के बाद बैंकों से इन प्रॉजेक्ट को कर्ज़ मिलना बहुत कम हो गया था.
बीबीसी से उन्होंने कहा, ''यहां मकानों कीमत गिरना शुरू हो गई. और मकानों के लिए दिए गए कर्ज़ की ब्याज दर और किश्त बढ़ने लगी. बैंक आर्थिक समस्याओं में घिर गए. आबादी बढ़ती गई लेकिन नए मकानों का निर्माण घटता गया. जब प्रॉपर्टी मार्केट में तेज़ी थी तब सालाना सत्तर हज़ार नए मकान बनते थे और आर्थिक संकट के बाद उनकी संख्या गिर कर सालाना दस हज़ार तक रह गई.''
जर्मनी की तरह आयरलैंड सरकार ने भी प्रतिवर्ष 30 हज़ार नए मकान बनवाने का लक्ष्य रखा है. इसके तहत निजी मकान और ग़रीबों के लिए सस्ते मकान भी शामिल होंगे.
मिशेल नॉरिस कहती हैं, ''बहुत से लोग मानते हैं कि यह लक्ष्य बहुत छोटा है. सरकार ने भवन निर्माण आयोग का गठन किया था जिसने यह सुझाव दिया था कि देश को प्रतिवर्ष कम से कम साठ हज़ार नए मकानों की ज़रूरत होगी. साथ ही कई कंपनियां भी सरकार से आग्रह कर रही हैं कि वो नए मकानों की संख्या बढ़ाए क्योंकि मकानों की किल्लत की वजह से डब्लिन जैसे शहर में मकान के किराए आसमान छू रहे हैं जिस वजह से कई कंपनियों के लिए कुशल अंतरराष्ट्रीय श्रमिकों को आकर्षित करना और नौकरी पर रखना मुश्किल हो रहा है.''
स्थिति की गंभीरता के मद्देनज़र आयरलैंड की सरकार ने कंस्ट्रक्शन क्षेत्र में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया है. सरकार ने विदेशी निवेशकों के साथ मिल कर कई आवास योजनाओं को ख़ुद अंजाम देना और प्रॉपर्टी डेवलपरों को आर्थिक सहायता देना शुरू किया है.
मिशेल नॉरिस बताती हैं, ''सरकार ने हाल में एक बड़ी योजना शुरू की है जिसके तहत कंस्ट्रक्शन कंपनियों को ऐसे प्रोजेक्ट पूरे करने के लिए आर्थिक सहायता दी जा रही है जो उनके लिए फ़ायदेमंद नहीं हों. बदले में उन्हें वो मकान ख़रीदारों को सौंपने होंगे. पहली बार कंस्ट्रक्शन उद्योग को सीधे सब्सिडी दी जा रही है. यह इसलिए भी कुछ चौंकाने वाला कदम है क्योंकि 15 साल पहले कई लोग इन कंस्ट्रक्शन कंपनियों को आर्थिक मंदी के लिए ज़िम्मेदार मान रहे थे.''
आयरलैंड सरकार के हाल के फ़ैसलों से पता चलता है कि वो मकानों की किल्लत की समस्या से कितनी चिंतित है. आइये एक बार फिर जर्मनी का रुख़ करते हैं.
उतार-चढ़ाव का दौर
जर्मनी में कई बार आर्थिक क्षेत्र और उसके साथ साथ कंस्ट्रक्शन उद्योग में उछाल और फिर गिरावट के दौर आए हैं. इस उतार-चढ़ाव के बारे में हमने बात की येन्स बॉयसन हूग्रीफ़ से जो कील इंस्टिट्यूट फॉर वर्ल्ड इकॉनमी में वरिष्ठ अर्थशास्त्री हैं. उनका अनुमान है कि यह समस्या आने वाले समय में और कठिन हो जाएगी.
बर्लिन की दीवार के ढहने के कुछ महीने बाद अक्तबूर 1990 में सोवियत संघ के कब्ज़े वाले पूर्वी जर्मनी और पश्चिम जर्मनी का एकीकरण हुआ. इसके बाद पूर्वी जर्मनी के इलाकों में आवासीय इमारतों और ढांचागत सुविधाओं के आधुनिकीकरण और सुधार के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की गई. इससे कंस्ट्रक्शन उद्योग में भारी तेज़ी आई.
येन्स बॉयसन हूग्रीफ़ कहते हैं, ''उस समय उद्योग में उछाल इतना तेज़ था कि बाद में मंदी भी बढ़ी रही. उसके बाद कंस्ट्रक्शन उद्योग में लगभग दस साल तक मंदी छाई रही. फिर 2008 के आर्थिक संकट के बाद भी कंस्ट्रक्शन उद्योग में काफ़ी उतार चढ़ाव आए.''
फ़िलहाल जर्मनी का कंस्ट्रक्शन उद्योग लगातार नीचे गिर रहा है. कंस्ट्रक्शन कंपनियां मकान बनाने के खर्च को कम करने की मांग कर रही हैं और साथ ही ट्रांसफ़र टैक्स यानि जब मकान बेचा जाता है तो उस रक़म पर लगने वाले टैक्स को कम करने की मांग कर रही हैं. जर्मनी में ट्रांसफ़र टैक्स अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक है.
येन्स बॉयसन हूग्रीफ़ ने बताया कि जर्मनी के हर राज्य में ट्रांसफर टैक्स अलग है. जर्मनी के राज्यों में इसकी दर 3.5 प्रतिशत से 6 प्रतिशत तक है. उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं लगता कि राज्य सरकारें इसे घटाने को तैयार होंगी क्योंकि इससे उनकी आय घटेगी. ऐसे में दूसरे तरीके ढूंढने होंगे. मिसाल के तौर पर मकानों की बिक्री को प्रोत्साहन देने के लिए आयकर में रियायत दी जा सकती है.
इस वर्ष सितंबर में चांसलर शोल्ज़ ने संसद में राज्य सरकारों से अपील की है कि वो मकान निर्माण के लिए लंबी प्रक्रिया को कम करें और लाल फ़ीताशाही ख़त्म करें. इससे मकानों के निर्माण की प्रक्रिया तेज़ हो जाएगी. लेकिन ऊंची ब्याज दर की समस्या का फ़िलहाल कोई हल नहीं है.
येन्स बॉयसन हूग्रीफ़ का अनुमान है कि प्रॉपर्टी बाज़ार की मंदी का दौर अब धीरे धीरे ख़त्म हो जाएगा. संभावना है कि आने वाले दो तीन सालों में ब्याज दर भी कम हो जाएं. लेकिन फ़िलहाल तो यह एक गंभीर समस्या है.
तो आख़िर क्या वजह है कि जर्मनी, पर्याप्त संख्या में मकान नहीं बना पा रहा है? मकान बनाने की बढ़ती कीमत और आर्थिक निवेश की कमी से कई कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट ठप्प हो गए. इसके साथ ही मंजूरी के लिए लंबी काग़जी प्रक्रिया भी एक बड़ी अड़चन है.
कई अरब यूरो के निवेश और नियमों में ढील देने से कंस्ट्रक्शन क्षेत्र में तेज़ी तो आएगी लेकिन कई प्रोजेक्ट जो अटके पड़े हैं उन्हें शुरू करने और नए प्रोजेक्ट तैयार कर के मकान बनाने में अभी काफ़ी समय लगेगा. यानि जर्मनी की इस समस्या को समाप्त होने में अभी काफ़ी समय लगेगा.
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