You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
एनआरआई को मतदान का अधिकार है या नहीं? क्या हैं मतदान के विकल्प?
दुनिया के दूसरे देशों में रह रहे भारतीय नागरिकों की मांग पर सरकार ने 2010 में उन्हें सशर्त वोटिंग का अधिकार दिया था.
इसके लिए सरकार ने रिप्रेजेंटेशन ऑफ़ पीपल्स एक्ट में संशोधन किया. लेकिन सरकार ने इसमें एक शर्त यह लगा दी कि एनआरआई को वोट डालने के लिए पोलिंग स्टेशन पर उपस्थित होना पड़ेगा.
अब एनआरआई इस बात की मांग कर रहे हैं कि वो जहां रह रहे हैं उन्हें वहीं से मतदान का अधिकार दिया जाए.
इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं लंबित हैं.
आइए जानते हैं अप्रवासी भारतीयों के वोटिंग अधिकार और उससे जुड़ी प्रक्रिया के बारे में.
क्या एनआरआई को मतदान का अधिकार है?
सरकार ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में संशोधन किया.
लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 2010 में भारत के ऐसे नागरिकों को मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने का अधिकारी मिला, जो किसी दूसरे देश में पढ़ाई, रोज़गार या किसी और वजह से रह रहे हैं और उन्होंने वहां की नागरिकता नहीं ली है.
एक जनवरी को 18 साल की आयु पूरी कर चुके ऐसे एनआरआई अपने निर्वाचन क्षेत्र से मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करा सकते हैं लेकिन इसके लिए उनके पासपोर्ट में भारत में उनका निवास स्थान का उल्लेख होना चाहिए.
ऐसे एनआरआई को मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करवाने के लिए फार्म 6 ए भरना ज़रुरी है. इस फार्म को ऑनलाइन भी भरा जा सकता है.
इसे चुनाव आयोग की वेबसाइट से डाउनलोड कर भरने के बाद संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (Electoral Registration Officer) को डाक के ज़रिए भी भेजा जा सकता है.
यह फार्म भारतीय दूतावासों से मुफ़्त में हासिल भी किया जा सकता है.
चुनाव आयोग की वेबसाइट पर आपको प्रत्येक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी का टेलीफ़ोन नंबर और पता मिल जाएगा.
मतदाता सूची में नाम आ जाने के बाद एनआरआई को मतदान का अधिकार मिल जाता है. मतदान के लिए ऐसे एनआरआई को अपने पासपोर्ट के साथ चुनाव के दिन मतदान केंद्र पर उपस्थित होना होता है.
अभी एनआरआई के लिए डाक के ज़रिए मतदान,भारतीय मिशनों में मतदान या ऑनलाइन वोटिंग का कोई प्रावधान नहीं है.
एनआरआई ऑनलाइन मतदान के लिए कैसे पंजीकरण करा सकते हैं?
चुनाव आयोग ने एनआरआई के लिए ऑनलाइन मतदान की सुविधा अभी शुरू नहीं की है.
पीआईबी पर छपी जानकारी के मुताबिक़ केंद्रीय बल में काम करने वाले शस्त्र एक्ट और सरकारी अधिकारी जो देश के बाहर दूतावासों में तैनात होते हैं उन्हें सर्विस वोटर के तौर पर वर्गीकृत किया गया है.
इन लोगों के लिए ऑनलाइन नामंकन का प्रावधान है और इन्हें इलेक्ट्रॉनिकली ट्रांसमिटेड पोस्टल बैलेट सिस्टम (ईटीपीबीएस) के ज़रिए मतदान करने की सुविधा दी गई है.
यह सुविधा तेज़ी से लोकप्रिय हो रही है.
पीआईबी के अनुसार साल 2019 के लोकसभा चुनाव में ईटीपीबीएस का उपयोग कर कुल 18,02,646 डाक मतपत्र इलेक्ट्रॉनिक रूप से भेजे गए थे.
इनमें से 10,84,266 ई-पोस्टल मत मिले. यानी जिन लोगों को डाक मतपत्र इलेक्ट्रॉनिक रूप से भेजे गए, उनमें से 60.14 फ़ीसद ने मतदान किया.
अप्रवासी भारतीयों की संख्या कितनी है?
भारत के बाहर रहने वाले भारतीय नागरिकों को अप्रवासी भारतीय या एनआरआई कहा जाता है.
विदेश मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक़ दुनिया भर के 210 देशों में 1,36,01,780 अप्रवासी भारतीय रहते हैं.
मंत्रालय के मुताबिक़ सबसे अधिक एनआरआई संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में रहते हैं. वहां 34,19,875 अप्रवासी भारतीय रहते हैं. वहीं अमेरिका में ये संख्या 12,80,000 है.
इलेक्ट्रॉनिकली ट्रांसमिटेड पोस्टल बैलेट सिस्टम (ईटीपीबीएस) क्या है?
चुनाव आयोग ने 2019 के लोकसभा चुनाव में इलेक्ट्रॉनिकली ट्रांसमिटेड पोस्टल बैलेट सिस्टम (ईटीपीबीएस) का इस्तेमाल किया. यह एक पूरी तरह से सुरक्षित प्रणाली है.
इसमें दो लेयर की सुरक्षा होती है. इसमें ओटीपी और पिन के इस्तेमाल से मतदान की गोपनीयता बनाए रखी जाती है.
इस प्रणाली के ज़रिए सर्विस वोटर अपने चुनाव क्षेत्र के बाहर कहीं से भी इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्राप्त डाक मतपत्र पर अपना वोट डालते हैं.
इसमें सर्विस वोटर को ई-पोस्टल बैलेट पिन और ई-पोस्टल बैलेट अलग अलग भेजे जाते हैं.
सर्विस वोटर इसे खोलता है और प्रिंट लेता है. वह प्रिंटेड पोस्टल बैलेट पर अपना मतदान करता है.
मतदान के बाद सर्विस वोटर, पोस्टल बैलेट को अपने चुनाव अधिकारी को डाक के ज़रिए भेजता है. चुनाव अधिकारी उसे मतगणना केंद्र पर प्राप्त करता है. उसे स्कैन करता है. सही पाए जाने पर वह वोट वैध हो जाता है.
इससे पहले चुनाव अधिकारी अपने क्षेत्र के सर्विस वोटर को प्रिंटेड पोस्टल बैलेट भेजते थे.
यह बैलेट एक-एक लिफ़ाफे़ में रखकर भेजा जाता था. इस प्रक्रिया में बहुत समय और संसाधन लगता था. कई बार ग़लती भी हो जाती थी और पोस्टल बैलेट सही मतदाता या उसके पते पर या समय पर नहीं पहुंच पाता था.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)