ये है दुनिया की सबसे पुरानी कॉफ़ी का ठिकाना

- Author, थॉमस ल्यूटन और एलिस मैककॉल
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी ट्रेवल
कारोबारी मुलाक़ात से लेकर रोमैंटिक डेट तक कॉफ़ी एक ख़ास रोल में नज़र आती है.
ये लोगों और दिलों को जोड़ने का काम करती है. किसी छोटे इलाक़े में मिलने वाली कॉफ़ी से लेकर हाई-टेक कॉफ़ी शॉप तक में लोग कॉफ़ी की ख़ुशबू से सराबोर होते नज़र आ जाते हैं.
लेकिन क्या आप जानते हैं कॉफ़ी की पैदाईश कहाँ हुई? नहीं ना. चलिए हम आपको बताते हैं.
अफ्रीकी देश इथियोपिया को कॉफ़ी का जन्मस्थल कहा जाता है. यहाँ के लोग ना सिर्फ़ शौक़ से कॉफ़ी नोश फ़रमाते हैं, बल्कि कॉफ़ी की दावत भी देते हैं.
इथियोपिया के काफ़ा इलाक़े के बोंगा गाँव में हमें भी एक ऐसी ही दावत पर जाने का मौक़ा मिला.
दावत में गाँव के और लोग भी शामिल थे और वो सभी 'काफ़ी नूनू' ज़बान में बात कर रहे थे.
बिल्कुल सुबह का वक़्त था. सूरज अंगड़ाइयाँ लेता हुआ बादलों की ओट से मुँह निकाल रहा था. और हम सब बांस के बने कप में कॉफ़ी का मज़ा ले रहे थे, जिसे अन्नाज़ और उसकी बेटी असेच ने तैयार किया था.

कॉफ़ी की दावत
अन्नाज़ के शौहर ने घर में बनी बड़ी सी डबल रोटी के छोटे-छोटे टुकडे काटे और मेहमानों को दिए.
इथियोपिया में घर में कॉफ़ी तैयार करने की ज़िम्मेदारी महिलाओं की होती है. सबसे पहले कच्ची कॉफ़ी के बीज मिट्टी की प्लेट पर फैला कर धूप में सुखाए जाते हैं.
फिर इन्हें धोकर लोहे के तवे पर आग में सेंका जाता है और चक्की में मोटा-मोटा पीस कर जेबेना नाम के कॉफ़ी पॉट में उबाला जाता है. कॉफ़ी का ये जार इथियोपिया का रिवायती बर्तन है.
कॉफ़ी की ये दावत सिर्फ़ इथियोपिया के गाँव-देहात में ही नहीं होती, बल्कि शहरों में भी इसका चलन है जहाँ लोग फ़र्श पर या घास पर बैठ कर कॉफ़ी का मज़ा लेते हैं. अपने गाँव की याद ताज़ा करते हैं.
अन्नाज़ का कहना है कि इथियोपियाई समाज में बचपन से ही लड़कियो को कॉफ़ी तैयार करने का हुनर सिखाया जाता है.
ख़ुद उन्होंने सात साल की उम्र में ये काम सीख लिया था. हालांकि कॉफ़ी तैयार करने में काफ़ी वक़्त लगता है, फिर भी दिन में दो तीन बार कॉफ़ी की दावत पर लोगों को बुला लेना आम बात है.
ये आयोजन उनकी संस्कृति का हिस्सा है. उन्होंने अपने बुज़ुर्गों से सीखा है कि घर आए मेहमान को सबसे पहले कॉफ़ी देनी चाहिए. इसे शिष्टाचार का प्रतीक माना जाता है.

कॉफ़ी का रूहानी ठिकाना
जितनी देर में कॉफ़ी तैयार होती है उतनी देर तक मेज़बान और मेहमान में दुनिया भर की बातें होती हैं. घरेलू गपशप से लेकर कारोबार तक की बातें की जाती हैं.
वैसे तो इथियोपिया की गली-गली में कॉफ़ी समारोह का आयोजन देखा जा सकता है. लेकिन अन्नाज़ के घर में इस आयोजन के मायने कुछ ख़ास हैं, क्योंकि उनका परिवार कॉफ़ी किसान है और काफ़ा इलाक़ा अरबी कॉफ़ी का रूहानी ठिकाना कहलाता है.
कॉफ़ी की पहचान किसने की, कैसे और कब इसका इस्तेमाल शुरू हआ, इसे लेकर भी एक मज़ेदार क़िस्सा सुनाया जाता है.
कहा जाता है कि कालदी नाम का चरवाहा अपनी बकरियाँ काफ़ा के घने जंगलों से लेकर गुज़रता था. उसने ग़ौर किया कि जब भी उसकी बकरियाँ इन जंगलों में लाल चेरी खाती थी तो ख़ुशी से नाचना शुरू कर देती थीं.
एक दिन चरवाहे ने भी कुछ चेरी तोड़ कर खालीं. उसे ज़ायक़ा अच्छा लगा. चंद कॉफ़ी चेरी तोड़कर वो अपने चाचा के पास ले आया. उसके चाचा बौद्ध धर्म के मानने वाले थे और मठ में रहते थे.
चाचा ने मज़हबी बंदिशों के डर से कॉफ़ी की चेरी को आग में डाल दिया. जैसे ही बीज जलने लगे उनकी मदहोश करने वाली ख़ुशबू नशे की तरह चढ़ने लगी.
इसके बाद ही कालदी के चाचा ने इन बीजों को धार्मिक मक़सद के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया.

इथियोपिया का तोहफ़ा
काफ़ा के स्थानीय निवासी मेसफ़िन तेकले का कहना है कि कॉफ़ी के चलन के बारे में वो अपने दादा से इस तरह की कहानी सुनते आए हैं.
मेसफ़िन बताते हैं कि आग में जले बीजों को कालदी की माँ ने साफ़ किया और उन्हें पानी में ठंडा होने के लिए डाला तो उनसे और भी मज़ेदार ख़ुशबू आने लगी. सब यहीं से कॉफ़ी पीने का चलने शुरू हो गया.
आज मेसफ़िन काफ़ा कॉफ़ी बायोस्फ़ेयर रिज़र्व में काम करते हैं. इसकी स्थापना 2010 में की गई इस रिज़र्व का मक़सद है कॉफ़ी के जंगलों की हिफ़ाज़त करना.
मेसफ़िन का कहना है कि कॉफ़ी के ये जंगल उनकी ज़िंदगी हैं और बाक़ी दुनिया के लिए इथियोपिया का तोहफ़ा क्योंकि सारी दुनिया के लोग इन्हीं जंगलों में उगी कॉफ़ी का ज़ायक़ा लेते हैं.

40 फ़ीसद जंगल में कॉफ़ी
आपको जानकर हैरानी होगी कि इन जंगलों में कॉफ़ी की क़रीब पांच हज़ार किस्में हैं. काफ़ा में कॉफ़ी की खेती नहीं की जाती, बल्कि यहाँ की ज़मीन में कॉफ़ी के पौधे ख़ुद ही उग जाते हैं.
लेकिन दुनिया के अन्य जंगलों की तरह यहाँ के मानकिरा जंगलों के ख़ात्मे का ख़तरा पैदा हो गया है.
यूनेस्को के रिपोर्ट के मुताबिक़ चालीस साल पहले कॉफ़ी के ये जंगल इथियोपिया के लगभग 40 फ़ीसद इलाक़े में फैले थे.
आज ये महज़ तीन फ़ीसद ही रह गए हैं. मेसफ़िन का कहना है कि कॉफ़ी उनकी पहचान है, और इन जंगलों की हिफ़ाज़त करना उनका फ़र्ज है.
मेसफ़िन ने हमें काफ़ा के कॉफ़ी जंगलों की सैर कराई और एक बहुत बड़े पुराने पेड़ के पास लेकर गए.

मेसफ़िन के मुताबिक़ ये पेड़ कॉफ़ी के पौधे का पिता है. अगर ये पेड़ पिता था तो फिर मां कहाँ थी?
मानकिरा के जंगलों में मेसफ़िन ने हमें काफ़ी के पौधों की माँ से भी मिलवाया.
यहाँ के लोगों का मानना है कि कॉफ़ी का पहला बीज यहीं पैदा हुआ था. जिस तरह अन्नाज़ के घर में हमारा स्वागत कॉफ़ी के साथ हुआ था ठीक वैसा ही स्वागत कॉफ़ी के माता-पिता के जंगलों में हुआ.
बड़े शहरों में कॉफ़ी पीने का अंदाज़ बदल गया है. बड़े-बड़े कॉफ़ी हाउस खुल गए हैं.
लेकिन इथियोपिया के पारंपरिक कॉफ़ी आयोजन आज भी अपनी परंपरा निभा रहे है.

जंगलों की हिफ़ाज़त
अन्नाज़ की बेटी असेच का कहना है कि जिस तरह वो अपनी माँ के घर में लोगों का स्वागत कॉफ़ी से करती हैं और काफ़ी की दावत पर लोगों को बुलाती हैं.
उसी तरह अपने घर में भी इस परंपरा को जारी रखेंगी और अपने बच्चों को भी सिखाएंगी.
इसी तरह मेसफ़िन का कहना है कि जब भी वो किसी नए पौधे को उगता हुआ देखते हैं, उन्हें नई नस्ल का गुमान होता है.
उनका कहना है कि वो अपनी आख़िरी सांस तक इन जंगलों की हिफ़ाज़त करेंगे.
उन्हें उम्मीद है अभी कई और सदियों तक दुनिया इथियोपिया के जंगलों की काफ़ी का मज़ा लेगी.

(मूल वीडियो अंग्रेजी में सुनने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी ट्रैवल पर उपलब्ध है.)
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