सऊदी अरब और रूस की यह जुगलबंदी, भारत समेत कई देशों पर पड़ेगी भारी

सऊदी अरब और रूस ने कच्चे तेल के उत्पादन में कटौती जारी रखने का एलान किया है.

ये एलान साल 2023 के बचे हुए तीन महीनों के लिए किया गया है.

दोनों देशों के इस साझा एलान से दुनियाभर में तेल की कीमतों पर असर देखने को मिल सकता है.

बीते कुछ हफ़्तों में तेल की क़ीमतों में इजाफ़ा देखने को मिल रहा है.

इस कारण साल में पहली बार कच्चे तेल की क़ीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल पहुँच गई है.

अक्तूबर 2022 से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत 75 से 85 डॉलर के बीच ही रही थी.

सऊदी अरब ने प्रति दिन 10 लाख बैरल का उत्पादन और रूस ने प्रति दिन तीन लाख बैरल की कटौती का एलान किया है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, सऊदी, रूस के ताज़ा फै़सले के बाद 10 महीने में पहली बार तेल की क़ीमतें रिकॉर्ड स्तर पर हैं.

सबसे पहले सऊदी ने किया था एलान

इस साल गर्मियों की शुरुआत में तेल के उत्पादन में कटौती का एलान सबसे पहले सऊदी अरब ने किया था.

इस कटौती के फ़ैसले को सऊदी अरब हर महीने आगे बढ़ाता रहा है.

मंगलवार को जब सऊदी, रूस ने तेल के उत्पादन में कटौती को तीन और महीनों के लिए बढ़ाया तो इस पर विशेषज्ञों को हैरानी हुई थी.

इस फ़ैसले को आपूर्ति और मांग पर अपनी पकड़ बनाए रखने के तौर पर देखा जा रहा है, जिसका असर तेल की बढ़ी क़ीमतों के रूप में भी देखने को मिलेगा.

रूस और सऊदी अरब के साथ में लिए इस फ़ैसले को बड़े निर्यातकों के बीच एकता दिखाने के तौर पर देखा जा रहा है.

इससे वैश्विक सप्लाई में क़रीब एक फ़ीसदी की कटौती देखने को मिलेगी. हालांकि रूस की कटौती के बारे में पता कर पाना मुश्किल है. यूक्रेन में युद्ध के कारण लगे प्रतिबंधों के चलते रूस को तेल बेचने में दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा है.

एनर्जी इंटेलिजेंस की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क़दम का अमेरिका समेत दूसरे देशों पर भी असर होगा. ये देश पहले से ही बढ़ी हुई तेल क़ीमतों और महंगाई की चुनौतियों से निपट रहे हैं.

रूस-सऊदी के क़दम से इन कोशिशों को भी झटका लगेगा.

रूस और सऊदी अरब में तब थी तनातनी

साल 2020 के मार्च महीने में सऊदी अरब और रूस में तेल की क़ीमतों को लेकर तनातनी हुई थी. सऊदी अरब चाहता था कि रूस तेल का उत्पादन कम करे ताकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की गिरती क़ीमतों को संभाला जा सके. लेकिन रूस उत्पादन कम करने को तैयार नहीं था.

रूस के इस रुख़ से खीझ कर सऊदी अरब ने भी उत्पादन बढ़ाने और तेल की क़ीमतों में छूट देकर बेचने का फ़ैसला ले लिया था. सऊदी अरब ने यह फ़ैसला तब लिया था जब पूरी दुनिया में कोविड 19 की महामारी के कारण सारे कारोबार ठप थे.

दोनों देश एक दूसरे पर क़ीमतों में गिरावट के लिए इल्ज़ाम लगा रहे थे. रूस के सरकारी टेलीविज़न सऊदी अरब को अपनी मुद्रा रुबल में आई गिरावट के लिए ज़िम्मेदार बता रहे थे.

दूसरी तरफ़ सऊदी अरब भी पलटवार करने का फ़ैसला कर चुका था. एक अप्रैल को सऊदी की राष्ट्रीय तेल कंपनी अरामको ने कहा कि वो हर दिन एक करोड़ 20 लाख बैरल तेल का उत्पादन करेगा.

यह रूस से हुए समझौते की तुलना में 26 फ़ीसदी ज़्यादा उत्पादन था. सऊदी अरब को लगा था कि वो रूस के साथ प्राइस वॉर में ख़ुद को बादशाह साबित कर लेगा.

पिछले तीन सालों में तेल की दुनिया में दो अहम बदलाव हुए हैं और इनका असर बहुत ही व्यापक हुआ है. पहला यह कि अमेरिका में तेल का उत्पादन बढ़ा है. यह उत्पादन इतना बढ़ा है कि अमेरिका बड़े तेल आयातक से दुनिया का अहम तेल निर्यातक देश बन गया है.

दूसरा तेल की क़ीमतों को स्थिर रखने के लिए रूस और सऊदी अरब के बीच का सहयोग. अमेरिका, रूस और सऊदी अरब दुनिया के तीन सबसे बड़े तेल उत्पादक देश हैं.

पहले नंबर पर अमेरिका है और दूसरे नंबर रूस-सऊदी के बीच प्रतिद्वंद्विता चलती रहती है. रूस और सऊदी अरब के बीच का सहयोग हाल के दिनों में बुरी तरह से प्रभावित हुआ है.

ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज़ यानी ओपेक में सऊदी का दबदबा सबसे ज़्यादा है. साल 2020 मार्च महीने में सऊदी अरब ने ओपेक के ज़रिए कोविड 19 के कारण तेल की मांग में आई भारी कमी के कारण तेल उत्पादन में कटौती का प्रस्ताव रखा था.

रूस ओपेक का सदस्य नहीं है और उसने सऊदी के इस प्रस्ताव के साथ जाने से इनकार कर दिया था. इसके बाद दोनों देशों में तेल को लेकर प्राइस वॉर छिड़ गया था.

राइस यूनिवर्सिटी बेकर इंस्टिट्यूट में ऊर्जा मामलों के विशेषज्ञ जिम क्राएन ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा था, "अरब के नेताओं को पता है कि तेल की ऊंची क़ीमत हमेशा के लिए नहीं है. चार साल पहले इसी को ध्यान में रखते हुए सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान ने 'विज़न 2030' पेश किया था.''

सऊदी अरब कर सकता है और कटौती

तेल के उत्पादन बढ़ाने या घटाने के बारे में सऊदी अरब ने कहा है कि हर महीने इस बात की समीक्षा की जाएगी.

द न्यूयॉर्क टाइम्स की ख़बर के मुताबिक- विश्लेषकों का कहना है कि अपनी आय का मुख्य ज़रिया यानी तेल पर सऊदी अरब मज़बूत बाज़ार का पक्षधर है.

विश्लेषक कहते हैं कि सऊदी अपने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ अमेरिका जैसे सहयोगियों के साथ जोखिम लेने को तैयार दिखता है.

रिसर्च फर्म एनर्जी एस्पेक्ट्स में जियोपॉलिटिक्स के हेड रिचर्ड ब्रॉन्ज ने द न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा- बाज़ार को टाइट रखना सऊदी अरब अपना फ़र्ज़ समझता है.

सऊदी अरब के तेल मंत्री प्रिंस अब्दुल अज़ीज़ बिन सलमान ज़्यादा आक्रामक नीतियों के साथ मुखर देखे जाते रहे हैं.

साल की शुरुआत में अब्दुल्ल अज़ीज़ के बयानों को बाज़ार नज़रअंदाज़ ही करता रहा है. अब्दुल्ल अज़ीज़ क्राउन प्रिंस सलमान के भाई भी हैं.

बीते कुछ हफ़्तों में तेल की कमी और बढ़ती मांग के चलते तेल की क़ीमतें बढ़ी हैं और ये विश्व की अर्थव्यवस्था के लिए चिंता की बात है.

चीन का संकट और क़ीमतों में वृद्धि

जून के बाद से कच्चे तेल की क़ीमतों में 20 फ़ीसदी का इजाफ़ा देखने को मिला है. ये बढ़ोतरी ऐसे वक़्त में हो रही है, जब चीन को आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

सऊदी जैसे तेल निर्यातक देशों के लिए चीन एक बड़ा बाज़ार है.

द न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक़, तेल की बढ़ी क़ीमतों को रूस के हक़ में माना जा रहा है. मगर इससे महंगाई पर काबू पाने की केंद्रीय बैंकों की ओर से की जा रही कोशिशों को झटका लग सकता है.

कच्चे तेल का 90 डॉलर प्रति बैरल के भाव से बिकना सऊदी और अमेरिका के बीच टकराव की स्थिति हो सकती है. हालांकि अमेरिका का ध्यान इस वक़्त सऊदी अरब और इसराइल के बीच राजनयिक संबंधों को बनाने पर केंद्रित है.

सऊदी की प्रेस एजेंसी के मुताबिक़, सऊदी अरब प्रति दिन 90 लाख बैरल तेल का उत्पादन इस बीच करेगा. पिछले साल की तुलना में ये उत्पादन 20 लाख बैरल कम है.

पश्चिमी देशों के प्रतिबंध और रूस

यूक्रेन में छेड़े गए युद्ध के बाद से रूस पर पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगाए थे. इसके बाद से भारत, चीन रूस से तेल भले ही लेते रहे हों मगर पश्चिमी देशों ने रूस से किनारा किया था.

यूक्रेन जंग के बाद से भारत का रूस से तेल आयात 1,350 फ़ीसदी बढ़ा है. इसी दौर में भारत यूरोप का सबसे बड़ा ईंधन निर्यातक देश बन गया है.

द सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर की रिपोर्ट में बताया गया था कि यूरोप रूस से सीधे तेल ना ख़रीदकर भारत और चीन के ज़रिए तेल ले रहा था.

एनर्जी इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक़, इस साल की शुरुआत में रूस ने अपने तेल आउटपुट में पांच लाख बैरल प्रति दिन की कटौती का एलान किया था. अगस्त में रूस ने कच्चे तेल के निर्यात में भी कटौती का एलान किया.

ये कटौती सितंबर महीने में सबसे निचले स्तर तीन लाख बैरल प्रति दिन पर आ पहुंची है.

कच्चे तेल के मामले में रूस का निर्यात जून और जुलाई में काफ़ी तेज़ी से नीचे गिरा है.

एनर्जी इंटेलिजेंस ने रूसी अधिकारियों से जुड़े सूत्रों के हवाले से बताया है कि अगस्त में रूस ने नॉन-एफएसयू यानी ग़ैर-सोवियत संघ देशों को औसतन क़रीब 43 लाख बैरल तेल की सप्लाई की थी. ये आकंड़ा जुलाई से ज़्यादा था.

एनर्जी इंटेलिजेंस ने अनुमान लगाया है कि अगस्त में रूस का निर्यात शुरुआती सात महीनों की तुलना में कऱीब तीन लाख 40 हज़ार बैरल प्रति दिन कम रहा है.

ये फ़ैसला बताता है कि रूस का ध्यान तेल का भंडारण करने की बजाय ऊंची कीमतों को सुरक्षित करना है.

यूरोपीय संघ के रूसी तेल पर प्रतिबंध के मद्देनज़र इस फ़ैसले की अपनी अहमियत है.

रूस और सऊदी अरब

सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है.

सऊदी अरब प्रति दिन एक करोड़ बैरल से ज़्यादा तेल का उत्पादन करता है.

तेल उत्पादन के मामले में सऊदी अरब के बाद रूस का नंबर आता है.

अल जज़ीरा की रिपोर्ट के मुताबिक़, रूस प्रति दिन लगभग 97 लाख बैरल तेल का उत्पादन करता है.

सऊदी अरब के तेल ख़रीदने में चीन पहले नंबर पर है. चीन सऊदी अरब का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है.

2021 में चीन से सऊदी अरब का द्विपक्षीय व्यापार 87 अरब डॉलर पहुँच गया था.

रूस से चीन का तेल आयात बीते एक एक साल में क़रीब चार करोड़ टन से बढ़कर 5.77 करोड़ टन हो गया है.

वहीं पिछले एक साल में भारत का भी रूस से तेल आयात 30 लाख टन से बढ़कर 5.59 करोड़ टन हो गया है.

रूस और भारत के बीच तेल व्यापार

इस साल जून में भारत ने रूस से हर दिन क़रीब 20 लाख बैरल कच्चा तेल आयात किया था.

भारत ने जून महीने में कुल 40 लाख बैरल तेल प्रतिदिन आयात किया था और इसमें रूस की हिस्सेदारी क़रीब 45 फ़ीसदी थी. मई महीने की तुलना में भारत के तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी ज़्यादा थी.

भारत का 2021-22 में रूस से तेल आयात महज़ दो फ़ीसदी था, जो अब बढ़कर 20 फ़ीसदी से ज़्यादा हो गया है. रूस भारत के पारंपरिक तेल आपूर्तिकर्ता देश सऊदी अरब और इराक़ को पीछे छोड़ चुका है.

रूस और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार भले बढ़कर 44 अरब डॉलर पहुंच गया है लेकिन इसमें बड़ा हिस्सा तेल आयात का है.

भारत का रूस में निर्यात बहुत कम है. अप्रैल 2022 से जनवरी 2023 तक रूस के साथ भारत का व्यापार घाटा 34 अरब डॉलर का था.

यूक्रेन पर रूस ने जब आक्रमण किया तो पश्चिमी देशों ने उस पर प्रतिबंध लगा दिए थे.

अमेरिका ने भी भारत से उम्मीद की थी कि वो रूस से तेल ना खरीदे. इस बारे में अप्रैल 2022 में विदेश मंत्री एस जयशंकर से जब सवाल किया गया तो वो बोले थे, ''आप भारत के तेल ख़रीदने से चिंतित हैं लेकिन यूरोप जितना तेल एक दोपहर में ख़रीदता है, उतना भारत एक महीने में भी नहीं ख़रीदता है.''

जयशंकर का ये बयान तब काफी चर्चा में रहा था.

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