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राज कचौड़ी का ज़ायक़ा

Neil CurryNeil Curry|सोमवार, 08 अक्तूबर 2012, 23:17 IST

मैं हमेशा खाने के बारे में सोचता हूँ लेकिन इस हफ़्ते मैं इस बारे में कुछ हैरान-परेशान हूँ.

मैं ये समझने का प्रयास कर रहा हूँ कि राज कचौड़ी इतना स्वादिष्ट व्यंजन क्यों है.

क्या ये ठंडे-ठंडे दही और राज कचौड़ी में इस्तेमाल होने वाली करारी चीज़ों का मिश्रण है?

क्या ये इस व्यंजन में पाए जाने वाले आलू के विभिन्न स्वरूप और अंकुरित दाल के मेल से पैदा होने वाला जादू है?

क्या ये इसमें कभी-कभी पाए जाने वाले अनार के दानों और रहस्यमई हरी चटनी का खेल है?

मुझे नहीं पता...और असल में मुझे परवाह भी नहीं...जब तक कि राज कचौड़ी स्वादिष्ट हो...

मुझे नहीं परवाह कि मुझे राज कचौड़ी कहाँ मिलती है और किस तरह की प्लेट में परोसी जाती है.

मुझे इस बात की परवाह भी नहीं कि मैं किस तरह की हिलती-डुलती कुर्सी पर बैठे इसे खाता हूँ या फिर मेरी पसंद के ख़िलाफ़ एक विशालकाय फ़र्राटेदार पंखा मेरे चेहरे और सिर को ही उड़ा देने वाली हवा मुझ पर फेंक रहा हो.

राज कचौड़ी खाते समय मुझे वाहनों के हॉर्न और भौंकते हुए कुत्तों की आवाज़ों का भी कोई एहसास नहीं रहता है.

ये सही है कि जैसे ही आप राज कचौड़ी को खाने लगते हैं तो ये दलदल में ग़ोते लगाने के समान लगता है लेकिन इससे इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है.

और फिर...भगवान आपका भला करे...लस्सी को कौन भूल सकता है?

मुझे नहीं पता कि आपकी इस बारे में क्या सोच है लेकिन मेरे विचार में बेहतरीन लस्सी के गिलास के ज़रिए आप निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं.

यदि मिट्टी का कुल्हड़ और बड़ा हो तो मैं तो उसमें नहाने के लिए भी तैयार हूँ.
मैंने इस बारे में किसी से चर्चा तो नहीं की है लेकिन मुझे लगता है कि असली लस्सी में ठंडे-ठंडे कुल्हड़ में ऊपरी आधा इंच गाढ़ा दही होना चाहिए.
असली लस्सी में तो इतना गाढ़ा होता है कि इसे चम्मच से ही खाया जा सकता है.

बाक़ी की लस्सी तो पी जा सकती है लेकिन ख़ाली कुल्लड़ में चम्मच डाल कर जो कुछ ही उसके भीतर बचा रह गया हो उसे खुरचने से रहा नहीं जा सकता है.

और हाँ...फिर कुल्हड़ का भी सवाल है...ऐसा क्यों कि कोई भी इसे दोबारा इस्तेमाल ही नहीं करना चाहता? मैं एक दिन काफ़ी सारे ख़ाली कुल्हड़ अपने नज़दीक के ढाबे में ले गया.

लेकिन ढाबे के मालिक ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने उसे ये कह दिया हो कि उसकी माता जी की रातों-रात दाढ़ी उग आई है.

जब उसने अपने ढाबे के वेटरों से बात की तो वे अचानक ही काम में ख़ासे व्यस्त नज़र आने लगे या फिर ऐसे दिखे जैसे वे बाथरूम जाने का बहाना बना रहे हों.

ऐसा लगा कि वे कुछ भी करने को तैयार हैं लेकिन लस्सी के दीवाने इस विदेशी व्यक्ति से जूझना नहीं चाहते जो मिट्टी के छोटे-छोटे कुल्हड़ उनके हाथ में थमाने पर आमादा है.

कुछ शर्मिंदगी ज़रूर महसूस हुई लेकिन मुझे लगता है शायद ये ज़रूरी था. पता नहीं मेरे ऐसा करने से कोई सोचने पर मजबूर हुआ या नहीं...

अब बात करें सिज़लर की...ये दुनिया के किस भाग से आया?

भोजन के इस मक्का के इतने सारे रेस्तरां बेहतरीन तरीक़े से बने खाने को धुँए की धुँध में परोसने का पागलपन क्यों करते हैं?

यही नहीं इसे परोसते समय वेटर का वो हाल होता है जैसे उसका दम घुटा जा रहा हो. गुस्ताख़ी माफ़...लेकिन मुझे व्यंजन परोसने का ये तरीक़ा समझ में नहीं आया.

हाँ, मैं खाना गरम परोसने की बात समझ सकता हूँ लेकिन क्या ये ज़रूरी है कि पूरे रेस्तरां को अम्लवर्षा के बादल और गंध सहनी पड़े जबकि केवल प्लेट को ही गरम करने से काम चल सकता हो.

किसी रेस्तरां में बैठे हुए जब भी मैं सिज़लर परोसा जाता देखता हूँ तो मुझे उस रेस्तरां का एक दृश्य याद आ जाता है जहाँ मैं अक्सर जाता हूँ.

रेस्तरां और उसकी किचन के बीच एक घूमने वाला दरवाज़ा है और जब भी वो भयभीत करने वाला क्षण आता है जब किचन से ज्वालामुखी की तरह से निकलने वाली बने हुए खाने के धुँए की लपटें उठती दिखती हैं तो मुझे वो बेचारा वेटर याद आता है जो घूमने वाले दरवाज़े में बनी खिड़की के पीछे खड़ा हुआ नज़र आता है.

उसके खड़े रहने का कारण उस आदेश का पालन करना होता है कि धुँए को कुछ कम होने दिया जाए और फिर ही वे रेस्तरां में अपना सिज़लर लेकर दाख़िल हों...और दाख़िल ऐसे हों जैसे सलामी बल्लेबाज़ छक्का लगाने के बाद मैदान पर नज़र आता है..

उस खिड़की से मैं आम तौर पर शांत और विचलित न होने वाले वेटर को देखता हूँ जो सांस लेने के लिए जूझ रहा होता है और सेकेंड गिन रहा होता है जब वो उस 'नरक' से रिहा होगा.

वाह भोजन आह भोजन! आप उसे पसंद करें या उससे घृणा करें - हर क्षण वो आपको बहला सकता है, लेकिन मुझे अब भी समझ नहीं आ रहा कि राज कचौड़ी इतनी ख़ास क्यों है?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 10:47 IST, 09 अक्तूबर 2012 yogesh dubey:

    प्रिय नील, ये जानकर अच्छा लगा कि आपको राज कचौड़ी और लस्सी पसंद है. इसे देखते ही मुँह में पानी आ जाता है. मैं आपको बताना चाहूँगा कि ये सबसे बढ़िया भारतीय पकवानों में से एक है.

  • 2. 13:41 IST, 09 अक्तूबर 2012 Sandeep Sisodiya:

    चटोरों की जुबानी पकवानों की कहानी सुनना हमेशा स्वादिष्ट लगता है, लस्सी के विविध रूप देखने के लिए मैं नील करी को इंदौर भी बुलाना चाहूंगा जहां सूखे मेवों और श्रीखंड से बनी गाढ़ी और गरिष्ठ शिकंजी का स्वाद लेने के बाद निश्चित ही वे इसके भी मुरीद हो जाएंगे. और हां मेरा सुझाव है कि वे कभी पंजाब के ढाबों का भी रुख करें जहां वॉशिग मशीन में लस्सी मथती है.

  • 3. 23:17 IST, 09 अक्तूबर 2012 बी एस पाबला :

    वाह! क्या ज़ायका है राज कचौड़ी का. यम्मी यम्मी. और फिर असली लस्सी में ऊपरी आधा इंच गाढ़ा दही.. आह!

  • 4. 06:07 IST, 11 अक्तूबर 2012 Yogeshwar:

    वाह! काफी दिनों के बाद एक अच्छा और सुंदर व्यंग पढ़ा है. साधूवाद.

  • 5. 17:23 IST, 11 अक्तूबर 2012 Prashant PD:

    क्या क्या अलाय-बलाय लिखें हैं जी? बढ़िया कटाक्ष राज-कचौरी के माध्यम से.

  • 6. 13:33 IST, 12 अक्तूबर 2012 surendra sharma:

    राजस्थान में एक कहावत है, "भूख मीठी की लापसी". कहने का तात्पर्य है कि अगर खाने वाले को भूख नहीं है तो सब कुछ बेकार है और अगर भूख है तो लापसी भी सबसे स्वादिष्ट व्यंजन हो जायेगा. कभी राजस्थान जाना हो तो काचर, लोइया एवं गंवार फली की सब्जी बाजरे की रोटी के साथ खाना. साथ में लहसुन की चटनी और छाछ हो तथा आप को भूख भी लगी हो तो इसका एक अलग ही आनंद आएगा. अगर मेरे साथ चलना हो तो दशहरे पर तैयार हो जाना. आपके जबाब का इन्तजार रहेगा. सुरेन्द्र शर्मा

  • 7. 21:02 IST, 12 अक्तूबर 2012 praveen:

    राज कचौड़ी का जवाब नही , आपकी जुबानी सुनकर मुरीद हुए.

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