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हरियाणा चुनाव: पहलवानों के आंदोलन का असर क्या ग़ैर-जाटों में भी है?
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सूर्योदय के पहले से ही रोहतक शहर के एक पुराने अखाड़े में पहलवान वर्ज़िश कर रहे हैं.
मिट्टी के अखाड़े में दो युवा पहलवान दांव पेच लगा रहे हैं.
इन्हीं दांव पेच में महारत हासिल कर सपना अंतरराष्ट्रीय मेडल जीतने का है.
अखाड़ा और कुश्ती, हरियाणा के समाज के अभिन्न हिस्सा हैं. ये सिर्फ़ एक खेल नहीं बल्कि यहां की परंपरा है.
कुश्ती में हरियाणा के दबदबे का अंदाज़ा इसी बात से लग जाता है कि भारत को ओलंपिक में मिले आठ कुश्ती मेडल में से पांच हरियाणा के पहलवानों के नाम हैं.
ऐसे में राज्य की राजनीति भी अखाड़े से अछूती कैसे रह सकती है.
पेरिस ओलंपिक समेत कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अच्छे प्रदर्शन और फिर पहलवान आंदोलन से चर्चा में आईं विनेश फोगाट पर कांग्रेस ने दांव लगाया है.
विनेश से पहले भी कुछ पहलवान राजनीति के दंगल में ज़ोर आज़माइश कर चुके हैं.
लेकिन अखाड़े के हीरो रहे ये पहलवान राजनीति के मैदान में कुछ ख़ास नहीं कर पाए हैं
तो सवाल ये उठता है कि अखाड़ों की ज़मीन से निकली ये राजनीति हरियाणा विधानसभा चुनाव पर कितना असर डालेगी?
सवाल इस बात का भी है कि क्या महिला पहलवानों का आंदोलन हरियाणा विधानसभा चुनाव में कोई बड़ा फ़ैक्टर साबित होगा?
विनेश को टिकट देकर कांग्रेस ने क्या दांव खेला?
विनेश, दर्जनों टैक्ट्ररों के काफ़िले के साथ अपने विधानसभा क्षेत्र में गाँव-गाँव पहुँचकर, लोगों से ‘बेटी को जिताने’ की बात कह रही हैं.
अपनी जीत को लेकर आश्वस्त विनेश ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “आप देख ही रहे हैं कि किस तरह से लोगों का जनसमर्थन हमें मिल रहा है. हमारी जीत पक्की है.”
विनेश के खिलाफ बीजेपी ने पायलट रह चुके योगेश बैरागी को टिकट दिया है. पहलवान के जवाब में योगेश के समर्थक कहते हैं, “अगर विनेश पहलवान हैं तो हमारे वाले भी कैप्टन हैं.”
बीबीसी से बातचीत में पहलवानों के मुद्दे पर वह कहते हैं, “चुनाव प्रचार के दौरान कहीं भी मुझे पहलवान आंदोलन की बात सुनाई नहींं दी है. धरातल पर यह कोई मुद्दा ही नहीं है. हम स्थानीय मुद्दों को लेकर चुनाव लड़ रहे हैं.”
पेरिस ओलंपिक में शानदार प्रदर्शन करने वालीं विनेश जीतकर भी मेडल लाने से चूक गई थीं.
इससे पहले भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व प्रमुख और भारतीय जनता पार्टी नेता ब्रजभूषण शरण सिंह पर विनेश फोगाट, बजरंग पूनिया और साक्षी मलिक ने उत्पीड़न और भेदभाव के आरोप लगाए थे और इन तीनों की अगुआई में लंबा पहलवान आंदोलन चला था.
विनेश इस आंदोलन का अहम चेहरा बनकर उभरी थीं.
जब विनेश पेरिस से लौटकर आई थीं तो दिल्ली एयरपोर्ट पर उनका ज़ोरदार स्वागत हुआ था. हरियाणा से कई आम और ख़ास लोग उनकी अगवानी के लिए मौजूद रहे.
विनेश को भी लगता है कि पहलवान आंदोलन ने पूरे हरियाणा को उनके पक्ष में ला खड़ा किया है. उन्हें जीत का भरोसा है.
हरियाणा की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्र कंवारी के मुताबिक़ इस बार के चुनाव में पहलवान आंदोलन अहम साबित हो सकता है.
वो कहते हैं, “विनेश फोगाट ने पहलवानों के मुद्दे को इमोशनल मुद्दे में बदल दिया है, जिसका अच्छा ख़ासा असर इस चुनाव में दिखाई दे रहा है.”
वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र श्योराण कहते हैं, “इस बार पहलवानों का मुद्दा हरियाणा चुनाव में एक बड़ा मुद्दा है, जिसका उत्तर से लेकर दक्षिण हरियाणा तक असर दिखाई दे रहा है. विनेश के आने से खासतौर पर जींद ज़िले की पांच और चरखी दादरी ज़िले की दो सीटों पर सीधा असर दिखाई दे रहा है.”
क्या कह रही है जनता
विनेश को चुनाव प्रचार के दौरान लोगों की अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है. उनकी सभाओं में अच्छी भीड़ जुट रही है, जिनमें महिलाओं की संख्या भी अच्छी ख़ासी है.
वो अपने आपको ‘हरियाणा की बेटी’ बताकर लोगों से वोट मांग रही हैं.
जींद ज़िले की शकुंतला देवी कहती हैं, “हमने घर में बैठकर टीवी पर सब कुछ देखा कि कैसे दिल्ली में हमारी बहन-बेटियों के साथ नाइंसाफ़ी की गई. हमें सब कुछ याद है. हम कैसे भूल सकते हैं. इस चुनाव में वोट से चोट देंगे.”
वहीं चरखी दादरी के 13 गांवों के प्रधान सूरजभान कहते हैं, “राजनीति हर आदमी करता है. आप भी राजनीति कर रहे हैं. मैं भी राजनीति कर रहा हूँ. जो वोट का अधिकार रखता है."
तो वहीं चरखी दादरी ज़िले में जूस की दुकान चला रहे अमित कहते हैं, “पहलवानों का मुद्दा ज़मीन पर कहीं नहीं है. कुछ पार्टियां सिर्फ़ इस मुद्दे पर राजनीति कर रही हैं. हम तो इस बार भी स्थानीय मुद्दों पर ही वोट करेंगे.”
पास में ही मोबाइल की दुकान चलाने वाले रघु वर्मा कहते हैं, “पहलवान को राजनीति में ना जाकर देश के लिए मेडल लाने पर ध्यान देना चाहिए. कांग्रेस पार्टी ने अपने फ़ायदे के लिए विनेश को राजनीति के दंगल में खींच लिया है. हम शिक्षा, स्वास्थ्य और बेरोज़गारी के मुद्दे पर ही वोट करेंगे.”
पहलवान और राजनीति
हरियाणा के पहलवानों को जितनी कामयाबी अखाड़े में मिली उतनी राजनीति में नहीं मिल पाई.
हरियाणा विधानसभा चुनाव 2019 में बीजेपी ने राष्ट्रमंडल खेलों में गोल्ड मेडलिस्ट बबीता फोगाट को दादरी से उम्मीदवार बनाया था.
लेकिन निर्दलीय उम्मीदवार सोमबीर ने बबीता फोगाट को क़रीब 19 हज़ार वोटों के अंतर से हरा दिया था. ऐसा ही हाल ओलंपिक पदक विजेता योगेश्वर दत्त का भी रहा.
बीजेपी ने उन्हें भी विधानसभा चुनाव 2019 में बड़ौदा से अपना उम्मीदवार बनाया था लेकिन वे कांग्रेस के उम्मीदवार के कृष्ण मूर्ति हुड्डा से क़रीब पाँच हज़ार वोटों से हार गए.
हुड्डा की मौत के बाद बड़ौदा में फिर से चुनाव हुए लेकिन इस चुनाव में भी योगेश्वर दत्त अपने विरोधी को पटखनी नहीं दे पाए.
विनेश फोगाट के कांग्रेस जॉइन करने के फ़ैसले पर पहलवान आंदोलन में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ीं साक्षी मलिक ने ना तो खुलकर उनका समर्थन किया था और ना ही विरोध.
तब उन्होंने कहा था, “ये उनका व्यक्तिगत फ़ैसला है. मेरा मानना है कि कहीं ना कहीं हमें त्याग करना चाहिए. हमारा जो आंदोलन था, जो बहन बेटियों की लड़ाई थी उसे ग़लत रूप ना दिया जाए. मैं उस पर डटकर खड़ी हूँ.”
क्या पहलवान आंदोलन जाट बनाम ग़ैर जाट का मुद्दा है?
इस बीच हरियाणा की राजनीति को क़रीब से जानने का दावा करने वालों के बीच भी पहलवान मुद्दे को लेकर दो तरह की विचारधारा बन गई है
इनमें से एक वर्ग का मानना है कि पहलवानों का मुद्दा राज्य के हर वर्ग को प्रभावित करेगा और ये चुनाव में निर्णायक साबित हो सकता है.
तो वहीं दूसरे वर्ग का मानना है कि पहलवान आंदोलन का बहुत सीमित प्रभाव है और ये सिर्फ़ जाटों को ही जोड़ पाया है.
हरियाणा में कऱीब 25 प्रतिशत आबादी जाटों की है और राज्य की 90 में से 40 विधानसभा सीटों पर इनका प्रभाव है.
बीजेपी ने इस बार करीब 15 और कांग्रेस ने क़रीब 25 जाट उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है.
सोनीपत, रोहतक और झज्जर ऐसे ज़िले हैं, जिन्हें हरियाणा का जाट लैंड कहा जाता है और जानकारों के मुताबिक़ यहां कांग्रेस नेता और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का दबदबा माना जाता है.
अखाड़ों के लिहाज से भी यह क्षेत्र काफ़ी मज़बूत है.
वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्र कंवारी कहते हैं, “अखाड़े पूरे हरियाणा में फैले हुए हैं, लेकिन ज़्यादा अखाड़े पुराने रोहतक में मिलते हैं. यहीं से ज़्यादा पहलवान हुए हैं. इसके अलावा सोनीपत ज़िले का नाम भी पहलवानों की वजह से ही मशहूर है.”
पहलवानों में विनेश फोगाट, बबीता फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया जैसे बड़े नाम भी जाट समाज से आते हैं.
चरखी दादरी के स्थानीय पत्रकार प्रदीप साहू कहते हैं, “पहलवानों का मुद्दा खासकर जाट लैंड को प्रभावित करेगा. किसान आंदोलन के समय ग़ैर जाटों की ये धारणा बन गई थी कि यह जाटों का आंदोलन है. यही बात खिलाड़ियों के आंदोलन को लेकर भी रही है.”
वो कहते हैं, “हरियाणा का ग़ैर जाट, पहलवानों के आंदोलन के मुद्दे पर लामबंद होता नहीं दिखाई दे रहा है. ख़ासकर दक्षिणी हरियाणा, जिसे अहिरवाल क्षेत्र भी कहते हैं, यहाँ पहलवान चुनावी मुद्दे में दिखाई नहीं देते.”
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र श्योराण के मुताबिक़ ग़ैर जाटों पर भी पहलवान आंदोलन ने असर डाला है. उनके मुताबिक़ जिस-जिस वर्ग को किसान आंदोलन ने छुआ, उसी वर्ग को पहलवान आंदोलन ने भी कहीं ना कहीं प्रभावित किया है.
वो कहते हैं, “हरियाणा में ज़मीन सिर्फ़ जाटों के पास नहीं है. उत्तर हरियाणा से लेकर दक्षिण हरियाणा तक ग़ैर जाटों के पास अच्छी खासी ज़मीन है. इसलिए यह कहना कि राज्य में किसान आंदोलन सिर्फ़ जाटों का आंदोलन था, ठीक नहीं है. पूरे हरियाणा में किसान आंदोलन का असर था और यह आंदोलन पहलवानों से भी जुड़ा हुआ है. जहाँ-जहाँ किसान हैं, वहाँ-वहाँ पहलवान हैं.”
कुश्ती पर कई किताबें लिख चुके लेखक तेजपाल दलाल कहते हैं, “हरियाणा में पहलवान किसी एक ख़ास जाति से संबंध नहीं रखते हैं. हर जाति के लोग इसमें हिस्सा लेते हैं. जब गांवों में मेले लगते हैं तो पूरा गांव दंगल देखने जाता है और वहां कभी जाति का सवाल नहींं आता.”
वे कहते हैं, “कुश्ती को एक जाति या सिर्फ विनेश फोगाट से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. दरअसल जब कुश्ती में मेडल आते हैं तो उत्तर में पंचकुला से लेकर दक्षिण में महेंद्रगढ़ और नूंह तक संदेश जाता है. ऐसे ही जब पहलवानों के साथ कुछ ग़लत होता है तब पूरे राज्य को दुख होता है क्योंकि यहाँ पहलवान लोगों के सम्मान के साथ जुड़े हैं.”
हरियाणा के अखाड़े
हरियाणा में अखाड़ों और कुश्ती का एक समृद्ध और पुराना इतिहास है.
कंवारी कहते हैं, “कुश्ती हरियाणा में पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है. यहाँ उदयचंद, कालीरमण और चंदगीराम जैसे बड़े पहलवान हुए हैं और इनके नाम से आज भी अखाड़े कई जगह चलाए जा रहे हैं.”
वे बताते हैं, “हरियाणा के पहलवान मेला संस्कृति से ज़्यादा जुड़े हुए थे. जब भी कहीं मेला लगता था तो वहाँ पर कुश्ती का दंगल ज़रूर होता था. फिर धीरे धीरे पहलवान मेले से निकलकर प्रोफेशनली कुश्ती करने लगे.”
चरखी दादरी ज़िले में विनेश फोगाट के गाँव बलाली में अखाड़ा चला रहे आचार्य देवी सिंह अखाड़ा संस्कृति को अच्छे से समझते हैं. इलाक़े में इनका काफ़ी नाम है.
उन्होंने हरियाणा केसरी से लेकर भारत केसरी तक के दंगल करवाए हैं. वे कहते हैं, “गीता, बबीता और विनेश जैसे बेटियों की नींव हमारे ही अखाड़े में रखी गई है.”
वे कहते हैं, “बचपन से हम लोग कुश्ती देखते आ रहे हैं. ये एक ऐसा खेल है, जो हरियाणा में हर घर से जुड़ा है.”
हरियाणा की चुनावी रणभूमि में जहाँ आम तौर पर जातीय समीकरण पर चुनाव लड़ा जाता है, वहां इस बार पहलवान और अखाड़े अहम भूमिका निभा रहे हैं.
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