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क्या नक्सली सचमुच कमज़ोर हो रहे हैं?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बस्तर से, बीबीसी संवाददाता
क्या माओवादी छापामार अब पीछे की तरफ हट रहे हैं ?
क्या सुरक्षा बल उन्हें पीछे धकेलने में कामयाब हुए हैं? सरकार का दावा है कि माओवादी हिंसा में आई कमी इस बात का संकेत है कि माओवादियों का आधार खिसक रहा है और वो कमज़ोर पड़ते जा रहे हैं.
नक्सल प्रभावित राज्यों के अधिकारियों के साथ हुई एक बैठक में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने दावा किया कि कई सालों की तुलना में पिछले एक दो सालों के दौरान नक्सली हिंसा में 42 प्रतिशत की कमी आयी है. यह आंकड़े पूर्वी और मध्य भारत के नक्सल प्रभावित सभी राज्यों की समीक्षा के बाद सामने सामने आए हैं.
नक्सली हिंसा से सबसे ज़्यादा प्रभावित छत्तीसगढ़ राज्य में भी सरकार का दावा है कि नक्सली कमज़ोर पड़ते जा रहे हैं.
पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारियों का कहना है कि इसके कई कारण हैं. एक तो कई बड़े नेताओं का पकड़ा जाना और फिर सुरक्षा बलों द्वारा बड़े पैमाने पर चलाया जा रहा नक्सल विरोधी अभियान.
राज्य सरकार का दावा है कि इस अभियान के दौरान राज्य की पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में कई माओवादी मारे गए हैं.
मगर सरकार के दावों के बावजूद कई ऐसी मुठभेड़ की घटनाएं हैं जिनको लेकर विवाद छिड़ा हुआ है.
माओवादियों का भी दावा है कि कई ऐसी घटनाएं हैं जिनमें "ग्रामीणों को क्रूरता से मारा गया."
कोंडागांव ज़िले के वेड़मा गांव के रहने वाले जेठ कोर्राम और कुदूरू गांव के बोती कश्यप के बारे में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दंडकारण्य विशेष जोनल कमेटी ने बयान जारी कर कहा है कि इन दोनों ग्रामीणों को इस साल की शुरुआत में ही कुडूरी के साप्ताहिक हाट से गिरफ्तार किया गया था.
अगले दिन बस्तर पुलिस के आईजी एसआरपी कल्लूरी ने दावा किया कि दोनों ही इनामी नक्सली थे जिन्हें मुठभेड़ में मार गिराया गया.
माओवादियों का कहना है कि उसी तरह जनवरी में ही छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित सेंदरा गांव में एक स्थानीय युवक विनोद की पुलिस के साथ हुई कथित मुठभेड़ में मौत का मामला हो या फिर बीजापुर ज़िले के जोजोड़ गांव में पांच लोगों की कथित मुठभेड़ में हुई मौत का मामला हो, सभी में पुलिस ने निर्दोष लोगों को ही मारा है.
मगर पुलिस के अधिकारी माओवादियों के दावों को ख़ारिज करते हैं.
उनका कहना कि अक्टूबर में ओडिशा के मलकानगिरी में आंध्र प्रदेश पुलिस के विशेष 'ग्रे हाउंड' दस्ते ने 28 माओवादी छापामारों को मुठभेड़ में मार दिया था.
मारे गए माओवादियों में संगठन के कुछ शीर्ष कमांडर भी शामिल थे.
पुलिस के अधिकारियों ने मुठभेड़ के बाद माओवादियों की विज्ञप्ति का हवाला देते हुए कहा कि बयान में खुद माओवादियों ने स्वीकार किया है कि पिछले 40 सालों में उन्हें एकसाथ इतना बड़ा नुकसान नहीं उठाना पड़ा है.
पुलिस का दावा है कि इस 'पुनर्वास' नीति की वजह से ही बस्तर संभाग में 1800 से ज़्यादा नक्सलियों ने पिछले एक साल के दौरान पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया है.
मगर आंतरिक सुरक्षा पर नज़र रखने वालों का कहना है कि जिन लोगों के आत्मसमर्पण का पुलिस दावा कर रही है उनमें से सिर्फ एक्का दुक्का लोगों ने ही किसी आधुनिक हथियार के साथ समर्पण किया है.
आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए पुलिस की पुनर्वास नीति के यह पोस्टर बस्तर संभाग हर इलाक़े में लगे हुए हैं जिसमें कहा गया है, "आत्मसमर्पित नक्सली के निवास हेतु सुरक्षित स्थान पर आवास भूमि एवं मकान बनाने हेतु आवश्यक राशि. आत्मसमर्पित नक्सली की शैक्षणिक योग्यता के अनुसार शासकीय सेवा अथवा सुरक्षित स्थान पर कृषि योग्य भूमि अथवा स्वयं का व्यवसाय चलाने के लिए प्रशिक्षण एवं आवश्यक लागत राशि. आत्मसमर्पित नक्सली के पुनर्वास अंतर्गत उसे कैडर के अनुसार पुनर्वास राहत राशि का भुगतान, जो 50000 से 12 लाख रूपए तक हो सकता है."
आत्मसमर्पण के इस 'पैकेज' को प्रमुखता के साथ बताया गया है जिसमें अलग अलग हथियारों के साथ समर्पण करने वालों के लिए अलग अलग 'इनाम राशि' को दर्शाया गया है.
मिसाल के तौर पर एलएमजी यानी 'लाइट मशीन गन' के साथ समर्पण करने वाले नक्सलियों को 4.5 लाख रूपए, एके - 47 राइफल के साथ 3 लाख रूपए, एसएलआर 1 . 5 लाख रूपए, .303 राइफल 75 हज़ार रूपए, और 12 'बोर' यानी भरमार देसी बंदूक़ के साथ 30 हज़ार रूपए देने का प्रावधान किया है.
तो सवाल उठता है कि क्या आत्मसमर्पण करने वाले बस्तर के आदिवासी सचमुच नक्सली थे ?
यह सवाल पुलिस के आला अधिकारियों को नागवार गुजरता है.
आंतरिक सुरक्षा पर नज़र रखने वाले, ख़ास तौर पर जिन्होंने माओवाद को क़रीब से समझने की कोशिश की है मानते हैं कि यह समझ लेना कि नक्सली कमज़ोर हुए हैं और नक्सल विरोधी अभियान सफल रहा है, जल्दबाज़ी होगी.
विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिस का खुफिया तंत्र बड़े नक्सली नेताओं के बारे में पता लागाने में उतना कामयाब नहीं रहा है.
अब मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ पुलिस ने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सचिव गणपति की जो तस्वीर अपने 'फ़ेसबुक' पर जारी कर पांच करोड़ रुपये की घोषणा की है वो तीस साल पुरानी बताई जाती है. यानी साठ साल की उम्र से भी ज़्यादा के गणपति अब कैसे दिखते हैं उसके बारे में पुलिस को कोई जानकारी नहीं है.
उसी तरह संगठन की प्रथम पंक्ति के सिर्फ़ कुछ ही नेताओं की जानकारी पुलिस के पास है.
दूसरी पंक्ति के नेताओं के बारे में सुरक्षा एजेंसियों को ना तो यह पता है कि वो दिखते कैसे हैं, उनके नाम क्या हैं और वो कहाँ शरण लिए हुए हैं?
वैसे माओवादियों के काम करने का तरीका कुछ अलग है. 'एक नाम के पीछे कई चेहरे और एक चेहरे के पीछे कई नाम' की नीति पर यह संगठन काम करता है.
जैसे अब तक जो संगठन की दंडकारण्य विशेष ज़ोनल समिति का प्रवक्ता हुआ करता था उसका नाम 'गुडसा उसेंडी' ही हुआ करता था चाहे उसके पीछे कोई भी चेहरा हो.
सरताज अली सलवा जुडूम के संस्थापकों में से एक हैं. बस्तर के दरभा के इलाक़े की झीरम घाटी में वो उस दिन मौजूद थे जब माओवादियों ने कांग्रेस के 28 नेताओं की हत्या कर दी थी.
मरने वालों में सलवा जुडूम के संस्थापक महेंद्र कर्मा भी थे. आज सरताज अली पुलिस के नक्सल विरोधी अभियान की कामयाबी के दावों पर सवाल उठा रहे हैं.
सरताज कहते हैं कि हाईवे पर हर पांच किलोमीटर पर सुरक्षा बलों का एक कैंप है.
उनका कहना है, "जहां सुरक्षा बलों का कैंप होता है उसके पांच किलोमीटर के दायरे में वैसे भी माओवादियों की कोई हलचल नहीं होती है. एक सड़क के आस-पास अभियान चलाकर दावा करना कि माओवादी पीछे हट रहे हैं, ग़लत है. आज मर कौन रहा है? गाँव के लोग मर रहे हैं. नक्सलियों का कोई बड़ा नाम आपको पुलिस की लिस्ट में नज़र नहीं आएगा. सिर्फ भरमार बंदूक और कट्टे वालों को पकड़ कर सरकार नक्सल विरोधी अभियान की सफलता का दावा कर रही है."
छत्तीसगढ़ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के मनीष कुंजाम सहित कई ऐसे राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं जिन्हें लगता है कि अगर पुलिस इसी तरह बस्तर में माओवादियों की बजाय आम आदिवासियों को निशाना बनाते रहेगी तो इससे माओवादी ही मज़बूत होते रहेंगे.
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