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क्या ट्रंप दोहरा सकते हैं सोवियत दौर की 'सस्ते तेल की साज़िश'
- Author, अनस्तासिया ज़िनोदा
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ यूक्रेन
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन के ख़िलाफ़ युद्ध में रूस को कथित तौर पर आर्थिक मदद देने वाली दो प्रमुख रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है.
इसे ट्रंप प्रशासन की ओर से की गई अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई बताया जा रहा है. साथ ही यह पहला मौक़ा है, जब ट्रंप प्रशासन ने सीधे तौर पर रूस पर आर्थिक दबाव डाला डाला है.
कहा जा रहा है कि ट्रंप तेल का इस्तेमाल कर यूक्रेन में शांति स्थापित करने के लिए मध्यस्थता कर सकते हैं.
पोलैंड के आलोचक और पत्रकार एडम मिचनिक ने एक बार कहा था, "इतिहास गवाह है कि हालात ने कम्युनिस्टों को समझदारी दिखाने और समझौते स्वीकार करने के लिए मजबूर किया था."
सोवियत संघ के मामले में तेल की क़ीमत एक बड़ी वजह थी. दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1970 और 1980 के दशकों में जब आर्थिक अस्थिरता थी तब तेल की क़ीमतों में बहुत उतार-चढ़ाव आया था.
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साल 1973 से 1974 और फिर 1978 से 1980 तक तेल की क़ीमतों में इज़ाफ़े ने महंगाई बढ़ाई, जो पहले से ही अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में अपने चरम पर थी.
ये देश उस समय आर्थिक मंदी और बेरोज़गारी से निपटने की कोशिश कर रहे थे और उन पर क़र्ज़ भी बढ़ रहा था.
इसी दौरान सोवियत संघ में निर्यात से होने वाली आमदनी बढ़ रही थी. इसने न केवल अपनी बेअसर लेकिन स्थिर अर्थव्यवस्था को बनाए रखा बल्कि औद्योगिक और सैन्य इंफ़्रास्ट्रक्चर की भी मदद की. हथियारों की दौड़ का फ़ायदा उठाते हुए इसने अफ़्रीका और एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाया था.
युद्ध और शांति
6 अक्तूबर 1973 को मिस्र और सीरिया के नेतृत्व में अरब राज्यों के गठबंधन ने इसराइल पर अचानक हमला बोल दिया, जिसे योम किप्पुर (यहूदी कैलेंडर का पवित्र दिन) युद्ध के नाम से जाना जाता है.
इस जंग में सोवियत संघ ने अरब राज्यों का, जबकि अमेरिका ने इसराइल का समर्थन किया. इसके जवाब में अरब देशों ने तेल की आपूर्ति कम कर दी और अमेरिका पर प्रतिबंध लगा दिए जिससे वहां तेल की क़ीमतें बढ़ गईं.
इतिहासकार और पुस्तक 'द प्राइज़: द एपिक क्वेस्ट फ़ॉर ऑयल, मनी एंड पावर' के लेखक डैनियल यरगिन कहते हैं कि 1973 में तेल पर पाबंदी ने दुनिया के ऊर्जा (तेल और गैस) बाज़ार को हिला कर रख दिया था.
"इसने क्षेत्रीय राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था को पुनर्गठित किया और ऊर्जा के आधुनिक युग की शुरुआत की."
इसके बाद जब 1979 में मिस्र-इसराइल शांति समझौते पर दस्तख़त हुए तो ईरान में क्रांति हो गई जिसने तेल के दूसरे संकट को जन्म दिया.
जीत और हार
हालांकि अमेरिका और पश्चिमी यूरोप को मंदी का सामना करना पड़ा, लेकिन सोवियत संघ ने अपेक्षाकृत स्थिरता बनाए रखी जिसे इसके ठहराव का दौर कहा जाता है.
खाड़ी देशों के बाहर साइबेरिया के पास तेल के सबसे बड़े भंडार खोजे गए.
तेल की बढ़ती क़ीमतों ने तेल निकालने के काम को बहुत फ़ायदेमंद बना दिया था. फिर, साल 1980 तक सोवियत संघ दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश बन गया था.
इससे क्यूबा और वियतनाम के साथ-साथ पूर्वी यूरोपीय सहयोगियों को कम क़ीमत पर सोवियत तेल मिल रहा था. इस तरह सोवियत संघ पर निर्भर रहने वाले देशों का एक नेटवर्क बन गया. पश्चिमी देशों को तेल के निर्यात से अच्छी आमदनी हो रही थी.
अचानक बड़े पैमाने पर पेट्रो-डॉलर मिलने से सोवियत संघ ने अनाज से लेकर औद्योगिक सामान और टेक्नोलॉजी तक, वह सब आयात किया जो उसकी समाजवादी अर्थव्यवस्था अब तक नहीं कर पा रही थी.
हालांकि, इसने सोवियत व्यवस्था में समस्याओं पर पर्दा डाल दिया. रक्षा ख़र्च के अलावा अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र के संसाधनों से तेल उद्योग में निवेश किया जा रहा था.
पश्चिमी देश भी इसी दिशा में बढ़ रहे थे. जर्मन चांसलर हेल्मुट कोल ने सोवियत संघ का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि यह 'रॉकेटों वाला बुर्किना फ़ासो' बन गया है.
उनका इशारा पश्चिमी अफ़्रीकी देश बुर्किना फ़ासो की ग़रीबी की तरफ था.
वक़्त और पैसा
अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ के हमले के बाद साल 1979 में अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने सोवियत संघ के टेक्नोलॉजी निर्यात पर पाबंदी लगा दी जिससे इसका तेल उत्पादन तुरंत प्रभावित हुआ.
1980 के दशक की शुरुआत में जब वैश्विक खपत में कमी शुरू हुई और तेल की क़ीमतें गिरने लगीं तो सोवियत बजट और ख़र्च को समर्थन देने वाली 'स्वर्णिम' आय का सिलसिला थम गया.
सोवियत नेताओं के लिए क़ीमतें बढ़ाना कोई विकल्प नहीं था. उधर, पोलैंड में हड़तालों और प्रदर्शनों के बाद मार्शल लॉ लागू हो गया था.
इसके बजाय, उन्होंने बजट के घाटे को पूरा करने के लिए क़र्ज़ लिया.
मशहूर किताब 'पोस्ट वॉर: ए हिस्ट्री ऑफ़ यूरोप सिंस 1945' के लेखक टोनी जूड के अनुसार सोवियत ब्लॉक न केवल उधार लिए गए पैसे पर बल्कि उधार लिए गए वक़्त पर जी रहा था.
डील होगी या नहीं?
साल 1980 और 1986 के बीच तेल की क़ीमत 35 डॉलर प्रति बैरल से गिरकर 10 से 15 डॉलर तक पहुंच गई.
पश्चिम ने मध्य-पूर्व से आयात कम करने के लिए ऊर्जा संरक्षण, बिजली की ओर बदलाव और घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया था.
लेकिन फिर यूक्रेन के राष्ट्रपति कार्यालय के प्रमुख आंद्रेई यरमक के अनुसार, यूक्रेन को "तेल की क़ीमतों में कमी और उत्पादन में वृद्धि करके रूस को नुक़सान पहुंचाने का मौक़ा मिला."
यरमक ने वॉल स्ट्रीट जर्नल में लिखा, "1986 में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और सऊदी अरब के शाह फ़हद ने तेल की क़ीमत कम करने की योजना बनाई. 10 डॉलर प्रति बैरल की कमी का मतलब था कि एक साल में सोवियत संघ को 10 अरब डॉलर का नुक़सान होगा."
उनका कहना था, "सऊदी अरब पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन में सबसे प्रभावशाली खिलाड़ी है. इसने 'ओपेक' को उत्पादन बढ़ाने के लिए राज़ी किया."
"अमेरिका ने भी तेल उत्पादन में बढ़ोतरी की और सोवियत संघ के टेक्नोलॉजी निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया. तेल की क़ीमतें अंदाज़े से कहीं ज़्यादा गिर गईं, यानी 12 डॉलर प्रति बैरल."
"सैन्य ख़र्चों के कारण सोवियत अर्थव्यवस्था को बहुत नुक़सान पहुंचा. बाद में जो हुआ, वह सबको पता है. 1991 में सोवियत संघ का अंत हो गया."
रीगन प्रशासन ने इस तरह के किसी भी समझौते से इनकार किया था, लेकिन इस मुद्दे पर आज तक अर्थशास्त्रियों, इतिहासकारों और राजनयिकों के बीच बहस जारी है.
असल में अर्थशास्त्री और यूरोप के थिंक टैंक 'सेंटर फ़ॉर एनालिसिस एंड स्ट्रैटेजीज़ इन यूरोप' (केस) के निदेशक दिमित्री नेक्रासोव ने इसे एक 'कॉन्सपिरेसी थिअरी' के रूप में ख़ारिज कर दिया है.
उनके मुताबिक़ ये "रिसर्च से साबित तथ्य नहीं है."
ऊर्जा निर्यात पर निर्भरता
जब मिख़ाइल गोर्बाचोफ़ साल 1985 में सोवियत संघ के नेता बने तो उन्होंने उम्मीद जताई थी कि तेल से होने वाली आमदनी ग्लासनोस्त (परामर्श और सहमति की नीति), अभिव्यक्ति की अधिक आज़ादी, पेरेस्त्रोइका (राजनीतिक सुधार) और आर्थिक उदारीकरण की फ़ंडिंग में मदद करेगी.
हालांकि सोवियत संघ उस समय तक दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश बन चुका था लेकिन अब वह अपनी घरेलू मांग या अपने ऊपर निर्भर सहयोगियों की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकता था.
ख़ास तौर पर जब क़ीमतों पर सब्सिडी थी और वैश्विक मंडी में क़ीमतें और मांग गिर गई थी.
जब सोवियत संघ ने सब्सिडी ख़त्म की तो सोवियत व्यवस्था टूटने लगी.
1980 के दशक के अंत तक पूर्वी यूरोप में क्रांतियों और अलग-अलग देशों के बनने के बाद 25 दिसंबर 1991 को रूसी राष्ट्रपति भवन के झंडे से हथौड़ा और हंसिया का निशान हटा दिया गया और उसकी जगह रूसी तिरंगे ने ले ली.
लेकिन सोवियत संघ की तरह आधुनिक रूस की अर्थव्यवस्था भी ऊर्जा निर्यात पर निर्भर करती है.
यरमक लिखते हैं कि रूस की अर्थव्यवस्था "देश के प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है, जैसा कि सोवियत काल में था."
"हाल के वर्षों में तेल और गैस का रूसी निर्यात में 60 फ़ीसद और देश के राजस्व में 40 फ़ीसद हिस्सा रहा है."
पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में दुनिया के दो सबसे अधिक आबादी वाले देश चीन और भारत शामिल हैं.
वहीं तुर्की भी रूस से तेल ख़रीदता है.
रूस तेल से जो अरबों डॉलर कमाता है उसे यूक्रेन में जंग की फ़ंडिंग के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.
ड्रिल बेबी, ड्रिल!
ट्रंप ने जनवरी 2025 में दोबारा राष्ट्रपति बनने पर अपने पहले भाषण में 'ड्रिल बेबी, ड्रिल' नीति की घोषणा की थी, जिसका मतलब स्थानीय स्तर पर ईंधन उत्पादन को बढ़ाना था.
कुछ लोगों का मानना है कि वह रीगन के रास्ते पर चल सकते हैं. रीगन ने एक बार सोवियत संघ को 'शैतानी साम्राज्य' कहा था.
यरमक कहते हैं कि अमेरिका तेल की क़ीमतों में कमी लाकर और उत्पादन बढ़ाकर रूस की कमाई को नुक़सान पहुंचा सकता है.
हालांकि फ़िलहाल ट्रंप के लगाए नए प्रतिबंधों ने वैश्विक स्तर पर तेल की क़ीमतों को बढ़ा दिया है. इस वक़्त ब्रेंट की क़ीमत पांच फ़ीसद के इज़ाफ़े के बाद 65 डॉलर प्रति बैरल है.
लेकिन रूसी कच्चा तेल यूराल्स ब्रेंट से कुछ सस्ता होता है. प्रतिबंधों के कारण यह ख़रीदारों के लिए समस्याएं खड़ी कर सकता है. ख़रीदार इसकी क़ीमत में और कमी की मांग कर सकते हैं.
रूस का अतीत और भविष्य
इस बीच रूसी ऑयल रिफ़ाइनरियों और ऊर्जा के बुनियादी ढांचे पर यूक्रेन के हमले तेज़ हो रहे हैं.
क्या यह कोशिशें रूस के लिए जंग के ख़र्च को सहना मुश्किल बना देंगी, यह देखना अभी बाक़ी है.
बीबीसी रूसी सेवा के आर्थिक मामलों के संपादक -ओल्गा शेमीना/ ओल्गा इवशिना का मानना है कि आधुनिक रूसी अर्थव्यवस्था में ऊर्जा निर्यात पर निर्भरता सोवियत दौर से अलग है.
उस वक़्त तेल की गिरती क़ीमतों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी लेकिन सोवियत आर्थिक व्यवस्था का असल मुद्दा इसका असरदार न होना था. हालांकि, इस बार यूक्रेन युद्ध से पहले रूसी अर्थव्यवस्था मज़बूत थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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