वेबसाइट का नया रुप
किसी भी मौजूदा वेबसाइट, रेडियो- टीवी प्रोग्राम या अख़बार में परिवर्तन दिलचस्प भी होता है और द्वंद्व भरा भी.
एक ओर तो आप चाहते हैं कि श्रोता, दर्शक या पाठक का ध्यान इस ओर आकर्षित भी हो और दूसरी ओर आप चाहते हैं कि वह इसे अनदेखा भी कर जाए. यानी आप नहीं चाहते कि श्रोता, दर्शक और पाठक जिस तरह चीज़ों को देखने के आदि हैं, उसमें कोई खलल पहुँचे लेकिन दूसरी ओर आप चीज़ों को बेहतर भी बनाना चाहते हैं जिससे कि नए लोग इसके प्रति आकर्षित हों.
पिछले दो महीनों से हम bbchindi.com में थोड़े-थोड़े परिवर्तन करते रहे हैं और उम्मीद करते रहे हैं कि ये परिवर्तन लोगों को पसंद आएँगे.
लेकिन सवाल ये है कि क्या आप क्या सोचते हैं? क्या हम अपने प्रयासों में सफल हुए हैं? या मैं आपसे पूछूँ कि आपने इन परिवर्तनों को महसूस किया या नहीं? मुझे लगता है कि आपने इसे महसूस किया है.
इस बीच हमने न केवल सामग्रियों की संपादकीय गुणवत्ता में सुधार किया है बल्कि हमने बीबीसी हिंदी वेबसाइट को नए रूपाकार में पेश करने की भी कोशिश की है. हमें उम्मीद रही है कि इन परिवर्तनों से सुधार आएगा और ये पाठकों को पसंद भी आएगा.
अब जो ताज़ा परिवर्तन बीबीसी हिंदी वेबसाइट पर किए गए हैं उसका उद्देश्य यूज़र-एक्सपीरिएंस को बेहतर बनाना है. इसके लिए एक ओर हमने इंडेक्स में थोड़ी काट-छाँट की है और दूसरी ओर होमपेज पर सामग्रियों को बेहतर ढंग से उभारने की कोशिश की गई है.
इसलिए अब आपकी राय हमारे लिए मूल्यवान होगी. आप क्या सोचते हैं, ये परिवर्तन आपके लिए अच्छे हैं, बुरे हैं, हास्यास्पद हैं, गंभीर हैं, घिसेपिटे से हैं या दार्शनिक क़िस्म के हैं?
इन परिवर्तनों से पहले हमने व्यापक रिसर्च किया है कि लोग इंटरनेट पर बीबीसी हिंदी से क्या चाहते हैं. ये जानना अच्छा लगा कि लोग हमसे वही चाहते हैं जो हमारी ताक़त है, भारत को वैश्विक परिप्रेक्ष में प्रस्तुत करना और दुनिया को भारत के परिप्रेक्ष्य में पेश करना. इसे 'ग्लोबल इंडिया' या 'वैश्विक भारत' कहना ठीक लगता है.
इसका मतलब ये है कि जब हमारी नज़र दुनिया पर होती है तो नक्शे के बीचो-बीच भारत होता है और हम जब दुनिया के किसी भी हिस्से से जुड़े विषय पर काम करते हैं तो हम ये विचार करते हैं कि इससे भारतवासियों का क्या संबंध हो सकता है. दूसरे शब्दों में कहें तो हम 'हबल टेलिस्कोप' जैसे किसी उपकरण के साथ दुनिया के ऊपर विचरण कर रहे होते हैं लेकिन हमारी नज़र भारत पर और विश्व मंच पर भारत के महत्व पर केंद्रित होती है.
इस दृष्टिकोण को ज़हन में रखते हुए हमने भारत के पन्ने को बदलकर उसे संपूर्ण बनाने की कोशिश की है और एक पन्ना अंतरराष्ट्रीय ख़बरों का है, जिसमें दुनिया भर की ख़बरें पाठकों की दिलचस्पी के हिसाब से विभिन्न खंडों में प्रकाशित की जाएँगीं. इसके अलावा होमपेज पर छह अलग-अलग विषयों पर सामग्री उपलब्ध होगी. इसमें एक खंड चर्चित चेहरे का होगा क्योंकि हमारा रिसर्च बताता है कि आप चर्चित व्यक्तियों के बारे में ज़्यादा पढ़ना चाहते हैं. इसके अलावा रिसर्च बताता है कि आप को तस्वीरें पसंद आती हैं, इसलिए हमने होमपेज के दाहिने हिस्से में सबसे ऊपर फ़ोटो गैलरी बनाए रखने का फ़ैसला किया है.
ये थे इस परिवर्तन के पीछे हमारे विचार.
अब आपसे अनुरोध है कि इस नए रुपाकार वाली वेबसाइट पर एक संपूर्ण दृष्टि डालिए और हमें बताइए कि आप इसके बारे में क्या सोचते हैं. हमें आपके विचार जानकर प्रसन्नता होगी.

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मुझे ये काफी पसंद आई.
मैने आपकी वेबसाइट पर परिवर्तन देखे हैं और इसे समझने में थोड़ा समय लगेगा.
कोई भी खबर जो सेक्स सो जुड़ी हो उसे प्रथमिकता मिलती है. विवेचना पूरी तरह गायब हो चुकी है. रेडियो कार्यक्रम भी बेहतर नही रहा है.
मुझे ये बीबीसी हिंदी की वेबसाइट अच्छी लगी.
बहुत अच्छा प्रयास है.
नील करी साहब , समय हो आपके पास तो बीबीसी की खबरों को अपडेट करने का प्रयास करें . बीबीसी पर सात दिनों तक तक अपडेट नही होती और हर दिन एक ही खबर सुनने को मिलती है.पेज की बजाय अंधकार को साफ करने का प्रयास करें या फिर बीबीसी की हिंदी सेवा बंद कर दें तो बेहतर होगा . बहुत दुख होता है बीबीसी सुन कर.
कृपया हर खबर पर पाठकों की राय भी होनी चाहिए ताकि लोग पढ़ें और प्रतिक्रिया भी दे सकें.
अरे भाई ये कैसा वेब पेज बनाया है, मोबाइल डाउनलोड का लिंक ही गायब है.
एक्सलेंट है.
रेडियो कार्यक्रम कभी कभी शुरु ही नही होता और अक्सर पुराना कार्यक्रम ही सुनाई देता है. बाकी नया परिवर्तन अच्छा लगा.
पहले 1969 से 73 फिर 1978 से 2009 तक और अब रेडियो की जगह बीबीसी हिंदी .कॉम पर सुनता रहा हूँ. लेकिन अब वो सब नहीं रहा जो "मनोज मामा" जैसा हो. लगता है बीबीसी का भी समय बदल गया है. सभी कार्यक्रम समाप्त हो गए हैं. जानकारी तो है लेकिन ज्ञानवर्धक तरीके से नहीं, कक्षा की पढाई की तरह सा है सब. अगर आप सच में बीबीसी हिंदी .कॉम को रोचक बनाना चाहते हैं तो सभी पुराने कार्यक्रमों जैसे बाल जगत, झंकार, हमसे पूछिए इत्यादि को "इतिहास का झरोखा " के अंतर्गत उपलब्ध करा दें तो जो लोग नए हैं या जिन्होंने उस समय ये सब नहीं सुना वे उन महान उद्घोषकों एवं रोचक कार्यक्रमों का आनंद ले सकें तथा बीबीसी हिंदी की उस परंपरा से अवगत हो सकें जिसे क्यों महान कहा गया.
बीबीसी हिंदी की वेबसाइट में संपादक से शिकायत करने के लिए एक ईमेल होनी चाहिए, केवल टिप्पणी से काम नहीं चलता. बीबीसी को एक ऐसा मंच देना चाहिये जहाँ पर त्वरित शिकायत की जा सके, साथ ही साथ बीबीसी हिंदी को ट्विट्टर अकाउंट रखना चाहिये
बहुत सुन्दर अपडेट थोड़ा और जल्दी कीजिए बीबीसी प्लेयर नही चलता ,उसे ठीक करवायेगा.
मुझे बीबीसी का नया रुप पहले के मुकाबले बेहतर लगा.
बीबीसी का नया रंग रूप मुझे बहुत पसंद आया, लेकिन ब्लाग और फोरम को पहले की तरह ही मुख्य पृष्ठ पर ही रखा जाए तो शायद बेहतर होता.
बिजनेस की खबरें होम पेज पर नही हैं. नेट पर सबसे अच्छी साइट है.
हैलो बीबीसी , नमस्कार , मै आपका नियमित ओर पुराना श्रोता हूँ . लेकिन पंजाब को बीबीसी में बहुत कम कवरेज मिल पा रही है. पंजाब की खेतीबाङी ओर किसान अब चौराहे पर हैं .
रेडियो का कार्यक्रम बेहतर नही है कृपया उन्हें अपडेट करें.
मुझे इस वेब साइट पर भारतीय शेयर बाजार की खबरें चाहिएं.
बीबीसी की ताकत उसकी न्यूज़ विश्लेषण की क्षमता और उन ख़बरों को जगह देना है जिनका महत्व जनमानस पर काफी ज्यादा हो. इस समय के बदलाव और कंटेंट को देखकर यह बात कहनी पड़ेगी कि बीबीसी भी आम वेबसाइटों जैसी होती जा रही है. बीबीसी को अपनी छवि पर वापस आना चाहिए, जहाँ खबर दुनिया में बीबीसी जैसा बनने की कोशिश की जाती थी. अब यह देखना दुखद है कि बीबीसी दूसरे जैसा बनना चाहता है. परिवर्तन बहुत अच्छे नहीं है. यह कंटेंट के स्तर पर बात कह रहा हूँ. तकनीक अलग है समाचार अलग इसलिए तकनीक भले ही बदलिए पर बीबीसी का वही रिपोर्टिंग स्टाइल रखिए पाठक यहाँ बने रहेंगे.
ये बहुत ही अच्छा प्रयास है. मुझे वेबसाइट पसंद आ रही है.
आपकी वेबसाइट बहुत बढ़िया है.मुझे बेहद पसंद आ रही है.आईफोन पर बीबीसी हिंदी देखकर बड़ा अच्छा लग रहा है.
बीबीसी की हिंदी वेबसाइट का बदलाव आकर्षक तो हो गया है.कृपया इसे निकालिए.कुछ छवियाँ और खबरें फूहड़ सी लगती हैं. बीबीसी की लोकप्रियता वैसे ही निर्विवाद है.जनसंचार-प्रौद्योगिकी, शिक्षा और पर्यावरण से जुड़ी सामग्री ऑडियो-वीडियो क्लिप्स बढाई जा सकती है. वाइल्ड-लाइफ पर तो नहीं के बराबर जानकारियाँ होती हैं. बीबीसी आरकाइव खजाने को भी खोल सकते हैं, नए-पुराने पाठकों को अच्छा लगेगा.
स्वागत ! परिवर्तन जीवंतता के प्रतीक होते ही हैं . पाठकीय सहभागिता और बढ़ाई जा सकती है .
एक वेब पत्रकार होने के नाते मैं यही कहूंगा कि हर कोशिश अच्छी होती है। लेकिन बीबीसी ने पिछले १० साल में अपनी साख खोई है। हिन्दी पाठकों के दिलों में राज करने वाला बीबीसी हिन्दी अब अपने ही पाठकों, श्रोताओं से दूर हो चुका है। सबूत चाहते है तो गूगल आपको आईना दिखा सकता है। आपकी खबरों का चयन जरा देखिए। क्यों हिन्दी हार्टलैंड का एक पाठक आपको पढ़े। क्या ये हिन्दी की सबसे प्रमुख खबरें हैं? खबरों के हेडलाइन्स ज्यादा क्रिवेटिव होने के चक्कर में हास्यासपद हो गए हैं। जो हिन्दी पाठक पढ़ता है, वो आपकी न्यूज पोर्टल के होमपेज पर नहीं दिख रहा। जरा खेल,मनोरंजन जैसे सेक्शन में खबरों को पढ़े। कुछ सेक्शन तो है ही नहीं जिसके लिए बीबीसी हिन्दी सेवा जानी जाती थी। क्या फिर कभी बीबीसी इंदिरा गांधी हत्याकांड में सतीश जैकब की रिपोर्टिंग या मार्क टुली की इंडिया रिपोर्ट जैसा कुछ दे पाएगा? लंबे अरसे बाद बीबीसी रेडियो सुना। रेहान फजल को। आश्चर्य हुआ कि बुलेटिन वाकई भारतीय श्रोताओं के लिए था? कई बातें है जो टिप्पणी में नहीं लिखी जा सकती। आप ने एक सेक्शन जो बनाया है वो समझ के परे है.सेक्शन का जो टाइटल है क्या उसमें खबरों की वैसी पैकेजिंग की गई है? बहुत-सी बातें है। लेकिन बीबीसी अब पाठकों या श्रोताओं की सुनता कहा हैं। बीबीसी हिन्दी का ये रुप हिन्दी प्रेमियों के लिए दुखी करने वाला है। नील करी साहब, आपने अमरीका, अफ्रीका की सेवाओं को संवारा, जाने से पहले हिन्दी सेवा को भी सुधार जाइए, हम हिन्दी प्रेमी आपके अहसानमंद होंगे।
मेरा आपसे अनुरोध है कि आप मोबाइल पर ऑडियों का लिंग लगाए और उसे बंद न करे.हमे इससे फायदा ये होता है कि हम इसे अपने मन मुताबिक सुन लेते हैं.
मोबाइल साइट पर(m.bbchindi.com) के अंदर का लिंक ही गायब है.हम लोग इसी पर प्रसारण सुनते थे.मेरा निवेदन है कि उसे फिर चालू करे.
भाई साहेब,परिवर्तनों का दौर है आप ने भी हाथ साफ़ कर लिया.रेडियो को नियमित करें और नया पेज बढ़िया लगा.सुधार की धार को तेज रखे.
नमस्कार नील जी, मैं बीबीसी को बचपन से ही रेडियो पर सुनता आया हूं,मगर इधर इस भागमभाग जिन्दगी में इसे मोबाइल द्वारा कही भी सुन लेता था, आपके द्वारा बीबीसी साइट में किए गए परिवर्तन अत्यंत सराहनीय व रोचक है.लेकिन अब मोबाइल रेडियो डाउनलोड लिंक उपलब्ध नहीं है जिसके कारण मैं बीबीसी रेडियो प्रोग्राम नहीं सुन पा रहा हूं.आप से निवेदन है कृपया मोबाइल डाउनलोड लिंक उपलब्ध कराए अति महान कृपा होगी .....
मेरा मानना है कि बीबीसी पन्ने की फ़ेसबुक लोगिन के जरिए सुविधा होनी चाहिए.
मुझे वेबसाइट पसंद है.
1. बीबीसी को अश्लील साइटों के मुकाबले खड़ा करने के लिये आभार. अब पोर्न और सेमी पोर्न खबरों में बीबीसी हिंदी का भी नाम शुमार हो गया है. युगुप्तसा जगाने वाली खबरें किसका भला करेंगी, यह तो आप ही जानते होंगे. भला घर-परिवार वालों को भी तो लगातार शर्मशार करने वाली खबरें मिलनी चाहिये.
2. बासी खबरों का आपलोगों ने अगर कोई विश्वरिकार्ड बनाने की योजना बनाई होगी तो आपको मुबारक...भला नयेपन और विविधता से दुश्मनी का और कोई दूसरा उदाहरण कहां मिलेगा ?
3. कभी पुरानी खबरें पढ़ने के लिये पुराने लिंक पर जाया जा सके, यह सुविधा भी आपने बंद कर दी है. पुराने लिंक पर क्लिक करें तो वह होम पर रिडायरेक्ट हो जाता है. इसके लिये भी बधाई दें ?
अरे साहब, रेडियो का डाउनलोडिग कहाँ गया.
मुझे वेबसाइट पसंद आ रही है.
वेबसाइट में बदलाव महसूस तो हो रहा है, लेकिन नकारात्मक रूप में. ज्यादातर खबरों के इंट्रो को छिछलेपन के साथ प्रश्नगत बना दिया गया है, जैसे कि "फिल्म इंग्लिश विंग्लिश के निर्माता बाल्कि अपनी पत्नी से इसलिए जलते हैं कि वे बेहतर निर्देशक हैं या इसलिए कि उन्होंने श्रीदेवी के साथ फ़िल्म की?" यह प्रश्नगत स्वरूप हर खबर में दिखाने की चाह तमाम दोयम दर्जे के हिन्दी प्रकाशकों में रही है, लेकिन पत्रकारिता का जो मानक नियम है, उसमें यही पढ़ाया-सिखाया जाता है कि आप इंट्रो में कब, क्यों, कहां, कैसे और क्यों को समाहित करें. इससे पढ़नेवाले को संक्षिप्त में ही अत्यधिक जानकारी मिल जायेगी और विस्तार के लिए वह संपूर्ण विश्लेषण पढ़ेगा. पता नहीं आपने अपनी इस पुरानी शैली को क्यों गायब कर दिया? ज्यादा हिट पाने के लिए कुछ ऐसे भी मीडिया समूह हैं, जो उत्तेजना पैदा करनेवाली जनाना तस्वीरों का इस्तेमाल कर रही हैं, तो क्या बीबीसी भी उसी रास्ते पर चल पड़ा है. बीबीसी का एक खास पाठकवर्ग है, यह इस महान ब्रितानी सूचना सह मनोरंजन माध्यम के अधिकारियों को नहीं भूलना चाहिए. बदलाव जरूर हो, लेकिन नकल करने के चक्कर में अपना मूल स्वरूप ही नष्ट करने की नादानी नहीं होनी चाहिए.
वेबसाईट का डाइनामिक न होकर स्टैटिक होना, अविवेचानात्मक लेखन सामग्री से ज्यादा तस्वीरों का जगह घेरना, पुरानी सामग्री की बहुतायतता, वेब-पेज का धीमा होना, तर्कसंगत जानकारी की जगह व्यक्तिगत अनुभवों को ज्यादा महत्व, पड़ोसी देशों की खबरों का गायब होना आदि जैसी तमाम तकनीकिगत एवं शोधपरक खामियां हैं, जो पता नहीं कब ठीक होंगी. कुल मिलाकर जो भी परिवर्तन किया गया है वो नाकाफी, बेकार एवं अनाडी द्वारा की हुई खानापूर्ति जैसा है.
आपकी वेबसाइट हिंदी की दूसरी न्यूज़ वेबसाइटों से बेहतर है लेकिन इसमें कुछ सुधार की भी ज़रूरत है -
1) सामान्य ख़बरों को अलग तरीके से पेश करें, भीड़ का अनुसरण न करें.
2) आपका लेखन अच्छा है लेकिन आपको वैसी खबरों पर ध्यान केंद्रीत करना चाहिए जिन्हें भारतीय मीडिया में कवर नहीं किया जाता.
3) पुराने और अच्छे साक्षात्कार दोबारा पब्लिश करें क्योंकि वो आपकी धरोहर हैं.
4) अंतरराष्ट्रीय लेखकों और पत्रकारों को बीबीसी हिंदी के लिए लिखने के लिए आमंत्रित करें.
विदेश वाले कॉलम में देश का नाम अवश्य दें. कारण ये कि जिस देश की खबर पढ़नी होती है, वो पूरा नहीं मिल पाता है. केवल हेडिंग ही पढ़ने में आता है.
मैंने मोज़िला ब्राउज़र में बीबीसी के फाँट प्रदर्शन की शिकायत की थी. सच कहूँ तो शिकायत दर्ज़ करते समय मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरी शिकायत इतनी ज़ल्दी दूर हो जाएगी.
हिंदी वेबसाइट अब अपना वजूद खो चुकी है.सिर्फ न्यूज़ अपडेट के नाम पर सैक्स और उस से संबंधित चीज़े होती है.अब हम अपने परिवार के साथ इस वेबसाइट पर नहीं आ सकते हैं.
सबकुछ ठीक है पर एक समस्या बनी हुई है. नमस्कार भारत आपलोग सुबह न जाने कैसे अपलोड करते हैं कि पुराना एपिसोड कई दिनों तक बजता रहता है. कृपया इसे जल्द ठीक करें.
मोबाइल में डाउनलोड का जो पेज हटाया गया है वो बुरा लगा और आपलोग सेक्स पर बहुत ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं. बाकी परिवर्तन काफ़ी अच्छे लग रहे हैं. वेबसाइट अच्छी लगती है.
मैं बीबीसी हिंदी वेबसाइट रोज देखता हूँ. मुझे वेबसाइट पर लाए गए बदलाव पसंद हैं, लेकिन मैं आपको सुझाव देना चाहूँगा कि आप मात्राओं में सुधार करें. कई बार मात्राएँ दिखाई नहीं देतीं, या फिर वो गलत होती हैं.
मैंने बीबीसी का वेबपेज शायद पहली बार 2002 और 2004 में देखा था. तब से आजतक बीबीसी हिंदी के वेबपेज पर दिन में तीन या चार बार आता हूँ. बीबीसी का वेबपेज इंडिया न्यूज, आजकल की तरह हो गया है. लिखने की शैली बदल गई है. वेबपेज कैसा है इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. जरा शीर्षकों पर ध्यान दें. शुक्रिया.
लगभग 20 साल हो गए बीबीसी के साथ जुड़े हुए, कई रूपों को बदलता हुआ देखा है. यह मुझे कहने में कोई संदेह नहीं कि बीबीसी अब पहले जैसी नहीं रही लेकिन फिर भी इसकी कुछ रिपोर्ट अभी भी बाकी समाचार माध्यमों से बेहतर हैं. अगर बीबीसी वेबसाइट की बात करूँ इसमें कई सारे सेक्शन गायब हो गए हैं. "कारोबार" एक अच्छा सेक्शन था जिसमें बिजनेस से जुड़े समाचार सहज तरीके से आते थे. "अभी-अभी" सेक्शन भी अच्छा था.
बीबीसी ने शायद बहुत सारे रंग डालकर कुछ पाठकों को आकर्षित करने का प्रयास किया है, पर बीबीसी के पाठक कलर नहीं कंटेंट देखते हैं. इसके शीर्षक तो आजकल काफी फूहड़ हो गए हैं (उदाहरण के लिए कुछ शीर्षक जो मुझे याद हैं..गांधी की आंधी, "सोनिया को गुस्सा क्यों आता है" आदि आदि ) और अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग तो इतना ज्यादा होता है की शायद बीबीसी हिंदी कुछ दिनों में बीबीसी हिंगलिश हो जाएगी लगता है.
एक समय था जब हम बीबीसी सिर्फ अपनी हिंदी को शुद्ध बनाने के लिए भी सुनते थे. आजकल तो सेक्स के समाचार तो भरे पड़े रहते हैं बीबीसी की साईट पर. परन्तु बीबीसी हिंदी के साथ हमारी आस्था अब भी है, आशा है बीबीसी हिंदी अपने असली रूप को खोने नहीं देगी.
सकारात्मक बदलाव
कृपया ऑडियो डाउनलोडिंग लिंक ज़रुर शामिल करें. इससे बीबीसी हिंदी रेडियो के कार्यक्रमों की पहुँच मोबाईल धारकों तक बनेगी. बीबीसी हिंदी को आमजन तक पहुँचाना आपकी बहुत बड़ी जवाबदेही है.