कभी गए हैं चांदनी चौक की खुशबूदार गलियों में

मॉनसून, इत्र

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    • Author, आरती बेतीगरी
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल

हिंदुस्तान में इत्र-ओ-फुलेल बनाने और इस्तेमाल करने का सिलसिला बहुत पुराना है. फूलों की ख़ुशबुओं को बोतल में बंद करके बेचने के लिए उत्तर प्रदेश का कन्नौज शहर एक ज़माने से मशहूर है. चमेली, केवड़ा, खस, रात की रानी और गुलाब की ख़ुशबुओं वाले इत्र ख़ूब बिकते हैं.

पहले के ज़माने में इन इत्रों को भाप के ज़रिए तैयार किया जाता था. आज मशीनी दौर है. बनावटी ख़ुशबुओं का ज़माना है, जो मशीनी तरीक़े से तैयार की जाती हैं. ये आसानी से बन जाते हैं. सस्ते पड़ते हैं. मगर पुराने शैदाई कहते हैं कि आज के इत्रों में 'वो' बात नहीं. ये तुलना कभी और. पर क्या आपको मालूम है कि मिट्टी से भी इत्र बनता है?

मॉनसून, इत्र

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गर्मी से राहत

अरे भई, हम कोई मज़ाक़ नहीं कर रहे. क्या आपने मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू का लुत्फ़ नहीं लिया. जब तपती मिट्टी पर बरखा की पहली बूंदें गिरती हैं, तो प्यासी धरती से आंच सी निकलती है. और उस आंच के साथ निकलता है मिट्टी का सौंधापन. मॉनसून की आमद पर आपने यक़ीनन इसका एहसास किया होगा.

भयंकर गर्मी में बारिश के बाद आने वाली के ख़ुशबू आपको गर्मी से राहत देती सी मालूम होती है. मानो प्यासी धरती इस ख़ुशबू के ज़रिए बादलों का शुक्रिया अदा करती हो. क्या हो कि ये ख़ुशबू बोतल में क़ैद करके इत्र के तौर पर बेची जाए? आप इसे हमारी ख़ामख़याली कहकर टाल देंगे. मगर ऐसा होता है. और हिंदुस्तान में ही होता है.

इत्र, मॉनसून

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दिल्ली का चांदनी चौक

बनावटी ख़ुशबू के इस दौर में इत्र की एक दुकान है, जो परंपरागत तरीक़े से बने इत्र बेचती है. ये दुकान है राजधानी दिल्ली में. दुकान का नाम है-गुलाब सिंह जौहरीमल. चांदनी चौक में स्थित ये दुकान क़रीब दो सौ साल पुरानी है. यहां अमीरो-उमरा से मध्यम वर्ग तक के ख़रीदार असल इत्र की तलाश में आते हैं.

कोई अपनी गर्लफ्रैंड को गिफ्ट देने के लिए इत्र लेने आता है, तो किसी को ख़ुद के इस्तेमाल के लिए चाहिए. दिल्ली का चांदनी चौक बाज़ार क़रीब चार सौ साल पुराना है. इसे 1659 में मुग़लों ने बनवाया था. किसी ज़माने में इस बाज़ार के बीच से नहर बहा करती थी. पूरा इलाक़ा चौड़ा और खुला सा था.

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खुशबुओं का घर

आज का चांदनी चौक इंसानों, बसों, रिक्शा, कारों और घोड़े-बकरी जैसे जानवरों से ठसाठस भरा रहता है. इसी चांदनी चौक के दरीबां कलां में है गुलाब सिंह जौहरीमल की इत्र की दुकान. बाहर से देखने पर इसमें कोई ख़ास बात नज़र नहीं आती. दुकान के अंदर जाने पर आपको ख़ुशबुओं के घर में आने का एहसास होता है.

लकड़ी की अल्मारियों के तमाम खानों में तरह-तरह के इत्र रखे हुए हैं. इत्र बेचने के लिए दुकान के कारिंदे बैठे हुए मिलेंगे. दुकान में एक पुरानी घड़ी अभी भी चलती हुई मिलती है. साथ ही लकड़ी की एक पट्टी पर इस दुकान की शुरुआत का साल यानी सन् 1816 लिखा हुआ मिलता है.

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इतिहास नहीं पता...

इस दुकान को प्रफुल गुंधी अपने पिता, चाचा, भाइयों और भतीजों के साथ मिलकर चलाते हैं. प्रफुल बताते हैं कि वो सात पीढ़ियों से इत्र का कारोबार कर रहे हैं. हाल ही में उनके भतीजे ने भी इसमें काम करना शुरू किया है. इस तरह अब आठवीं पीढ़ी भी इससे जुड़ गई.

ख़ुद प्रफुल को अपनी दुकान का ज़्यादा इतिहास नहीं पता. वो कहते हैं कि 1857 की जंग में शायद ये दुकान अंग्रेज़ों और स्थानीय सैनिकों की लड़ाई का शिकार हो गई. उन्होंने एक कॉफ़ी-टेबल बुक निकालकर एक पन्ना खोला, जिसमें उनकी जैसी दुकान का नक़्शा बना था.

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गुलाब का तेल

वो दुकान के दरवाज़े और सीढ़ियों की तरफ़ इशारा करके बताते हैं कि पहले उनकी दुकान तक आने के लिए भी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती थीं. वो कहते हैं कि क़िताब में एक बक्से का ज़िक्र है. ठीक वैसा ही बक्सा आज भी उनकी दुकान में है. गुलाब सिंह जौहरीमल की इस दुकान में आपको मोगरा, केवड़ा, खस, कमल और गुलाब के इत्र मिलेंगे.

सबसे महंगा है शुद्ध गुलाब का तेल. 10 मिलीलीटर गुलाब के तेल के लिए आपको 33 हज़ार रुपए ख़र्च करने होंगे. प्रफुल बताते हैं कि वो ज़्यादातर हिंदुस्तान में बने इत्र ही बेचते हैं. ये इत्र सदियों पुराने परंपरागत तरीक़े यानी भाप के ज़रिए तैयार किए जाते हैं.

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इत्र बनाने का तरीका

प्रफुल बताते हैं कि फूलों की ख़ुशबू यानी तेल निकालने के लिए तांबे के बड़े बर्तनों में उनकी पंखुड़ियों को डालकर पानी में उबाला जाता है. ऊपर निकल रही भाप से तेल की बूंदें निकालकर इत्र बनाया जाता है. प्रफुल कहते हैं कि इत्र बनाने का ये तरीक़ा सदियों पुराना है. मुगलों के दौर में इस को काफ़ी बढ़ावा दिया गया.

प्रफुल ने बताया कि वो गुलाब के इत्र के लिए अपने बागान के गुलाबों का इस्तेमाल करते हैं बाक़ी के इत्र वो ज़्यादातर कन्नौज से मंगाते हैं, जो इत्र बनाने का सबसे बड़ा केंद्र है. वैसे केवड़े का इत्र ओडिशा से आता है. वहीं चमेली का इत्र तमिलनाडु के कोयंबटूर से मंगाया जाता है.

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गीली मिट्टी से इत्र

गुलाब सिंह जौहरीमल की दुकान में ही वो ख़ास इत्र भी मिलता है, जिसका ज़िक्र हमने शुरू में किया था. इस इत्र का नाम है-गीली मिट्टी. इस में से मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू आती है. प्रफुल बताते हैं कि इसका गर्मियों के दिनों में लोग बहुत इस्तेमाल करते हैं. इसे लगाने से उन्हें गर्मी से राहत मिलती है.

गीली मिट्टी से इत्र बनाने का तरीक़ा भी निराला है. मिट्टी के पुराने बर्तनों को तोड़कर उन्हें तांबे की बड़ी हांडियों में डालकर उसमें पानी डाला जाता है. फिर इस पानी को उबाला जाता है. इस से निकलने वाली भाप को चंदन के तेल से गुज़ारकर ये इत्र बनाया जाता है.

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मिट्टी का सौंधापन

प्रफुल कहते हैं कि गीली मिट्टी इत्र को जब पहली दफ़ा सूंघेंगे तो आपको चंदन की ख़ुशबू आएगी. मगर गहराई से सूंघने पर आपको मिलेगा मिट्टी का सौंधापन. इस इत्र को लगाते ही आपको एहसास होगा कि मॉनसून क़रीब है. खास तौर से गर्मियों में इस इत्र की मांग बहुत बढ़ जाती है.

अगर आपको भी मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू लुभाती है, तो कभी आप भी इस इत्र का इस्तेमाल करिएगा. हां, इसके लिए आपको चांदनी चौक की गुलाब सिंह जौहरीमल की दुकान आना पड़ेगा.

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