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बीबीसी लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड 2024: भारतीय महिला क्रिकेट की भरोसेमंद खिलाड़ी मिताली राज की कहानी
- Author, शारदा उगरा
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत में 15-17 साल के वो टीएनजर्स जो महिला क्रिकेट को देखते और पसंद करते हैं उनके लिए मिताली राज डब्ल्यूपीएल की टीम गुजरात जायंट्स की मेंटर हैं.
वहीं, वो लोग जो खेल पर और बारीक़ नज़र रखते हैं, उनके लिए मिताली राज पूर्व खिलाड़ी, टीवी एक्सपर्ट और कमेंटेटर हैं.
लेकिन अगर सिर्फ़ भारतीय महिला क्रिकेट की बात करें तो मिताली पीढ़ियों को जोड़ने वाली कड़ी की केंद्र बिंदु हैं.
मिताली राज को 2004 से 2022 तक भारतीय महिला क्रिकेट टीम की रिकॉर्ड 18 साल की कप्तानी के लिए बीबीसी लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड- 2024 मिला है.
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मिताली राज वो खिलाड़ी हैं जिन्होंने महिला क्रिकेट के बुरे दिनों में भी अपनी बॉलिंग सहयोगी झूलन गोस्वामी के साथ ज़िंदा रखा.
और ये बुरा दौर इसलिए नहीं था कि महिला क्रिकेट टीम का प्रदर्शन ख़राब था बल्कि इसकी वजह दूसरी थी. तब महिला क्रिकेट को कम संसाधनों के साथ पुरुष प्रशासन चला रहा था और इसे हाशिए पर धकेल दिया गया था.
क्रिकेट से कैसे रूबरू हुईं मिताली
मिताली के क़रीब दो दशक के करियर में स्थिति ऐसी ही रही. लेकिन इस दौरान मिताली के बल्ले ने जो कमाल दिखाया वो ना सिर्फ टीम के लिए ज़रूरी था बल्कि उसने भारत में महिला क्रिकेट को बचाए रखने में अहम भूमिका निभाई.
महिला क्रिकेट को मुख्यधारा में लाने में मिताली के योगदान की नींव शायद इस उनके खेल से परिचय होने से ही पड़ गई थी. मिताली को देर तक सोने की आदत थी. उनके पिता ने इसका हल निकालने के बारे में सोचा. 90 के दशक में उनके पिता वायु सेना के एक सेवानिवृत्त थे.
मिताली को अपने भाई की सिकंदराबाद में मौजूद क्रिकेट एकेडमी में भेजा गया. एकेडमी में मिताली ने कुछ गेंदों का सामना किया और उन पर शॉट लगाए. उनकी प्रतिभा को पहचानने के लिए कोच ज्योति प्रसाद के लिए इतना काफ़ी था.
'लेडी सचिन नहीं'
मिताली को हर दिन 6 घंटे ट्रेनिंग करनी होती थी. जिसमें बॉल को बल्ले से नहीं बल्कि स्टंप से हिट करना होता था और गैप तलाशने होते थे. इतना ही नहीं इसमें पत्थरों के इस्तेमाल से कैच की प्रैक्टिस भी शामिल थी ताकि क्रिकेट की सख़्त बॉल की आदत हो पाए.
10 साल की उम्र में मिताली को क्रिकेट पर फ़ोकस करने के लिए भरतनाट्यम छोड़ने का कठिन फ़ैसला लेना पड़ा.
2016 में 'क्रिकेट मंथली' को उन्होंने बताया, "डांस मेरा पैशन था. लेकिन क्रिकेट में एक लेवल पर पहुंचने का मतलब था कि मुझे अपनी प्राथमिकता तय करनी पड़ेगी."
कड़ी मेहनत ने रंग दिखाया और महज 16 साल की उम्र में साल 1999 में मिताली ने भारतीय सीनियर टीम के लिए डेब्यू किया. और उसके बाद का करियर शानदार रहा.
महिला वनडे क्रिकेट में मिताली सबसे ज्यादा रन बनाने वालीं खिलाड़ी हैं. 23 साल के लंबे करियर के दौरान मिताली ने 50 से ज्यादा के औसत से 7,805 रन बनाए हैं. मिताली ने 7 शतक और 64 अर्धशतक लगाए हैं. महिला वनडे क्रिकेट में मिताली के नाम सबसे ज्यादा अर्धशतक हैं.
2002 में मिताली ने इंग्लैंड के खिलाफ 214 रन की पारी खेली और वो टेस्ट क्रिकेट में दोहरा शतक लगाने वालीं पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनीं. 2024 तक ये रिकॉर्ड मिताली के नाम ही रहा. 2024 में शेफाली वर्मा ने दोहरा शतक लगाकर इस रिकॉर्ड की बराबरी की.
मिताली के लगातार रन बनाने की वजह से उनकी तुलना सचिन तेंदुलकर से होने लगी. उन्हें 'फीमेल तेंदुलकर' और 'लेडी सचिन' बुलाया जाने लगा जिसका मिताली ने ख़ुद मजाक उड़ाया.
2018 में मिताली ने कहा, "मैं महिला क्रिकेट की मिताली राज के नाम से पहचानी जाना चाहती हूं. खेल में मैं अपनी पहचान बनाना चाहती हूं."
और महिला क्रिकेट में जो पहचान उन्होंने बनाई उसका कोई मुक़ाबला नहीं है.
मुश्किल दौर में भी निरंतरता
मिताली के शानदार करियर की गवाही उनके रिकॉर्ड के साथ उनका धैर्य भी देता है. ख़ासकर जब उन्होंने अपने करियर का आधा पड़ाव पार कर लिया था तब महिला क्रिकेट की गवर्निंग बॉडी में हुए बदलाव की वजह से टीम के लिए मौके कम हुए.
जब 1999 में मिताली ने डेब्यू किया तो महिला क्रिकेट को वुमेन क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया चलाती थीं. लेकिन 2006 के अंत में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने महिला क्रिकेट की कमान अपने हाथों में ले ली.
मिताली ने तब तक 86 वनडे और 8 टेस्ट खेले थे. जिसका मतलब हुआ कि हर साल मिताली ने 14 वनडे और एक टेस्ट मैच खेला.
लेकिन 2007 से जून 2015 तक मिताली ने 67 वनडे मैच खेले. इस दौरान औसतन उन्होंने हर साल 8 वनडे मैच खेले. इन 8 सालों में मिताली को महज दो टेस्ट खेलने का मौका मिला.
जून 2015 तक बात इसलिए की गई है क्योंकि उसी साल मई में बीसीसीआई ने एलान किया कि महिला क्रिकेट को देशभर में बढ़ावा देने के लिए महिला क्रिकेटर्स को बोर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स देगा.
प्रशासन में बदलाव और इस एलान के बीच 8 सालों में महिला क्रिकेटर्स की एक पूरी पीढ़ी खो गई. इसमें कुछ बचा रहा तो वो थी मिताली की बल्लेबाज़ी और झूलन की गेंदबाज़ी.
उस समय के बारे में मिताली ने कहा, "काफ़ी मुश्किल वक्त था."
"ये इस बारे में ज़्यादा था कि कैसे समाज महिला क्रिकेटर्स को देखता है. जब मैंने शुरुआत की तो ऐसे सवालों से भी सामना हुआ जिनमें पूछा जाता था कि क्या महिला क्रिकेट जैसा भी कुछ है."
दूसरे खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा
मिताली की मेहनत का इनाम भी मिला और 2017 में उनकी कप्तानी में भारतीय महिला क्रिकेट टीम वनडे और टी20 वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में पहुंची.
मिताली के लिगेसी का प्रभाव युवा महिला खिलाड़ियों पर साफ़ दिखता है. बैटर वेदा कृष्णमूर्ति ने 2005 के वनडे वर्ल्ड कप सेमीफ़ाइनल में मिताली की 95 रन की पारी देखकर अपने घरवालों को स्टेट ट्रॉयल में शामिल होने के लिए मनाया.
स्टार बैटर स्मृति मंधाना भी मानती हैं, "जब उन्होंने क्रिकेट को चुना को हर कोई मिताली जैसा बनना चाहता था."
मिताली ने साल 2016 में कहा, "मैं खुशकिस्मत हूं कि मैं उस बदलाव का हिस्सा हूं जो महिला क्रिकेट ख़ासकर के भारत में हो रहा है."
"मुझे उम्मीद है कि मैं उस दिन को देख पाऊंगी जब लोग पुरुष और महिला क्रिकेट की बराबर स्वीकार करेंगे."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित