दिल्ली को 'राज्य' का दर्जा क्यों दिया गया था?

    • Author, विवेक शुक्ला
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

बीजेपी और आम आदमी पार्टी के बीच शक्तियों के बंटवारे का मुद्दा हमेशा टकराव भरा रहा है. लेकिन पिछले दो महीनों में ये तनातनी एक नए स्तर पर पहुंचती दिख रही है.

सुप्रीम कोर्ट ने बीती 11 मई को इस मामले में दिल्ली सरकार के पक्ष में फ़ैसला सुनाया है.

शीर्ष अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा था कि अधिकारियों के ट्रांसफ़र और पोस्टिंग का अधिकार दिल्ली सरकार के पास होना चाहिए.

लेकिन केंद्र सरकार ने इस फ़ैसले के तुरंत बाद एक अध्यादेश जारी किया जिसके तहत अधिकारियों की ट्रांसफ़र और पोस्टिंग से जुड़ा आख़िरी फैसला लेने का हक़ उपराज्यपाल को वापस दे दिया गया है.

इस मुद्दे पर दोनों दलों के बीच मतभेद इतने गंभीर हैं कि अरविंद केजरीवाल ने बीती 23 जून को पटना में हुई विपक्षी दलों की बैठक में ये मुद्दा उठाए जाने की मांग की थी.

चौधरी ब्रह्म प्रकाश से केजरीवाल तक

लेकिन दिल्ली में केन्द्र सरकार और आप सरकार के बीच चल रही महाभारत दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश की याद आती है.

चौधरी ब्रह्म प्रकाश दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आईसीसी) के कॉफी शॉप में अपने दोस्तों के साथ बातचीत में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृह मंत्री गोविन्द बल्लभ पंत को ले ही आते थे.

फिर उनका दर्द छलकने लगता था.

वे कहते थे, “दिल्ली में मैं अच्छे तरीके से सरकार चला रहा था पर नेहरू जी और पंत जी ने मुझे मुख्यमंत्री के पद से इसलिए हटा दिया था क्योंकि मैं दिल्ली सरकार के लिए अधिक शक्तियों की मांग करने लगा था."

"आप बताओ कि क्या मैं कोई अपराध कर रहा था? मुझे हटाकर गुरुमुख निहाल सिंह को मुख्यमंत्री बना दिया गया था.”

ब्रह्म प्रकाश 17 मार्च 1952 से 12 फरवरी 1955 तक दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे. उनके बाद दरियागंज से विधायक गुरुमुख निहाल सिंह दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे.

फिर केन्द्र सरकार ने एक अक्तूबर 1956 को दिल्ली विधानसभा समाप्त कर दी. गुरुमुख निहाल सिंह के पुत्र एस. निहाल सिंह इंडियन एक्सप्रेस के संपादक भी रहे.

ऐसे में 1956 से लेकर 1993 तक दिल्ली पर केन्द्र सरकार का सीधा नियंत्रण रहा. हां, इस दौरान दिल्ली नगर निगम और महानगर परिषद अवश्य गठित हुईं.

दिल्ली को कैसे मिली विधानसभा

लेकिन सवाल ये उठता है कि साल 1956 में विधानसभा भंग होने के बाद 1993 में दिल्ली को एक बार फिर विधानसभा कैसे मिली.

इसकी शुरुआत साल 1956 में दिल्ली विधानसभा भंग होने के साथ हुई. भाजपा (पहले जनसंघ) और कांग्रेस की तरफ से लगातार मांग होती रही कि दिल्ली को पूर्ण विधानसभा मिले.

हालांकि, ये मांग उठाने में भाजपा सबसे आगे थी. क्योंकि भाजपा को दिल्ली अपनी सी लगती थी. उसका यहां जनाधार भी था. दिल्ली के कनॉट प्लेस के क़रीब राजा बाजार के रघुमल कन्या विद्यालय में ही साल 1951 में जनसंघ की स्थापना हुई थी.

भाजपा के वयोवृद्ध नेता विजय कुमार मल्होत्रा कहते हैं कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग ने 1970 के दशक में फिर से जोर पकड़ा था.

उसी दौर में श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1975 में देश में इमरजेंसी लागू की थी और फिर 1977 में केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बनी थी. तब जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया था.

तब जनसंघ के नेता जैसे मदन लाल खुराना, केदारनाथ साहनी, विजय कुमार मल्होत्रा वगैरह के नेतृत्व में मांग हो रही थी कि दिल्ली के चौतरफा विकास के लिए इसे पूर्ण राज्य का दर्जा देना जरूरी है. तब तक यहां महानगर परिषद और नगर निगम काम कर रही थी.

अपने को राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बनाये रखने के लिए कांग्रेस की तरफ से भी दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने की मांग उठने लगी.

दिल्ली देहात के नेता और 1989 में बाहरी दिल्ली से जनता पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीतने वाले चौधरी तारीफ सिंह कहते हैं 1980 के दशक के अंतिम सालों में तो यह मांग बहुत मुखर हो गई. लगातार धरने-प्रदर्शन होने लगे.

इस बीच, भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा) 1984 में बन चुकी थी. साल 1984 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को दिल्ली में करारी हार मिली थी. उसके सभी बड़े नेता लोकसभा चुनाव हार गए.

तब भाजपा को लगा कि वो दिल्ली को पूर्ण राज्य दिलाने की मांग फिर से उठाएगी. इस मांग के चलते दिल्ली में राजनीतिक हलचल तेज हो गई. अब तक मदन लाल खुराना दिल्ली भाजपा के सबसे बड़े नेता के रूप में उभर चुके थे. उन्हें ‘दिल्ली का शेर’ कहा जाने लगा. वे पहाड़गंज के एक सरकारी स्कूल के अध्यापक की अपनी छवि से बाहर निकल चुके थे.

बालकृष्ण कमेटी की सिफारिश

खैर, केन्द्र सरकार ने 1987 में जस्टिस आरएस सरकारिया की अगुवाई में एक कमेटी बनाई. बाद में इसका नाम जस्टिस बाल कृष्ण कमेटी कर दिया गया क्योंकि सरकारिया साहब ने इस्तीफ़ा दे दिया था.

इस कमेटी को पता लगाना था कि दिल्ली की व्यवस्था का पुनर्गठन कितना ज़रूरी है. बाल कृष्ण कमेटी ने दिल्ली के विभिन्न अहम सियासी दलों और प्रबुद्ध नागरिकों से बात की.

सबकी राय थी कि इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना चाहिए. इसके अभाव में राष्ट्रीय राजधानी का विकास नहीं हो रहा है.

इसके बाद बालकृष्ण कमेटी की सिफारिशों को मानते हुए केन्द्र सरकार ने मई 1990 में संसद में एक बिल पेश किया. इसका मकसद दिल्ली को राज्य का दर्जा देना था.

साल 1991 में दिल्ली को राज्य का दर्जा तो मिल गया और 1993 के विधानसभा चुनाव में मदन लाल खुराना दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गये.

लेकिन कह सकते हैं कि दिल्ली विधानसभा को सिर्फ सांकेतिक शक्तियां ही मिलीं. दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना तो दूर की कौड़ी ही बनी रही.

आगे के सालों में केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी और दिल्ली में शीला दीक्षित मुख्यमंत्री रहीं. पर कुल मिलाकर दिल्ली सरकार का काम बिना किसी बाधा या अवरोध के चलता रहा.

हां, दिल्ली सरकार को अधिक अधिकार देने की भी मांग होती रही.

विवाद के समय की शुरूआत

लेकिन 2014 में आम आदमी पार्टी (आप) के दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के बाद केन्द्र और दिल्ली सरकार के बीच पहले वाला सौहार्द और तालमेल ख़त्म हो गया.

केन्द्र में नरेन्द्र मोदी सरकार और दिल्ली में केजरीवाल सरकार के बीच शक्तियों के बंटवारे के बिन्दु पर अनवरत महाभारत शुरू हो गई.

इसकी वजह है दिल्ली के लिए केंद्र सरकार बीती 19 मई को अध्यादेश ले आई. सुप्रीम कोर्ट के 11 मई के फैसले के बाद इसे लाया गया है.

अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि अध्यादेश के जरिये सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की साजिश की गई है.

सुप्रीम कोर्ट ने अफसरों की ट्रांसफर और पोस्टिंग को लेकर दिल्ली सरकार के पक्ष में फैसला दिया था. अध्यादेश के तहत राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण के गठन की बात कही गई है.

अध्यादेश कहता है कि ट्रांसफर-पोस्टिंग और विजिलेंस का काम राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण देखेगा.

दिल्ली के मुख्यमंत्री इस प्राधिकरण के पदेन प्रमुख होंगे. दिल्ली के प्रधान गृह सचिव पदेन सचिव होंगे. दिल्ली के मुख्य सचिव, प्रधान गृह सचिव प्राधिकरण के सचिव होंगे. ट्रांसफर-पोस्टिंग का फैसला अकेले मुख्यमंत्री नहीं करेंगे.

बहुमत के आधार पर प्राधिकरण फैसला लेगा और आखिरी फैसला उपराज्यपाल का मान्य होगा. तो केन्द्र के अध्यादेश लाने से ही सारा विवाद गहराया है.

दिल्ली में चल रही सियासी हलचल पर पूर्व आईएएस अफसर और लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के पूर्व निदेशक संजीव चोपड़ा कहते हैं कि दिल्ली की स्थिति साफ नहीं है. दिल्ली ना पूर्ण राज्य है और ना ही केन्द्र शासित प्रदेश. इसे "राष्ट्रीय राजधानी"का दर्जा हासिल है.

संजीव चोपड़ा कहते हैं. “मैं मानता हूं कि दिल्ली आबादी के लिहाज से देश के बड़े राज्यों में शुमार होता है. इसको लेकर केन्द्र सरकार को कोई साफ नीति बना लेनी चाहिए. दिल्ली में विवाद की स्थिति इसलिए ही बनी रहती है क्योंकि शक्तियों का बंटवारा साफ नहीं हैं,”

उन्होंने 'We, the People of the States of Bharat' नाम से हाल ही में एक किताब लिखी है, जिसमें राज्यों के गठन की प्रक्रिया और शक्तियों पर फोकस रखा है.

फिर भी नहीं लगा विवाद पर विराम

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद लगा था कि दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यपाल के बीच विवाद पर विराम लग गया है.

दिल्ली सरकार बनाम उप-राज्यपाल के अधिकार में टकराव की स्थिति ख़त्म करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि पुलिस, कानून व्यवस्था और जमीन को छोड़कर बाकी अधिकार जैसे अफसरों का तबादला और पोस्टिंग जैसे अधिकार दिल्ली सरकार के पास रहेंगे.

इसके बाद केंद्र सरकार दिल्ली मे सर्विसेज़ के अधिकार पर अध्यादेश लेकर आ गई.

इस विवाद पर दिल्ली सरकार के पूर्व मुख्य सचिव पी.के. त्रिपाठी कहते हैं कि फिलहाल स्थिति यह है कि सरकारी अफसरों को पता ही नहीं है कि “वे किसके प्रति जवाबदेह है. वे तो अब सबके ही जवाबदेह हो गए हैं, उन्हें सोच-समझकर फैसले लेने होंगे. उन्हें देखना होगा कि उन्हें जो आदेश मिल रहे हैं, वे कितने ठीक या गलत हैं.”

उन्होंने कहा है कि ये संभव है कि कुछ लोगों को लगे कि यह शक्तियों के विकेन्द्रीकरण पर नया विवाद है. पर विवाद तो बहुत पुराना है. पी.के. त्रिपाठी शीला दीक्षित के दौर में मुख्य सचिव थे.

कांग्रेस इस मुद्दे पर मोदी सरकार के साथ क्यों?

दिलचस्प बात ये है कि दिल्ली में केन्द्र सरकार बनाम दिल्ली सरकार के बीच चल रही तनातनी में कांग्रेस मोदी सरकार के साथ खड़ी नज़र आ रही है.

कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेता अजय माकन और संदीप दीक्षित लगातार केजरीवाल सरकार पर हल्ला बोल रहे हैं.

इनका दावा है कि दिल्ली में मुख्यमंत्री केजरीवाल एक इस तरह का विशेष अधिकार चाहते हैं, जो दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्रियों को भी नहीं मिला.

माकन कहते हैं कि केन्द्र सरकार दिल्ली की सालाना विभिन्न सेवाओं पर लगभग 37,500 करोड़ रुपये खर्च करती है, जिस वित्तीय बोझ को दिल्ली सरकार साझा नहीं करती है.

माकन यह भी कहते हैं कि दिल्ली मात्र एक राज्य या केंद्र शासित प्रदेश नहीं है; यह "राष्ट्रीय राजधानी" है. यह संघ का है और इस प्रकार प्रत्येक भारतीय नागरिक का है. दिल्ली के निवासी इस स्थिति से लाभान्वित होते हैं.

अजय माकन ने बताते हैं कि बाबा साहेब अंबेडकर के नेतृत्व में गठित एक समिति ने 21 अक्टूबर, 1947 को दिल्ली को लेकर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी.

इसमें कहा गया था “जहां तक दिल्ली का संबंध है, हमें ऐसा लगता है कि भारत की राजधानी को शायद ही किसी स्थानीय प्रशासन के अधीन रखा जा सकता है. संयुक्त राज्य अमेरिका में, कांग्रेस ‘सत्ता के केन्द्र’ के संबंध में विशिष्ट विधायी शक्तियों का प्रयोग करती है और ऑस्ट्रेलिया में भी यही प्रक्रिया अपनाई जाती है.”

किसके नरंकुश होने का खतरा

इस बीच, आम आदमी पार्टी (आप) के तिमारपुर से पूर्व विधायक और दिल्ली यूनिवर्सिटी में लंबे समय तक हिंदी पढ़ाते रहे प्रो. हरीश खन्ना कहते हैं कि दिल्ली की स्थिति विशेष तो है. यहां पर विदेशी दूतावास और उच्चायोग भी हैं. इसलिए इसे दिल्ली सरकार को पूरी तरह से नहीं सौंपा जा सकता. पर केन्द्र सरकार को भी उपराज्यपाल के जरिए दिल्ली सरकार के कामकाज में हस्तेक्षप बंद करने होंगे.

वह कहते हैं, “ना तो केन्द्र सरकार को सारी शक्तियां दी जा सकती और ना ही दिल्ली सरकार को. अगर ये हुआ तो इनके निरंकुश होने की आशंका रहेगी. इसलिए कोई बीच का रस्ता निकालना होगा ताकि दिल्ली में विकास कार्य होते रहेंगे. फिलहाल तो हालत बहुत चिंताजनक है. इस कारण दिल्ली की जनता को कष्ट हो रहा है.”

अभी तो लगता कि केन्द्र सरकार की तरफ से लाए गए अध्यादेश के कारण पैदा हुआ सियासी कोहराम खत्म होगा.

हां, कहने वाले कह रहे हैं कि चौधरी ब्रह्म प्रकाश की दिल्ली सरकार को अधिक मांगे देने के मसले पर 1956 में प्रधानमंत्री नेहरू ने अपनी कांग्रेस सरकार को बर्खास्त करके दिल्ली विधानसभा को एक नगर निगम में बदल दिया था. क्या वो ही स्थिति फिर तो नहीं बन रही? क्या इतिहास अपने को दोहरा सकता है?

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