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क्या हल्दी सचमुच आपकी सेहत निखारती है?
- Author, माइकल मोज़ली
- पदनाम, प्रेज़ेंटर, बीबीसी टू
हल्दी के सेहत संबंधी गुणों को लेकर लंबे चौड़े वायदे किए जा रहे हैं.
क्या इसमें कुछ सच्चाई भी है?
आज कल दावे किए जा रहे हैं कि अवसाद से लेकर एलर्जी तक हल्दी कुछ भी ठीक कर सकती है. इसलिए यह ट्रेंड में है. इसका इस्तेमाल खाने में न सिर्फ़ मसाले के रूप में किया जा रहा है, बल्कि इसे चाय में भी मिलाया जाने लगा है.
हल्दी में तक़रीबन 200 तरह के रसायन पाए जाते हैं. पर वैज्ञानिकों की दिलचस्पी सबसे ज़्यादा सर्क्यूमिन रसायन में है. इससे हल्दी का रंग पीला है.
हल्दी और सर्क्यूमिन पर हज़ारों शोध पत्र छप चुके हैं. कुछ के नतीजे काफ़ी अच्छे रहे हैं. पर ये सभी प्रयोग चूहों पर किए गए हैं और उनमें काफ़ी अधिक मात्रा में हल्दी का इस्तेमाल किया गया है.
मनुष्य पर हल्दी के निहायत ही कम प्रयोग हुए हैं.
इसलिए हमने पूरे देश के तमाम महत्वपूर्ण शोधकर्ताओं का पता लगाया और पूर्वोत्तर के तक़रीबन 1,000 स्वयंसेवकों की मदद ली.
हमने एक समूह से छह हफ़्ते तक रोज़ाना एक चम्मच हल्दी भोजन में मिला कर खाने को कहा.
दूसरे समूह से समान मात्रा में हल्दी मिला एक सप्लीमेंट उतने ही समय तक खाने को कहा गया. तीसरे समूह को हल्दी से मिलती जुलती एक दवा दी गई.
पहले समूह के स्वयंसेवकों ने दूध या दही में मिला कर हल्दी खाई और उसके स्वाद को 'दिलचस्प' या 'थोड़ा कड़ा' पाया.
हमने यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन के लोगों पर इसका प्रयोग किया. इस कॉलेज के प्रोफ़ेसर मार्टिन विड्सवेंटर की दिलचस्पी हल्दी में नहीं है. पर वे यह जानना चाहते हैं कि कैंसर कैसे होता है.
हमने उनसे कहा कि वे हमारे स्वयंसेवकों की रक्त कोशिकाओं के पैटर्न का अध्ययन प्रयोग शुरू होने के पहले और बाद में करें और उसमें बदलाव के बारे में बताएं.
उन्होंने हल्दी पर प्रयोग किया. जिन लोगों ने हल्दी का सप्लीमेंट लिया था या दवाएं ली थीं, उनकी रक्त कोशिकाओं के पैटर्न में कोई अंतर नहीं पाया गया.
प्रोफ़ेसर मार्टिन विड्सवेंटर ने कहा, "जिस समूह ने अपने खाने में हल्दी मिलाई थी, उनकी कोशिकाओं में महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए. एक ख़ास क़िस्म के जीन में सबसे बड़ा अंतर देखा गया. यह जीन अवसाद, दमा, खाज और कैंसर से जुड़ा होता है."
हमने अंतर सिर्फ़ उनमें पाया जिहोंने हल्दी खाई थी. यह अंतर उनमें देखने को नहीं मिला, जिन्होंने हल्दी का सप्लीमेंट लिया था.
न्यू कैसल यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ लेक्चरर डॉक्टर कर्स्टन ब्रैंट ने इस प्रयोग में मदद की थी. उनका मानना है कि हल्दी कैसे ली जाती है, इससे शायद कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है.
उन्होंने कहा, "यह हो सकता है कि हल्दी को गर्म करने से इसके रसायन ज़्यादा घुलनशील हो जाते हों. हल्दी को सोखने में इससे मदद मिलती हो यह मुमकिन है. इससे हमें ये पता लगाने में मदद मिलती है कि वास्तव में होता क्या है."
वह कहती हैं कि प्रयोग में शामिल स्वयंसेवकों ने अलग-अलग तरीक़े से हल्दी ली थी. हम यह विश्वास से कह सकते हैं कि असर हल्दी का ही हुआ. यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हल्दी किस तरीक़े से ली गई थी.
इस विषय पर अभी बहुत प्रयोग किए जाने की ज़रूरत है. नतीजों की पुष्टि करने के लिए इन प्रयोगों को बार-बार किए जाने की भी ज़रूरत है.
पर प्रयोग से जो नतीजे सामने आए हैं, क्या उसके बाद हमें हल्दी का अधिक इस्तेमाल करना चाहिए?
मैने इसका अलग-अलग रूप में प्रयोग करना शुरू कर दिया है. मैंने इसे ऑमलेट के साथ मिर्च मिला कर लेना शुरू कर दिया है.