न्यूयॉर्क में कोविड19 से मरने वालों की संख्या इतनी अधिक क्यों?
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रिसर्च रिपोर्ट बताती हैं कि दुनिया में हर साल प्रदूषण से क़रीब 42 लाख लोगों की जान चली जाती है. लेकिन, कोविड-19 महामारी ने प्रदूषण का स्तर काफ़ी हद तक कम कर दिया है. क्योंकि लॉकडाउन की वजह से तमाम कारखाने बंद हैं. गाड़ियां नहीं चल रही हैं और ज़हरीली गैसों का उत्सर्जन नहीं हो रहा है.
ये हम सभी के लिए ख़ुशी की बात है. मगर कई हेल्थ एक्सपर्ट कहते हैं कि कोविड-19 महामारी का प्रकोप प्रदूषण की वजह से ज़्यादा बढ़ा है. प्रदूषण की वजह से लोग दशकों से कई तरह के बैक्टीरिया सांस के ज़रिए शरीर में लेते रहे हैं. इसी वजह से मौत भी ज़्यादा हुई हैं.
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विशेषज्ञ कहते हैं कि सरकारें धीरे-धीरे लॉकडाउन हटाने पर विचार कर रही हैं. ऐसे में हवा की क्वालिटी महामारी से लड़ने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है.
एक रिसर्च के मुताबिक़ अगर प्रत्येक घन मीटर में PM 2.5 के स्तर में एक माइक्रोग्राम का भी इज़ाफ़ा होता है, तो कोविड से 15 फ़ीसद मौत ज़्यादा होती हैं. अमरीकी मानकों के हिसाब से प्रति घन मीटर हवा में PM 2.5 का स्तर 12 माइक्रोग्राम होना चाहिए. जबकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर एक घन मीटर हवा में PM 2.5 केवल 10 माइक्रोग्राम होना चाहिए.
न्यूयॉर्क में PM 2.5 का वार्षिक स्तर, तय मानकों के बिल्कुल कगार पर है. यही वजह है कि न्यूयॉर्क में ही सबसे ज़्यादा मौत हुई हैं.
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हारवर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च बताती है कि अमरीका के जिन इलाक़ों में लोग पिछले 15 से 20 वर्षों से प्रदूषण की मार झेल रहे थे, वहां कोविड-19 के कारण मौत का आंकड़ा बहुत ज़्यादा है.
प्रदूषण, रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी कमज़ोर करता है.
इटली के शहर लोम्बार्डी और एमिलिया रोमागना में की जा रही रिसर्च में भी कोविड-19 से होने वाली मौत और प्रदूषण में आपसी संबंध दिखा है. 26 अप्रैल 2020 तक इटली में कोविड-19 महामारी से 26 हज़ार 644 मौतें हुईं थीं. इनमें से अकेले लोम्बार्डी इलाक़े में तेरह हज़ार से ज़्यादा लोगों की जान गई थी. वहीं दूसरे नंबर पर रहे एमिलिया रोमागना में कोविड-19 से तीन हज़ार 386 लोगों की जान गई थी.
इटली में इन दोनों ही जगहों पर कोरोना वायरस से इतनी बड़ी तादाद में लोगों की जान जाने का संबंध रिसर्चर प्रदूषण से भी जोड़ कर देख रहे हैं.
ऐसा पहली बार नहीं है कि रिसर्चर, महामारी का संबंध प्रदूषण से जोड़कर देख रहे हैं. 2003 में सार्स के मरीज़ों पर की गई स्टडी में भी प्रदूषण और महामारी के बीच क़रीबी रिश्ता साबित हुआ था. स्टडी करने वालों ने पाया था कि ज़्यादा प्रदूषण वाले इलाक़ों में रहने वाले लोग सार्स वायरस का शिकार ज़्यादा हुए थे और मौत भी ऐसे ही इलाक़ों में ज़्यादा हुईं थीं. इटली के वैज्ञानिक कहते हैं कि नया कोरोना वायरस हवा के प्रदूषण के कणों के साथ आसानी से शरीर में पहुंच रहा है.
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चूंकि कोरोना के इस नए वायरस पर अभी रिसर्च जारी है. लिहाज़ा इससे संबंधित किसी भी जानकारी पर पुख़्ता होने की मुहर नहीं लगाई जा सकती. लेकिन रिसर्चरों की ये खोज लॉकडाउन हटाते समय सरकारों के बहुत काम आ सकती हैं. साथ ही जिन देशों में अभी इस महामारी का प्रकोप कम है, वहां की सरकारें भी इस रिसर्च का फ़ायदा उठा सकती हैं. मसलन वो अपने यहां सोशल डिस्टेंसिंग का ज़्यादा से ज़्यादा पालन कराकर इसे फैलने से रोक सकती हैं.
हारवर्ड के रिसर्चरों का कहना है कि ये रिपोर्ट ऐसे ग़रीब समुदायों के लिए तो बहुत ही काम की हैं जो ज़्यादा प्रदूषित माहौल में रहते हैं. अमरीका में 63 प्रतिशत हिस्पैनिक लोग और 56 अश्वेत अमरीकी लोग ज़्यादा प्रदूषित माहौल में रहते हैं. इस प्रदूषण को बढ़ाने में श्वेत अमरीकियों का बड़ा हाथ है. वहीं, गोरे अमरीकी इन लोगों के मुक़ाबले 17 फ़ीसद कम प्रदूषित इलाक़ों में रहते हैं.
गोरे और अफ्रीकी मूल के अमरीकियों में बीमारियां भी अलग-अलग तरह की होती है जैसे शुगर या दिल की बीमारियां. पैसे की कमी के चलते इन्हें बेहतर इलाज भी नहीं मिल पाता. लॉकडाउन की वजह से हवा साफ़ हुई है. वुहान में हवा की क्वालिटी 44 फ़ीसद तो दिल्ली में 60 फ़ीसदी बेहतर हुई है. लेकिन, हवा में आया ये सुधार अस्थायी है.
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जैसे ही लॉकडाउन हटेगा यातायात और कारखाने शुरू होंगे, प्रदूषण बढ़ने लगेगा. अगर हमें कोविड वायरस से ख़ुद को सुरक्षित रखना है तो हवा की गुणवत्ता बिगड़ने से रोकनी होगी. हालांकि, यही स्तर बरक़रार रखना आसान नहीं होगा फिर भी कोशिश तो की ही जा सकती है.
जानकार कहते हैं कि अर्थव्यवस्था बचाने के चक्कर में हम ये ना भूल जाएं कि सेहत बचाना भी ज़रूरी है. और वो तभी मुमकिन होगा जब हम प्रदूषण नियंत्रित रखेंगे. उसके लिए हमें उपाय सोचने होंगे.
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गोले प्रत्येक देश में कोरोना वायरस के पुष्ट मामलों की संख्या दर्शाते हैं.
स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां
आंकड़े कब अपडेट किए गए 5 जुलाई 2022, 1:29 pm IST
इटली के मिलान शहर के लोगों ने सोचा है कि वो कम से कम निजी वाहनों का इस्तेमाल करेंगे. इसके लिए वहां 35 किलो मीटर लंबा साइकिल ट्रैक भी बनाया जाएगा. मिलान मेट्रो 30 फ़ीसद लोगों के साथ ही चलेगी. ताकि, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जा सके.
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आज हवा जितनी साफ़ है, उतना प्रदूषण कम करने के लिए सरकारों को करोड़ों रुपए ख़र्च करने पड़ते, तब जा कर प्रदूषण कम होता. लॉकडाउन के कारण एक तरह से हमें ये साफ़ हवा तोहफ़े में मिल गई. हमें इसकी अहमियत समझनी चाहिए. ताकि ,कल जब हमारे चेहरों से मास्क हटें तो हम साफ़ हवा में सांस ले सकें. और स्वस्थ ज़िंदगी जी सकें.
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कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
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अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
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शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.