You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
सोना ख़रीदने से महंगा है यह इत्र
- Author, इंग्रिड पाइपर
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
क्या आपको मालूम है कि दुनिया में एक इत्र ऐसा भी है, जो सोने से महंगा है? और क्या आपको मालूम है कि हाँगकाँग का कैंटन या चीनी भाषा में क्या मतलब होता है?
अगर आपको इन दोनों ही सवालों के जवाब नहीं मालूम, तो आपको ये भी नहीं मालूम होगा कि इन दोनों का गहरा नाता है.
तो, दूसरे सवाल का जवाब आपको पहले बता देते हैं.
कैंटन या चीनी भाषा में हाँगकाँग का मतलब होता है ख़ुशबूदार बंदरगाह. असल में पहले के ज़माने में हाँगकाँग इत्र के कारोबार के लिए मशहूर होता था. तमाम तरह की ख़ुशबुएं यहां से एशिया के दूसरे देशों से लेकर मध्य-पूर्व और यूरोपीय देशों तक भेजी जाती थीं.
मिट्टी की बू वाला इत्र
आज हाँगकाँग दुनिया भर के कारोबार का बड़ा केंद्र है. मगर पहले के ज़माने में यहां इत्र का कारोबार सबसे ज़्यादा होता था.
और ख़ुशबुओं की इस ख़रीद-फरोख़्त में सबसे मशहूर इत्र था अगरवुड. मिट्टी सरीखी बू वाला ये इत्र दुनिया की सबसे महंगी ख़ुशबू है. ये इत्र हाँगकाँग के पुराने दौर की याद दिलाता है.
इत्र के कारोबार से सत्तर साल से जुड़े युएन वाह बताते हैं कि अगरवुड की लकड़ी हमेशा से ही महंगी बिकती रही है. पहले इस लकड़ी का इलाज के लिए इस्तेमाल होता था. इससे दर्द फौरन भाग जाता था. आज की तारीख़ में अगरवुड से निकलने वाले तेल का इत्र दुनिया भर में बेहद मशहूर है.
लकड़ी सड़ने के बाद निकलता है इत्र
अगरवुड का इत्र एक पेड़ की लकड़ी से निकाला जाता है, वो भी उसके सड़ जाने के बाद. इस पेड़ का अंग्रेज़ी नाम है अक़ीलारिया. प्राचीन काल में चीन के लोग इस पेड़ की लकड़ी को फेंग शुई के लिए बहुत इस्तेमाल करते थे.
अगरवुड का तेल निकालने के लिए अक़ीलारिया के दरख़्तों की ख़ाल उधेड़ दी जाती है. इसके बाद इनमें फफूंद अपना डेरा जमा लेते हैं. ये सड़ी हुई लकड़ी एक ख़ास तरह की राल या गोंद छोड़ती है. इसी से जो तेल निकलता है, उससे अगरवुड का इत्र बनाया जाता है.
सड़ी हुई लकड़ी से निकलने वाली राल की अहमियत इंसान को सदियों से मालूम है. इसीलिए इसे ख़ुशबू का बादशाह कहा जाता है. मध्य काल में मध्य पूर्व और एशिया के बीच कारोबार में इस इत्र का व्यापार भी शामिल हुआ करता था. चीन के टैंग और सॉन्ग राजवंशों का इतिहास खंगालें तो अगरवुड के इत्र का ज़िक्र मिलता है. इसकी ख़ुशबू का गहरा ताल्लुक़ बौद्ध, ताओ, ईसाई और इस्लाम धर्मों से रहा है.
2014 में इस अगरवुड की ख़ुशबू वाली अगरबत्ती 58 हज़ार हाँगकाँग डॉलर या क़रीब पौने पांच लाख प्रति किलोग्राम की दर से बिकती थी. इस पेड़ के बड़े-बड़े तने तराशकर करोड़ों रुपए में बेचे जाते हैं.
25 लाख रुपये प्रति किलोग्राम
अगरवुड की लकड़ी की राल से ओड तेल निकाला जाता है. इसे बेशक़ीमती इत्र बनाने में इस्तेमाल होता है. ओड के तेल को अरमानी प्रिवी के ओड रॉयल और इव्ज़ सेंट लॉरें के M7 ओड एब्सॉल्यू जैसी महंगी ख़ुशबुएं तैयार करने में इस्तेमाल किया जाता है. इसकी क़ीमत आज की तारीख़ क़रीब 25 लाख रुपए प्रति किलोग्राम होगी.
दुनिया भर में अगरवुड की इतनी मांग है कि आज इसकी बड़े पैमाने पर तस्करी हो रही है. असल में हाँगकाँग में इसके दरख़्त बहुत कम बचे हैं. नतीजा ये हो रहा है कि इनकी लकड़ी की चोरी हो रही है. आज हाल ये है कि अक़ीलारिया के पेड़ की नस्ल ही ख़ात्मे के कगार पर पहुंच चुकी है.
एशियन प्लांटेशन कैपिटल कंपनी एशिया में अक़ीलारिया के पेड़ों की सबसे बड़ी कंपनी कही जाती है. ये कंपनी इस पेड़ की नस्ल को बचाने के लिए काम कर रही है. इसने हाँगकाँग और दूसरे देशों में इस पेड़ को लगाया है. कंपनी का कहना है कि आज की तारीख़ में अक़ीलारिया की जंगली नस्ल के कुछ ही पेड़ बचे हैं. वहीं हाँगकाँग की सरकार कहती है कि वो 2009 से अक़ीलारिया के दस हज़ार पेड़ हर साल लगा रहे हैं.
हालांकि सिर्फ़ पेड़ लगाना ही इस बात की गारंटी नहीं कि इस के पेड़ बच जाएंगे. क्योंकि अगरवुड के पेड़ों के तैयार होने में कई साल लग जाते है.
इनकी तस्करी करने वाले अक्सर पुराने पेड़ों को निशाना बनाते हैं, क्योंकि वो तैयार होते हैं. उनमें फफूंदों का डेरा पहले से ही होता है. इसलिए पुराने पेड़ों से तेल निकालने में आसानी होती है.
6 हज़ार पेड़ों का बाग
एपीसी कंपनी के जेरार्ड मैक्गिर्क कहते हैं कि आज हाँगकाँग में तीस साल पुराना पेड़ बमुश्किल ही मिलेगा.
कुछ लोग हैं जो इन पेड़ों को बचाने के अभियान से जुड़े हैं. इनमें चीन के शेनजेन सूबे के रहने वाले किसान कून विंग चैन भी हैं. जिनके पास अगरवुड के क़रीब 6 हज़ार पेड़ हैं. वो एपीसी के साथ मिलकर इन पेड़ों को बचाने के अभियान से जुड़े हुए हैं. आज की तारीख़ में एपीसी, लोगों को चैन के फ़ॉर्म के टूर कराती है.
चैन के फॉर्महाउस में दूर-दूर तक अगरवुड की ख़ुशबू बिखरी हुई महसूस होती है. चैन बताते हैं कि हर पेड़ से तेल निकले ये ज़रूरी नहीं है. इसीलिए तस्करी करने वाले पकड़े जाने का जोखिम उठाते हुए भी चोरी करते हैं.
हाँगकाँग में ऐसे चोरों को पकड़ने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाए जाते हैं. पकड़े गए तस्करों को दस साल क़ैद की सज़ा हो सकती है.
तस्करी तो शायद पूरी तरह से न रुक सके. मगर दुनिया में अगरवुड की बढ़ती मांग से ये उम्मीद तो है कि दरख़्त की ये नस्ल बची रहेगी. आज कई देशों में इसके पेड़ लगाए जा रहे हैं.
हालांकि इस इत्र को ख़रीदना सबके बस की बात नहीं.
(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी ट्रैवल पर उपलब्ध है.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)