बुरा देखो, सुनो और कहो
महात्मा गांधी भारत में कई प्रतीकों के रूप में प्रतिष्ठित हैं.
अहिंसा से लेकर सत्याग्रह तक और सांप्रदायिक सद्भाव से लेकर सादगी तक.
ये विडंबना है कि लोगों ने गांधी को मजबूरी से भी जोड़ दिया और पता नहीं कब 'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी' जुमला चल निकला. विडंबना ये भी है कि नोटों पर भी गांधी की तस्वीर छपी होती है और वही नोट भ्रष्टाचार में सबसे बड़ी विनिमय मुद्रा है.
बहरहाल, जब गांधी के सकारात्मक प्रतीकों की बात करें तो उनके तीन बंदर भी याद आते हैं. गांधी के तीनों बंदर याद हैं आपको? 'बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत कहो' वाले बंदर?
गांधी आत्मा की निर्मलता और स्वच्छता के हिमायती थे. उनके तीनों बंदरों के प्रतीक का संदेश भी आत्म शुद्धि से ही जुड़ा हुआ है. लेकिन इस बात से शायद इनकार नहीं किया जा सकता कि व्यापक रूप में इस संदेश को इस रूप में भी पढ़ा गया कि बुराइयों से दूर रहना ही बेहतर है.
लेकिन कई बार ये जिज्ञासा होती है कि अगर आज गांधी होते तो क्या अब भी इन बंदरों को प्रतीक के रूप में स्वीकार करते? क्या वे इस बात से विचलित नहीं होते कि बुराइयों से दूर रहने के फेर में लोग आत्मकेंद्रित हो रहे हैं और बुराइयों को अनदेखा करने की प्रवृत्ति स्वीकारोक्ति की तरह देखी जाने लगी है?
क्या सच में ये संभव है कि अपने आसपास की बातें नागवार गुज़रे और आप किसी को बुरा न कहें? साझा हित के ख़िलाफ़ कोई कुछ भी कहे जा रहा हो और आप उसे ना सुनें? या अपने आसपास की सारी बुराइयों को देखकर भी आप अनदेखा कर सकते हैं?
मुझे लगता है कि तीनों बंदरों की मूर्तियाँ अब अप्रासंगिक हो गई हैं. या उनके संदेश अप्रासंगिक हो चुके हैं.
हमारे आसपास इतनी बुराइयाँ बिखरी हुई हों वहाँ आप अपनी आत्मा को बचा भी लें तो क्या?
इसलिए अब संदेश बदला जाना चाहिए. बुरा देखो, बुरा सुनो और बुरा कहो. लेकिन साथ में ये याद रखना होगा कि बुरा देखो और सुनो तो उसे सुधारने के प्रयास करो. यदि इस प्रयास में किसी को बुरा कहना पड़े तो वो भी करो.
समस्या की जड़ बुराई है. उसे ख़त्म करने के लिए अगर बुराई से दो चार होना पड़े तो वो भी सही.
बुरा देखकर और बुरा सुनकर ही मोहनदास करमचंद गांधी ने विद्रोह का रास्ता चुना था. अगर ऐसा न होता तो चैन से बैरिस्टरी करते रह जाते. बुरे लोगों के ख़िलाफ़ बुरा कहकर ही उन्होंने आज़ादी की लौ जलाई थी.
यक़ीन करने को जी चाहता है कि यदि आज गांधी होते तो अपने बंदरों के आंख, कान और मुंह से हाथ हटाकर कहते कि अगर बुरा को बुरा नहीं कहोगे, उसका विरोध नहीं करोगे तो लोकतंत्र के निरीह नागरिक की तरह एक दिन मारे जाओगे.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
विनोद जी आज गांधी जी का जन्मदिन है. हमारे देश के जिन लोगों के कन्धों पर गांधी जी के सपनों को सच करने का भार है वह वास्तव में उस भार को वहन करने के काबिल हैं या नहीं इसको तो वे तीनों बन्दर ही जानें पर आज की अवाम उन बन्दरों से नहीं इन्हीं तथाकथित आधुनिक गांधीवादियों के अन्धानुकरण से ओतप्रोत हैं. आप ने सांकेतिक रूप में यद्यपि कह तो सब कुछ दिया है पर यह ‘‘उक्ति’’ वास्तव में कारगर हो सकती है-बुरा देखो और सुनो तो उसे सुधारने के प्रयास करो, यदि इस प्रयास में किसी को बुरा कहना पड़े तो वो भी करो. कितना सत्य है वर्तमान समय के लिए पर कोई तैयार नहीं होगा .
मैने तो इन प्रतीकों को हमेशा इस रूप में लिया है - बुरा मत कहो, बुरा होते हुए मत देखो, कुछ करो और उसे रोको, और ऐसा करो कि बुरा ना सुनना पड़ेगा.
सर नमस्कार आपका लेख अच्छा है. सर आपसे एक आग्रह है कि आप ब्लॉग को वेबसाइट के मध्य में रखें ताकि लोगों की नजर में आ सके. ब्लॉग कोने में होने के कारण दिखाई नहीं देता है. कृपया आप इस पर विचार करें.
मुझे लगता है कि इसके पीछे सही संदेश ये है कि आप मूक दर्शक न बनें. हमें ग़लत चीज़ों को समय रहते रोकने का प्रयास ज़रूर करना चाहिए.
विनोद जी अच्छे ब्लॉग के धन्यवाद . परिवर्तन का सही समय आ चुका है , हमें खुद को तैयार करना होगा.
आपने बिल्कुल ठीक कहा. ये हमारा कर्तव्य है कि हम समाज के लिए काम करें. अगर आप ऐसा नहीं कर रहे हैं तो आप अपराधियों और बुरे लोगों की मदद कर रहे हैं.
ठीक कहा आपने. गांधी जी के ये आदर्श भारत में तभी सफल होते जब वो ज़िंदा होते. गांधी जी के पीछे उनके बताए रास्तों पर चलना और चलने के वो ही परिणाम हो सकते हैं जो सामने हैं. लोकतांत्रिक राजव्यवस्था वाले समाज में बुरा देखा, सुना और बोला जाएगा तो न्याय नहीं हो सकेगा.
विनोद जी आपने बहुत ही अच्छा लिखा है.
एक अलग विवेचना है आपकी पर संदेश वही है. मुझे लगा था कि जब गांधी जी ने बुरा न देखने, सुनने व कहने की बात की थी तो उसमें ये संदेश निहित था कि बुराइयों को ख़त्म करो. न देखने का तात्पर्य उनकी उपेक्षा करने से नहीं था बल्कि जड़ से समाप्त करने से था. आपने उसी पाठ को दूसरे तरीके से समझाया है. चलिए शायद लोगों को इसी तरीक़े से समझ आए तो बात बने.
ये इस देश का दुर्भाग्य है कि हम महात्मा गांधी के विचारों के विपरीत जा रहे हैं. ये विनाश का रास्ता है.
गाँधीजी के तीन बंदर की क्या कहानी है ये तो मैं ज्यादा नहीं जानता. लेकिन ये जरूर जानता हूँ कि देश को सत्यानाश उन्हीं ने किया है जिन्होंने अपने आपको तथाकथित गाँधी की पार्टी और परिवार से जोड़ा हुआ है. जनता को कुछ सच बताया ही नहीं गया, लेकिन आज दिख रहा है कि गाँधी जी क्या चाहते थे और उनकी पार्टी और परिवार क्या चाहते हैं. क्या दोनो के विचार में कोई समानता है? तीनो बंदर तो जनता है जो बंदर का सबक पढ़कर आजतक चुप है और तिल-तिल कर मारने को मजबूर हैं.
धन्यवाद. हम समाज में भ्रष्टाचार को नजरअंदाज नहीं कर सकते.