इस विषय के अंतर्गत रखें जून 2009

वीडियोगेम बना स्वात

अब्बू देखें, मैं अभी जॉएस्टिक चला रही हूँ. ये देखें... ढिशुम, ढिशुम, ढिशुम---- ये तीसरा निन्जा भी गया--- और ये चौथा--- ढिशुम, ढिशुम, अरे ये तो बच गया--- कोई बात नहीं नेक्स्ट टाइम मार डालूंगी....

...और फिर मेरी बेटी ने मुझे बातों में लगा-लगाकर और लगा-लगाकर वीडियो गेम्स की लत डाल दी.

सुपरमैन, ब्लैक निन्जा, अफ़्रीक़न गुरिल्ला, मरीन हंटर्स....और न जाने क्या क्या---- मुझे नहीं याद के मैंने कितने निन्जाज़, कितने गुरिल्लों और मरीन हंटर्स की मदद से कितने फ़ंटूस मारे. कभी मेरा स्कोर 200 होता तो कभी 500 तो कभी 1500--- जैसा मूड, उतना स्कोर---.

वीडियो गेम की लत बहुत बुरी होती है. मगर अच्छी बात यह है कि जॉएस्टिक वीडियो गेम के हीरो और विलेन को अपने कंट्रोल में रखती है---- जबतक जी चाहे दुश्मनों को मारते रहें. जब बोर हो जाएं तो गेम शट् ऑफ. फिर शुरू हो जाएं. ढिशुम,...ढिशुम,.... ढिशुम....

एक और मज़ेदार बात ये है कि गेम में आप चाहे जितने भी किरदार मार डालें, उनकी तादाद कम नहीं होती. मगर आपका स्कोर बढ़ता चला जाता है और जीत का असली जैसा सुरूर महसूस होता रहता है.

मुझे तो लगता है कि जैसे पाकिस्तान के स्वात और फ़ाटा वीडियो गेम हैं.---- ढिशुम, ढिशुम, ढिशुम 15 तालेबान मर गए, ढिशुम, ढिशुम, ढिशुम, 40----- ढिशुम, ढिशुम, ढिशुम. -----

मारते जाएं, खेलते जाएं, मारते जाएं, खेलते जाएं, मारते जाएं, खेलते जाएं------

ख़ुदा क़यामत तक ग़ालिब का नाम रखे जिसने वर्चुअल रियल्टी पर आधारित वीडियो गेम की परिकल्पना को यह कहकर परिचय कराया था.

था ख़्वाब में ख़्याल को दिल से मुआमला
जब आँख खुल गई, न ज़ियाँ था, न सूद था.

(ज़्याँ- नुक़सान, सूद- फायदा)

बस एक बात!

وسعت اللہ خان|रविवार, 07 जून 2009, 06:47

टिप्पणियाँ (22)

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वुसतुल्ला ख़ान से

बराक ओबामा के क़ाहिरा में दिए गए उपदेश (ख़ुत्बे) पर तरह-तरह की टिप्पणियाँ छह महादेशों में अगले सात दिनों तक जारी रहेंगी. न मैं इस भाषण के मूलपाठ पर फ़िलहाल कोई टिप्पणी करना चाहता हूँ और न ही इस ख़ुत्बे पर होने वाली टिप्पणियों पर कोई टिप्पणी करूँगा....

बस एक बात.... बुश जूनियर की हकलाती, बेवकूफ़ाना और बच्चों की मासूमियत वाली अंग्रेज़ी (जिसे बुशरेज़ी कहना मुझे अच्छा लगता है) सुनकर पंजाबी की वो कहावत अक्सर याद आती थी, "मुँह चंगा न होवे पर गल ते चंगी करो..."

बुशरेज़ी की आठ साल की प्रताड़ना के बाद और उसके चलते मध्य पूर्व के बदले, बिगड़े और बिखरे हालात के सेहरा में ओबामा का अंदाज़े बयाँ एक मीठे पानी के झरने जैसा मालूम देता है.

बराक ओबामा के कथनानुसार एक भाषण से तो हालात और सच्चाई नहीं बदल सकते, लेकिन 20 जनवरी की शपथ वाली तक़रीर से लेकर चार जून के क़ाहिरा के ख़ुत्बे तक ये बात पक्के तौर पर कही जा सकती है, "गुड़ न दे गुड़ जैसी बात तो कर" का मुहावरा ओबामा ने घोल कर पी रखा है.....

कितना ऐतिहासिक है मीरा कुमार का चुनाव!

पोस्ट के विषय:

सुहैल हलीमसुहैल हलीम|गुरुवार, 04 जून 2009, 08:05

टिप्पणियाँ (14)

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लोकसभा अध्यक्ष के रूप में मीरा कुमार का चुनाव क्यों महत्वपूर्ण है.

अगर इसलिए कि वे लोकसभा की पहली महिला अध्यक्ष हैं तो उनसे बहुत पहले इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री पद पर पहुँचीं, नजमा हेपतुल्ला लंबे समय तक राज्यसभा की उप सभापति रहीं और प्रतिभा पाटिल अभी राष्ट्रपति हैं.

अगर इसलिए कि वे दलित हैं तो जीएमएसी बालयोगी उनसे पहले इस पद पर रह चुके हैं और वह भी दलित थे. राजनीतिक हलकों में उनके चुनाव की अहमियत यह बताई जा रही है कि वे पहली दलित महिला लोकसभाध्यक्ष हैं लेकिन मेरे ख़्याल से उनका लोकसभाध्यक्ष बनना ऐतिहासिक कम और प्रतीकात्मक ज़्यादा है.

मेरे कहने का मतलब यह नहीं कि जात-पात और भेदभाव की बुनियाद पर पर बँटे हुए हिंदुस्तान के समाज में महिलाओं और ख़ास तौर पर दलित महिलाओं के रास्ते में मुश्किलें नहीं हैं. सच तो यह है कि हर क़दम पर उनके रास्ते में रुकावटें हैं और समान अधिकार की बात एक सपने से ज़्यादा नहीं है.

लेकिन क्या मीरा कुमार वाक़ई उस तबके की नुमाइंदगी करती हैं, जिन्हें इन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है? मेरे ख़्याल में नहीं.

अगर आर्थिक बंदिशों और बेड़ियों को तोड़कर आगे बढ़ने की बात करें तो मायावती का उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बन पाना राजनीतिक और सामाजिक दोनों ही लिहाज़ से कहीं ज़्यादा इंक़लाबी बदलाव था.

इनकी दो वजहें हैं. मायावती ग्रासरूट से ऊपर आईं. उन्होंने एक ऐसे राजनीतिक ढाँचे को चुनौती और शिकस्त दी, जहाँ दलित, सरकार बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण वोट बैंक तो थे लेकिन उनके लिए ख़ुद सरकार बनाने का सपना देखना सिर्फ़ संविधान की धाराओं तक सीमित था.

दूसरी तरफ़ मीरा कुमार एक ऐसे पिता के घर ज़रूर पैदा हुईं जो दलित थे लेकिन उस शख़्स ने भारतीय राजनीति में जो मुक़ाम हासिल किया वह किसी भी वर्ग से संबंध रखने वाले कम ही राजनीतिज्ञ हासिल कर पाए हैं.

राजनीति के मैदान में बाबू जगजीवन राम का नाम इज़्ज़त से लिया जाता है. वे पुराने कांग्रेसी थे, स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक भी. 1946 में वे जवाहर लाल नेहरू की संविदा सरकार में सबसे कम उम्र में मंत्री बने और 1980 तक तक़रीबन लगातार केंद्रीय मंत्री रहे. पचास साल संसद में रहे और इंमरजेंसी के बाद देश के उप प्रधानमंत्री बने.

यह तो हुई बाबू जगजीवन राम की बात लेकिन ख़ुद मीरा कुमार का बैकग्राऊंड क्या है?

वे 1973 में भारतीय विदेश सेवा में शामिल हुईं. कई देशों में राजनयिक रहीं. दिल्ली और जयपुर के श्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में पढ़ीं. उन्हें राइफ़ल शूटिंग का शौक है. उनके पति सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते हैं और 2009 में मीरा कुमार के पास क़रीब 10 करोड़ रुपए की संपत्ति है.

तो क्या वाक़ई मीरा कुमार का यह शानदार सफ़र दबे-कुचले दलित समाज की क़ामयाबी है. शायद इस वजह से नहीं कि वे जगजीवन राम की बेटी हैं.

जिस शख़्स ने इतनी सियासी ऊँचाइयों को छुआ हो उसकी बेटी के लिए लोकसभा का अध्यक्ष बनना एक बड़ा सम्मान ज़रूर है लेकिन यह किसी आम दलित महिला का ग़ैर मामूली सफ़र नहीं जैसा कि दिखाया जा रहा है.

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