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डीआरडीओ: जूते से मिसाइल तक, भारतीय सेना की हर ज़रूरत पूरी करने वाला संस्थान
- Author, शकील अख़्तर
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, नई दिल्ली
भारत ने पिछले हफ़्ते ओडिशा के पास एक द्वीप से एक हाइपरसोनिक मिसाइल का परीक्षण किया है. आवाज़ से पांच गुना अधिक तेज़ रफ़्तार से उड़ान भरने वाली मिसाइल को निशाना बनाना बेहद मुश्किल है और यह टेक्नोलॉजी अभी दुनिया के कुछ ही देश के पास मौजूद है.
यह मिसाइल परमाणु बम से हमला करने की क्षमता भी रखती है. हाइपरसोनिक मिसाइल के सफल परीक्षण को मिसाइल टेक्नोलॉजी में भारत की एक बहुत बड़ी सफलता माना जा रहा है. इसे भारत के रक्षा शोध संस्थान डीआरडीओ (डिफ़ेंस रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइज़ेशन) ने बनाया है.
डीआरडीओ रक्षा मंत्रालय के तहत युद्ध के साज़ोसामान बनाने वाला सबसे बड़ा संस्थान है. इसका मक़सद हवा, समंदर, अंतरिक्ष और साइबर क्षेत्र के लिए आधुनिकतम सेंसर, रडार, हर तरह के हथियार, मिसाइल, परमाणु बम, तोप, टैंक, पनडुब्बी, लड़ाकू विमान और उनसे संबंधित साज़ोसामान और पार्ट्स के डिज़ाइन तैयार करना और उन्हें बनाना है.
भारत में 1974 और 1998 में पोखरण में परमाणु धमाका इसी संस्थान के वैज्ञानिकों की निगरानी में किया गया था. भारत का परमाणु बम और हाइड्रोजन बम भी डीआरडीओ ने ही बनाया है.
डीआरडीओ की शाखाएं देश के विभिन्न शहरों में फैली हुई हैं. पूरे देश में इसकी लगभग 42 लैबोरेट्री हैं जहां रक्षा के अलग-अलग क्षेत्र में हज़ारों वैज्ञानिक शोध और विकास के काम में लगे हैं.
डीआरडीओ ने अपनी पांच लैबोरेट्री युवा वैज्ञानिकों के लिए ख़ास तौर पर रखी है जहां केवल 35 साल से कम उम्र के इंजीनियर ही काम करते हैं.
डीआरडीओ में अक्सर ग्रेजुएट और वैज्ञानिक इंजीनियरिंग और साइंस के ऐसे शैक्षणिक संस्थानों से आते हैं जिन्हें देश भर के शीर्ष संस्थानों में नहीं गिना जाता बल्कि वह कम प्रसिद्ध शैक्षणिक संस्थानों में गिने जाते हैं.
डीआरडीओ की सफलता
पल्लव बागला रक्षा मामलों के पत्रकार हैं. उन्होंने डीआरडीओ की बहुत क़रीब से कवरेज की है
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, “डीआरडीओ को भारत की सशस्त्र सेनाओं की हर तरह की ज़रूरत पूरी करने के लिए बनाया गया है. लोग केवल यही जानते हैं कि इसने परमाणु बम बनाया है, हाइड्रोजन बम बनाया है. वह तरह-तरह की मिसाइल बना रहा है, उसने पोखरण का परमाणु विस्फोट भी किया था.”
“लेकिन यह कम लोगों को मालूम है कि वह सैनिकों के लिए अलग-अलग मौसमों के हिसाब से ज़रूरी यूनिफ़ॉर्म बनाता है और आरामदेह जूते भी. किन हालात में किस तरह का खाना खाना है, इसके लिए शोध भी यहीं किया जाता है. यूनिफ़ॉर्म और जूते बनाने से लेकर एटम बम बनाने तक का सारा काम डीआरडीओ करता आया है. चूंकि यह एक रक्षा शोध और विकास का संस्थान है इसलिए इसकी गतिविधियों को बहुत पर्दे में रखा जाता है.”
डीआरडीओ ने सबसे बड़ी कामयाबी एटम बम और मिसाइल के क्षेत्र में हासिल की है. इसने अलग-अलग रेंज और प्रकार की आधुनिकतम क्रूज़, बैलिस्टिक, इंटरकॉन्टिनेंटल, सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक मिसाइल बनाई हैं.
रक्षा विश्लेषक राहुल बेदी का कहना है कि डीआरडीओ ने मिसाइल बनाने में जो कामयाबी हासिल की है वह कई विकसित देशों में भी नहीं हासिल हो पाई है.
उन्होंने कहा कि उदाहरण के तौर पर अभी भारत ने जो हाइपरसोनिक मिसाइल का परीक्षण किया है, वह टेक्नोलॉजी चीन और अमेरिका समेत केवल पांच-छह देशों के पास है लेकिन उनकी मिसाइल की क्षमता भारत की हाइपरसोनिक मिसाइल से बहुत कम है.
बेदी ने बीबीसी को बताया, “उन्होंने तीन साल पहले एक हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल भी बनाया था. यह ग्लाइड व्हीकल एक रॉकेट के ज़रिए अपने लक्ष्य तक भेजा जाता है. बहुत विकसित देशों के पास भी अभी यह क्षमता नहीं है.”
राहुल बेदी का कहना है कि डीआरडीओ ने सब मरीन बैलिस्टिक मिसाइल भी बनाई है जिन्हें बनाना बहुत मुश्किल काम है.
लेकिन बेदी के मुताबिक मिसाइलों के मामले में बढ़िया रिकॉर्ड के बावजूद असॉल्ट राइफ़ल, सैनिकों के लिए टैंक और बख्तरबंद गाड़ियों जैसे सामान के बारे में इस संस्था की क्षमता काफ़ी कम है.
डीआरडीओ अभी लड़ाकू विमानों में इस्तेमाल होने वाले शक्तिशाली इंजन भी नहीं बना सका है. इसने ‘तेजस’ नाम का एक लाइट कॉम्बैट लड़ाकू विमान बनाया है लेकिन इसका इंजन अमेरिका की कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक से लिया गया है.
जब भारत ने रक्षा तकनीक खुद बनाने का फ़ैसला किया
डीआरडीओ की मिसाइल टेक्नोलॉजी की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी जब डॉक्टर अब्दुल कलाम के नेतृत्व में मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम शुरू किया गया था.
उस वक़्त लंदन, वॉशिंगटन और टोक्यो में भारत के डिफ़ेंस अताशी और डीआरडीओ के प्रतिनिधि हुआ करते थे. रक्षा तकनीक पर उन देशों का पूरा कंट्रोल था.
प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के दौर में सन 1998 के परमाणु विस्फोट के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने भारत पर टेक्नोलॉजी के आयात और विशेष तौर से ऐसे इंजन, मशीन और पार्ट्स मंगाने पर पाबंदी लगा दी थी जो युद्ध में काम आने वाली मशीनों और हथियारों में इस्तेमाल किए जा सकते थे.
यह पाबंदी कई सालों तक जारी रही और यही वह समय था जब भारत ने यह फ़ैसला किया कि वह टेक्नोलॉजी के लिए विदेशों पर निर्भर नहीं रहेगा.
सन 80 के दशक से यह संस्थान विकास करता हुआ इस मुक़ाम पर पहुंच गया कि अब यह हाइपरसोनिक मिसाइल भी बना रहा है और सब मरीन बैलिस्टिक मिसाइल भी लॉन्च कर सकता है.
डीआरडीओ ने पिछले 30 सालों में पृथ्वी, अग्नि, आकाश, त्रिशूल और ब्रह्मोस जैसी आधुनिक मिसाइलें बनाई हैं जो भारत की सशस्त्र सेनाओं के अंग हैं.
भारत कौन सी मिसाइल निर्यात करता है?
डीआरडीओ कुछ मिसाइल अब निर्यात भी कर रहा है. एक तो आकाश मिसाइल है जिसकी रेंज 25 से 40 किलोमीटर तक है और दूसरा ब्रह्मोस मिसाइल है जो भारत ने रूस की साझेदारी से बनाई है. इसकी रेंज 280 किलोमीटर से 400 किलोमीटर तक है. 280 किलोमीटर रेंज की मिसाइल उन्होंने फ़िलिपींस को निर्यात की है जबकि आकाश मिसाइल आर्मेनिया को बेचा गया है.
पिछले वित्तीय वर्ष में भारत में 21 हज़ार करोड़ रुपए का जंगी साज़ोसामान निर्यात किया था. भारत के रक्षा मंत्रालय ने अगले पांच वर्षों में उसे 50 हज़ार करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है.
राहुल बेदी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, “मिसाइल टेक्नोलॉजी बाहर से लेना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि यह बहुत ही क्लासिफ़ाइड और ख़ुफ़िया टेक्नोलॉजी होती है. जिन देशों के पास यह टेक्नोलॉजी होती है वह उसे देने के लिए तैयार नहीं हैं.”
वह कहते हैं कि 1998 के बाद भारत एक परमाणु शक्ति संपन्न देश बन गया है. डीआरडीओ ने जो मिसाइलें बनाई हैं उनमें बहुत सी मिसाइलें परमाणु बम गिराने की क्षमता वाली हैं. अभी जिस हाइपरसोनिक मिसाइल का भारत ने परीक्षण किया है, उसमें परंपरागत और परमाणु- दोनों तरह के बम लगाए जा सकते हैं.
रक्षा विश्लेषक पल्लव बागला कहते हैं, “जब-जब भारत को दूसरे देशों ने टेक्नोलॉजी देने से इनकार किया, उन रक्षा प्रणालियों में डीआरडीओ ने कमाल का काम किया है. इन क्षेत्रों में इस संस्थान ने बहुत कारगर हल निकाले हैं.”
वह कहते हैं कि डीआरडीओ ने इसी साल एक ही मिसाइल में कई एटम बम ले जाकर अलग-अलग टारगेट को निशाना बनाने वाले एमआईआरवी मिसाइल का भी सफल परीक्षण किया है.
पिछले कुछ वर्षों से डीआरडीओ ने निजी कंपनियों से भी साझेदारी शुरू की है. आर्टिलरी यानी तोपख़ाना सिस्टम, मोटराइज़्ड व्हीकल बनाने और हेलीकॉप्टर यूनिट में प्राइवेट सेक्टर की साझेदारी शामिल है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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