भारत का इतिहास: 2047
एक जमाने में हमारे देश यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडी का नाम आर्यावर्त और जम्बूद्वीप हुआ करता था. आगे चलकर नाम बदला और इसे हिंदुस्तान कहा जाने लगा. वैसे रथ पर चढ़ कर स्मरण करने वाला एक राजनेता इसे हिंदूस्थान कहता था क्योंकि उसे लगता था कि बार बार झूठ बोलने पर नाम बदल कर सच हो जाएगा. ऐसा हुआ नहीं और कालांतर में देश का नाम भारत और इंडिया हो गया. गरीब लोग इसे भारत कहते और अमीर कहते इंडिया.
आज जो हम राष्ट्र गान गाते हैं उसकी उत्पत्ति भी बहुत मज़ेदार है. हमारे देश में सन 2010 में एक महान संगीतकार का पता चला. उसका नाम धनुष था. उसे पता चल गया था कि इंडिया में एक बहुत बड़ा घोटाला होने वाला है जिसे ध्यान में रखकर उसने एक गीत लिखा....वाय दिस कोलावरी डी. जिसका सीधा अर्थ है इतना कोयला कहां से आया डी--डी फॉर डॉक्टर. इस गाने के आने के कुछ ही दिन बाद कोयला चोरी का एक बड़ा विवाद उत्पन्न हुआ. तो सारे लोग सवाल पूछने लगे...वाय दिस कोलावरी डी.
धनुष का कोयला चोरी में कोई हाथ नहीं था लेकिन गाना उसी का था. उस समय देश के प्रधानमंत्री डॉ साहब थे जो चुप रहते थे क्योंकि विदेशों से पढ़ कर आए थे.
लेकिन जब उस जमाने की सोशल मीडिया फेसबुक, ट्विटर और उस समय कागज़ों पर छपने वाले अख़बारों में सवाल उठने लगे और सारे लोग यही गाना गाने लगे तो एक दिन डॉ साहब ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि ..मेरे बोलने से अच्छी है मेरी खामोशी..
ये कविता डॉ साहब की थी नहीं किसी की चुराई हुई थी. कोयला चोरी पर चुराई कविता पढ़ना उस समय जुर्म नहीं माना जाता था. डॉ के जवाब पर सवाल बंद नहीं हुए और बवाल मचता रहा तो डॉक्टर साहब के मंत्रियों ने कहा कि फेसबुक और ट्विटर पर जो पूछा जा रहा है उसमें विदेशी ताकतों का हाथ है इसलिए इस गाने पर प्रतिबंध लगना चाहिए. चूंकि धनुष भारतीय नागरिक थे इसलिए प्रतिबंध नहीं लगा.
फिर डॉ के एक विश्वस्त मीडिया मैनेजर ने सलाह दी कि इसे विदेशी फंड से जोड़ना सही रहेगा जिससे सवाल कम उठें. ये तय करते ही डॉ साहब ने फैसला किया कि देश में विदेशों से पैसा आएगा जिसे एफडीआई कहा जाएगा.
ज़ाहिर था कि पैसा आया और फिर किसी ने कोयला चोरी की बात नहीं की क्योंकि सारा कोयला कुछ दिनों बाद विदेश चला गया.
उस कोयले से बिजली बनाई गई और हमें दूर देश से भेजी गई...जिससे हर घर में बिजली आई. जिस देश से ये बिजली पहुंची थी उसका नाम यूनाइटेड स्टेटस ऑफ अमरीका था औऱ उनके इस अहसान को देखते हुए हमारे देश का नाम भी यूनाइटेड स्टेटस ऑफ इंडी कहा गया.
इससे भारत और इंडिया की समस्या सुलझ गई है. सबके लिए एक देश है. अब यहां कोई गरीब नहीं है. सारे गरीबों को अफ्रीका भेज दिया गया है..जो बचे हैं वो बचे हुए जंगलों में चले गए जहां वो पहले रहते थे.
देश ने प्रगति की लेकिन लोगों के जेहन से कोयला नहीं गया इसलिए हमारे देश के विदेश से पढ़ कर आए कुछ नेताओं ने तय किया कि इसी को राष्ट्रगान बनाया जाए...इसलिए हम सब चलो मिल कर गाएं....वाय दिस कोलावरी डी...औऱ हां राष्ट्रीय गान के लिए सीट से खड़े होने की ज़रुरत नहीं है. जो बच्चे न गाना चाहें वो आईपॉड पर गाना चला दें.....उसे बच्चे का गाया हुआ मान लिया जाएगा...
यूनाइटेड स्टेटस ऑफ इंडी में धनुष की याद में एक प्रतिमा बनाई गई है जहां साल में एक बार चढ़ावा दिया जाता है जिसमें आईपॉड सबसे बढ़िया चढ़ावा माना जाता है.

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क्या उस समय तक जंगल बचे रहेंगे..चलिए ऐसी उम्मीद है यही जानकर अच्छा लगता है।
उस समय के पाठक ये भी जानना चाहेंगे कि कोयला होता क्या था?
व्यंग्य सच में गहरा कर देता है घाव।
सुशीलजी मैंने आपके सारे ब्लोगों को पढ़ा है और अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि यह उन सबमें सर्वश्रेष्ठ है।
बहुत मजेदार ब्लॉग...उस वक़्त इतिहास की परीक्षाओं में कुछ इस तरह से सवाल भी पूछे जायेंगे...आधुनिक युग के महान समाज सुधारक आमिर खान की समाज उत्थान के प्रयासों पर प्रकाश डालें. भारत के किस प्रधानमंत्री ने अपने पावर का सही इस्तेमाल नहीं किया..? यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ इंडी में विदेशी कम्पनियों के योगदान पर टिप्पणी करें. और इसमें तत्कालीन सरकार की भूमिकाओं पर प्रकाश डालें. भूतपूर्व भारतीय समाज और तात्कालिक यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ इंडी के समाज की तुलना करें...भारत में कौन कौन से विभिन्न प्रकार के घोटाले होते थे उनमें से किन्ही दो चर्चित घोटालों पर अपने विचार व्यक्त करें. स्विस बैंक को दुनिया का सबसे धनी बैंक बनाने में भारतीय नेताओं का क्या योगदान रहा ?.... उस वक़्त बीबीसी की ताजा खबर ये होगी....आज ही इंडी ने एक किलो काला हीरा (कोयला) 1 लाख 86 हजार करोड़ की नीलामी में ख़रीदा और उसे अपने म्यूजियम में सुरक्षित रखा है..
सुशील जी , आर्यभारत से इंडी के आधुनिकी करण पर आपका ब्लॉग निराशाजनक है.हम जो हैं वही रहेंगे. बस काला बाजारी रुक जाए.
बीबीसी जुड़े हुए मुझे बहुत बर्ष हो चुके है.जब जहा जैसे सम्भव हुआ लेकिन कभी नहीं छोड़ा बीबीसी को. बीबीसी सक्षम है श्रोता और पाठक से पहले समझ जाता है कि क्या नया दे और कहा पे क्या रखे. बीबीसी का वेबसाइट अच्छा है.
है तो बस एक चीज के कमी है नेपाल की ,आपके हिंदी सेवा मे नेपाल नहीं है, वैसे नेपाल इंडिया और चाइना से दूर नहीं है नहीं पकिस्तान से. हाँ गरीब जरुर है.आज के तारीख में नेपाल सभी जिलो मे इंटरनेट की पहुच है. क्यूँ कि असल मे मै नेपाली हुँ.
सुशील जी बहुत ही अच्छा लिखा है आपने. हम चाहते है कि आप ऐसे ही अच्छा लिखते रहें.
बहुत अच्छे सुशील जी.
बहुत ही रोचक है.
ये सचमुच काफी अच्छा है .लगता है कहीं सच हो जाए. भविष्य के म्यूजियम में कोयला रखा होगा ताकि बच्चे जान पाएं कि कोयला वाकई में कितना काला है.
आपकी वेबसाइट बहुत सुंदर लग रही है
क्या खूब बात कही है सर, सच में जिस तरह हमारे देश में घोटालों पर घोटाले हो रहे हैं उससे तो यही लगता है कि भारत के इतिहास में बताने को इन घोटालों के अलावा कुछ और नहीं रह जाएगा.
पढ़ कर हंसी भी आई और हमारे मन का दर्द भी दिखा. उम्मीद करता हूं आप और हम जब तक जिन्दा रहेंगे, आपकी लिखी बातों का कुछ हिस्सा भी सच हो गया तो आपको सलामी दूंगा कि वो इतनी दूर तक देख सका .....
बहुत बढ़िया व्यंग्य लिखा है आपने.....पर अब तो मुझे डर लगने लगा है कि कहीं इन महान भावी इतिहास रचयिताओं को सही में 'यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडी' नाम पसंद न आ जाए :)