बांग्लादेश और पाकिस्तान में कम होती दूरी भारत के लिए कितनी बड़ी टेंशन?

बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीब-उर रहमान पाकिस्तान को लेकर बहुत सख़्त रहे थे.

यहाँ तक कि शेख मुजीब-उर रहमान ने बांग्लादेश को मान्यता दिए बिना पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो (बाद में प्रधानमंत्री) से बात करने से इनकार कर दिया था.

पाकिस्तान भी शुरू में बांग्लादेश की आज़ादी को ख़ारिज करता रहा.

लेकिन पाकिस्तान के तेवर में अचानक परिवर्तन आया. फ़रवरी 1974 में ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉन्फ़्रेंस समिट लाहौर में आयोजित हुई.

तब भुट्टो प्रधानमंत्री थे और उन्होंने मुजीब-उर रहमान को भी औपचारिक आमंत्रण भेजा. पहले मुजीब ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया, लेकिन बाद में इसे स्वीकार कर लिया.

22 फ़रवरी 1974 को पाकिस्तान ने बांग्लादेश को मान्यता दे दी थी. भुट्टो ने यह मान्यता ओआईसी समिट में ही देने की घोषणा की थी.

ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने मान्यता की घोषणा करते हुए कहा था, ''अल्लाह के लिए और इस देश के नागरिकों की ओर से हम बांग्लादेश को मान्यता देने की घोषणा करते हैं. कल एक प्रतिनिधिमंडल आएगा और हम सात करोड़ मुसलमानों की तरफ़ से उन्हें गले लगाएँगे.''

इसके बावजूद दोनों देशों के संबंधों पर जमी बर्फ़ पूरी तरह से पिघली नहीं थी. अब क़रीब 52 साल बाद दोनों देशों के बीच चीज़ें बदलती दिख रही हैं. शेख़ हसीना के सत्ता से बेदख़ल होने के बाद बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच ऐतिहासिक दूरियां कम होती दिख रही हैं.

भारत से तनाव और पाकिस्तान से सहानुभूति

इंक़लाब मंच के युवा नेता उस्मान हादी की 18 दिसंबर को मौत हो गई. 12 दिसंबर को अज्ञात लोगों ने ढाका में उन्हें गोली मार दी थी. पिछले हफ़्ते ही बांग्लादेश में एक फैक्ट्री के हिन्दू वर्कर की भीड़ ने सरेआम पीट-पीट कर हत्या कर दी.

इसके बाद पहले से ही भारत और बांग्लादेश के संबंधों में बना तनाव अचानक से बढ़ गया.

यह तनाव अब भी ख़त्म नहीं हुआ है. तनाव इस कदर बढ़ा हुआ है कि दोनों ने देशों ने वीज़ा सेवाओं पर अस्थाई रूप से रोक लगा दी है.

20 दिसंबर को पाकिस्तान जमात-ए-इस्लामी के पूर्व अमीर सिराज-उल हक़ ने बांग्लादेश के युवाओं की तारीफ़ करते हुए एक्स पर एक पोस्ट लिखी.

इस पोस्ट में सिराज-उल हक़ ने लिखा, ''बांग्लादेश की पढ़ी लिखी और साहसी युवा पीढ़ी ने अखंड भारत के आइडिया को ध्वस्त कर दिया है. भारत इस इलाक़े में अस्थिरता पैदा कर रहा है."

उस्मान हादी की हत्या के बाद बांग्लादेश में सोशल मीडिया पर अफ़वाह उड़ी कि उन्हें मारने वाले सरहद पार कर भारत चले गए हैं.

लेकिन इस तरह के आरोप न तो बांग्लादेश की पुलिस ने लगाए और न ही वहाँ की अंतरिम सरकार ने आधिकारिक रूप से ऐसा कुछ कहा.

मगर इन अफ़वाहों का असर दोनों देशों के राजनयिक संबंधों पर भी दिखा. बांग्लादेश में भारत के कई राजनियक मिशनों के आगे विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए.

दोनों देशों में बढ़ती क़रीबी

बांग्लादेश में ऐसी अफ़वाहों और भारतीय मिशनों को निशाना बनाए जाने के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने भी 17 दिसंबर को कहा था, ''बांग्लादेश में हाल की कुछ घटनाओं को लेकर कट्टरपंथी तत्वों के झूठे दावों को हम पूरी तरह से ख़ारिज करते हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अंतरिम सरकार ने न तो इन घटनाओं की गहन जाँच की है और न ही इनके संबंध में भारत के साथ कोई ठोस सबूत साझा किए हैं.''

पिछले साल अगस्त महीने में शेख़ हसीना को जब सत्ता छोड़ भारत जाना पड़ा, तब से पाकिस्तान और बांग्लादेश के रिश्तों में सरगर्मी देखने को मिल रही है.

ऐसी कई चीज़ें हुई हैं, जो बताती हैं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच की दूरी लगातार कम हो रही है.

1971 में बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध के बाद से दोनों देशों के बीच पिछले साल नवंबर में पहला समुद्री संपर्क हुआ हुआ था.

इससे पहले दोनों देशों के बीच समुद्री व्यापार सिंगापुर या कोलंबो के ज़रिए होता था.

बांग्लादेश में पाकिस्तान के उच्चायोग ने तब एक बयान में कहा था, "पहली बार है कि पाकिस्तान के कराची से बांग्लादेश के चटगाँव बंदरगाह पर कार्गो पोत सीधे पहुँचा है और यह द्विपक्षीय संबंधों में महत्वपूर्ण क़दम की शुरुआत है."

बांग्लादेश में पाकिस्तान के उच्चायुक्त सैयद अहम मारूफ़ ने पिछले साल छह नवंबर को बताया था, "बांग्लादेशी नागरिकों के लिए पाकिस्तान में फ़्री वीज़ा दिया जाएगा और 48 घंटों में इस पर फ़ैसला होगा. एक वेबसाइट पर सिर्फ़ जानकारी देनी होगी. वीज़ा की दो श्रेणियाँ हैं, बिज़नेस और टूरिस्ट वीज़ा. यात्रा करने वालों को सिर्फ़ वापसी का टिकट और जहाँ रुकना चाहते हैं, वहाँ की जानकारी देनी होगी."

मुख्यधारा में जमात-ए इस्लामी

शेख़ हसीना के सत्ता से बेदख़ल होने के बाद बांग्लादेश जमात-ए इस्लामी अहम सियासी ताक़त बनकर उभरती दिख रही है.

पाकिस्तान जमात-इस्लामी और बांग्लादेश जमात-ए इस्लामी विचारधारा के स्तर पर लगभग एक जैसे हैं. दोनों बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध पर सवाल उठाते रहे हैं.

बांग्लादेश जमात-ए इस्लामी मुक्ति युद्ध में भारत की भूमिका पर सवाल उठाता रहा है.

शेख़ हसीना के जाने के बाद बांग्लादेश में मुक्ति युद्ध की ऐतिहासिक विरासत पर हमले भी शुरू हो गए. बांग्लादेश के संस्थापक शेख़ मुजीब-उर रहमान के घर पर हमला किया गया.

बांग्लादेश जमात-ए इस्लामी मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार का समर्थन कर रहा है.

इस साल फ़रवरी में बांग्लादेश की न्यूज़ वेबसाइट प्रथम आलो को दिए इंटरव्यू में बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफ़ीक़ुर रहमान ने कहा था, ''1971 में हमारा रुख़ सिद्धांत से जुड़ा था. हम भारत के फ़ायदे के लिए स्वतंत्र देश नहीं चाहते थे. हम चाहते थे कि पाकिस्तानी हमें मताधिकार देने के लिए मजबूर हो. अगर यह संभव नहीं होता, तो कई देशों ने गुरिल्ला युद्ध के ज़रिए आज़ादी हासिल की है."

शफ़ीक़ुर रहमान ने कहा था, "अगर हमें किसी के ज़रिए या किसी के पक्ष में आज़ादी मिलती तो यह एक बोझ हटाकर दूसरे बोझ के तले दबने की तरह होता. पिछले 53 सालों से बांग्लादेश के लिए क्या यह सच नहीं हुआ है? हमें यह क्यों सुनने के लिए मिलना चाहिए कि कोई ख़ास देश किसी ख़ास पार्टी को पसंद नहीं करता है. कोई ख़ास देश अगर नहीं चाहता है तो कोई ख़ास पार्टी सत्ता में नहीं आ पाती है. क्या स्वतंत्र देश का यही तेवर होता है? बांग्लादेश के युवा अब ये सब सुनना नहीं पसंद करते हैं.''

भारत के लिए मुश्किल

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के बेटे सजीब वाज़िद जॉय ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए ईमेल इंटरव्यू में कहा, ''मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार एक इस्लामी शासन स्थापित करने की कोशिश कर रही है.''

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि बांग्लादेश में जो अभी स्थिति है, वह भारत के लिए ख़तरा बढ़ा रही है. 54 साल के वाज़िद अमेरिका में रहते हैं.

वाज़िद ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार से पाकिस्तान की बढ़ती कथित क़रीबी को लेकर इंडियन एक्सप्रेस से कहा, ''यह भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए. हमारी अवामी लीग सरकार ने भारत की पूर्वी सीमाओं को सभी आतंकवादी गतिविधियों से सुरक्षित रखा था. उससे पहले, बांग्लादेश का व्यापक रूप से भारत में विद्रोह फैलाने के लिए एक बेस के रूप में इस्तेमाल किया जाता था.''

''अब वही स्थिति फिर से लौटेगी. यूनुस सरकार ने देश में जमात-ए-इस्लामी और अन्य इस्लामी दलों को खुली छूट दे दी है. बांग्लादेश में इस्लामी दलों को कभी भी पाँच प्रतिशत से अधिक वोट नहीं मिले हैं. सभी प्रगतिशील और उदारवादी दलों पर प्रतिबंध लगाकर एक धांधलीपूर्ण चुनाव कराकर, यूनुस इस्लामी कट्टरपंथियों को सत्ता में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं.''

बांग्लादेश की अंग्रेज़ी न्यूज़ वेबसाइट प्रथम आलो ने वहाँ के जाने-माने बुद्धिजीवी और सेंटर फ़ॉर पॉलिसी डायलॉग के संस्थापक रहमान सोभान से यही सवाल पूछा, तो उन्होंने जवाब में कहा, ''जुलाई का आंदोलन लोकतांत्रिक नाकामी और अन्यायपूर्ण शासन से प्रेरित था लेकिन मुक्ति युद्ध के विरोधियों ने इस आंदोलन का फ़ायदा उठाया है.''

''मुक्ति युद्ध के विरोधी लंबे समय से हमारी राजनीति में शामिल रहे हैं. इन्होंने इस आंदोलन में घुसपैठ की और संभवतः इसकी दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई. ऐसा अक्सर निरंकुश शासन के ख़िलाफ़ जन-उभारों में देखने को मिलता है.''

रहमान सोभान ने कहा, ''बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में इनका उभार स्पष्ट रूप से दिख रहा है. चुनाव में इनकी संभावनाएँ मज़बूत हैं. वे इस अवसर का उपयोग 1971 में पाकिस्तानी सेना के साथ अपनी ऐतिहासिक सहयोगी भूमिका की नई व्याख्या करने के लिए करना चाहते हैं. राजनीतिक रूप से चतुर नेताओं के नेतृत्व में मुक्ति युद्ध पर उनका रुख़ कुछ सावधानी के साथ प्रस्तुत किया जाएगा. हालाँकि 1971 में अपनी भूमिका को सफ़ेद करने की कोशिश उनकी रणनीति का एक अभिन्न हिस्सा बना रहेगा.''

'पाकिस्तान और चीन के हक़ में बांग्लादेश से भारत का तनाव'

शिव नादर यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर और इंडियाज वर्ल्ड मैगज़ीन के संपादक हैपीमोन जैकब ने 22 दिसंबर को अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा कि दोनों देशों के ख़राब होते संबंधों का असर भारत की सुरक्षा पर पड़ेगा.

जैकब ने लिखा है, "भारत के लिए बांग्लादेश के साथ तेज़ी से बिगड़ते संबंध तीनतरफ़ा चुनौती पेश कर रहे हैं. 4,000 किलोमीटर लंबी सीमा पर असुरक्षा और घुसपैठ का ख़तरा बढ़ेगा. भारत-विरोधी ताक़तों की ओर से सीमा-पार ठिकाने स्थापित किए जाने का भी ख़तरा है."

"भारत और बांग्लादेश के बीच तनाव का पाकिस्तान और चीन फ़ायदा उठा रहे हैं. बांग्लादेश में पाकिस्तान की सक्रियता भी बढ़ी है. इस वर्ष जून में चीन के कुनमिंग में बांग्लादेश और पाकिस्तान के विदेश सचिवों के साथ चीन के उप विदेश मंत्री सुन वेइदोंग की त्रिपक्षीय बैठक ने भारत के लिए चिंता का संकेत दिया था. इसके बाद 2024 के अंत में पाकिस्तानी नौसेना के एक जहाज़ का बांग्लादेश के चटगाँव बंदरगाह पर अभूतपूर्व दौरा हुआ. चीन मोहम्मद यूनुस सरकार के साथ अपने जुड़ाव को लगातार मज़बूत कर रहा है."

हैपीमोन जैकब ने लिखा है, "जिस भी दृष्टि से देखा जाए द्विपक्षीय संबंधों की वर्तमान स्थिति भारत के लिए बेहद अनुपयोगी है. यह तनाव बांग्लादेश और उसके लोगों के हितों को और भी अधिक नुक़सान पहुँचाता है लेकिन शायद बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को नहीं. यह तनाव उसकी घरेलू नाकामियों और अक्षमताओं पर पर्दा डालने में सहायक है. इसलिए यह मान लेना कि भारत के साथ ख़राब संबंध होने से बांग्लादेश को ही अधिक नुक़सान होगा, एक बड़ा ग़लत आकलन साबित हो सकता है."

हालाँकि बांग्लादेश के विश्लेषकों को लगता है कि संबंध ख़राब करने के लिए भारत की नीतियां भी ज़िम्मेदार हैं. ढाका के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द डेली स्टार ने 22 दिसंबर को दोनों देशों के ख़राब होते संबंधों पर संपादकीय लिखा था.

डेली स्टार ने लिखा है, ''यह दोहराना ज़रूरी है कि कई वर्षों तक भारत और बांग्लादेश के बीच संबंधों की नींव शेख़ हसीना की पार्टी अवामी लीग को दिए गए भारत के अडिग समर्थन से मज़बूत रही. अब जब यह पार्टी सत्ता से बेदख़ल हो चुकी है और उसकी निर्वासित नेता भारत से भड़काऊ टिप्पणियाँ कर रही हैं, तो उस आधार को गहरा धक्का पहुँचा है.''

''अब उसकी जगह आपसी संदेह से भरा शून्य पैदा हो गया है. ढाका नई दिल्ली को बांग्लादेश के ख़िलाफ़ साज़िश रचने वाले भगोड़ों के लिए सुरक्षित पनाहगाह के रूप में देखता है. दूसरी ओर, भारत एक ऐसे पड़ोसी को देख रहा है जो बहुसंख्यकवादी अराजकता की ओर फिसल रहा है. भारत अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के मामले में अंतरिम सरकार के रवैए को संदेह की नज़र से देखता है और ढाका के आश्वासनों को अपर्याप्त मानकर ख़ारिज करता है.''

शेख़ हसीना अगस्त 2024 से भारत में रह रही हैं. हसीना को बांग्लादेश में मौत की सज़ा सुनाई गई है.

मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार भारत से शेख़ हसीना का प्रत्यर्पण चाहती है.

लेकिन भारत सरकार ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया है. बांग्लादेश की सरकार इसे लेकर कई बार नाराज़गी जता चुकी है.

दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के दक्षिण एशिया अध्ययन केंद्र में प्रोफ़ेसर महेंद्र पी लामा कहते हैं, ''शेख़ हसीना के सत्ता से जाते ही हम वहाँ कहीं नहीं दिख रहे हैं. मुझे लगता है कि हमने बांग्लादेश में शेख़ हसीना के अलावा बाक़ी पक्षों से कभी संबंध बेहतर करने की कोशिश ही नहीं की. चीन इस मामले में बिल्कुल अलग है. चीन का संबंध किसी देश से इस बात पर निर्भर नहीं करता है कि वहाँ किसकी सरकार है.''

'इस्लामिक राष्ट्रवाद'

पाकिस्तान धर्म के आधार पर बना था और फिर इससे बांग्लादेश भाषा के आधार पर अलग हुआ.

बांग्लादेश की आज़ादी की बुनियाद बांग्ला राष्ट्रवाद थी, लेकिन यह राष्ट्रवाद इस्लाम के ख़िलाफ़ नहीं था.

मार्च 1948 में मोहम्मद अली जिन्ना ने जब उर्दू को पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा घोषित किया, तभी बांग्ला राष्ट्रवाद का बीज पड़ चुका था.

इसी का नतीजा था कि 1952 में पूर्वी पाकिस्तान में भाषायी आंदोलन शुरू हो गया था और आख़िरकार बांग्लादेश अस्तित्व में आया. लेकिन अब भाषायी राष्ट्रवाद पर सवाल उठने लगे हैं.

कोलकाता यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर हिमाद्रि चटर्जी ने कहते हैं कि बांग्लादेश में हमेशा से हाइब्रिड राष्ट्रवाद था.

प्रोफ़ेसर चटर्जी कहते हैं, ''बांग्लादेश बांग्ला राष्ट्रवाद के ज़रिए बना है लेकिन इस्लाम कहीं गया नहीं था. बांग्ला राष्ट्रवाद की वकालत करने वाले इस्लाम विरोधी नहीं थे. यहाँ शुरू से ही हाइब्रिड राष्ट्रवाद था. शेख़ हसीना को लगा कि वह बांग्लादेश केवल बांग्ला राष्ट्रवाद के ज़रिए संभाल लेंगी और यही उनकी ग़लती थी. मुक्ति युद्ध के रोमांस से बांग्लादेश कब का निकल चुका था. शेख़ हसीना इस बात को समझ नहीं पाईं.''

पाकिस्तान के जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक परवेज़ हुदभाई पिछले साल नवंबर में बांग्लादेश गए थे.

परवेज़ हुदभाई ने भी ऐसा महसूस किया कि बांग्लादेश में बांग्ला राष्ट्रवाद पर इस्लामिक राष्ट्रवाद हावी हो रहा है.

परवेज़ हुदभाई ने इस मामले में इसी साल फ़रवरी में बीबीसी के साथ बातचीत में कहा था, ''बांग्लादेश में एक बेचैनी है. अभी एक तरफ़ सेक्युलर नेशनलिज़्म है, जिसमें भाषायी पहचान की बात है. इस बात पर बांग्लादेश के लोग अरसे तक गर्व करते रहे हैं. दूसरी तरफ़ बांग्लादेश के भीतर मज़हबी ताक़त भी सिर उठा रही है. इनकी कोशिश है कि बांग्लादेश को इस्लामी रंग दिया जाए.''

''लेकिन मेरा मानना है कि बांग्लादेशी समाज के अंदर मज़बूती है. बांग्लादेश की औरतें बुर्क़ा नहीं पहनती हैं, मर्दों के साथ काम करती हैं और पाकिस्तानी महिलाओं की तुलना में ज़्यादा आधुनिक हैं. मेरे ख़्याल में बांग्लादेश में कश्मकश है लेकिन इस्लामी ताक़तों की जीत नहीं होगी. बांग्लादेश के लोगों को याद होगा कि 1971 में इस्लाम के नाम पर कितना अत्याचार हुआ था.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.