कोरोना वायरस महामारीः क्या हम कभी इम्यून हो पाएंगे?

    • Author, विलियम पार्क
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

इस समय दुनिया भर में नए कोरोना वायरस के टीके पर रिसर्च चल रही है. रोज़ नई प्रगति की ख़बरें आ रही हैं. लॉकडाउन की वजह से घरों में क़ैद लोगों में ये ख़बरें एक नई उम्मीद जगाती हैं. उन्हें लगता है कि घर में क़ैद रहने के दिन अब ख़तम होने वाले हैं. न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में लॉकडाउन से कुछ रियायतें दी हैं.

लॉकडाउन से कब और कितनी रियायत दी जाएगी, ये इस बात पर निर्भर करता है कि एंटीबॉडी टेस्ट की कितनी ज़रूरत है. अगर हम ये पता कर सकें कि किसी को नए कोरोना वायरस ने संक्रमित किया था और वो ठीक हो चुका है. और अब उसके शरीर में इस वायरस से लड़ने की क्षमता विकसित हो चुकी है. तो ऐसे लोगों को दोबारा काम पर जाने की इजाज़त दी जा सकती है.

इसके लिए पहली शर्त तो ये है कि एक ऐसे एंटीबॉडी टेस्ट को विकसित किया जाए, जो भरोसेमंद हो. क्योंकि हाल ही में भारत में शुरू किए गए एंटीबॉडी टेस्ट को बीच में रोकना पड़ा था. इनके नतीजों पर जानकारों को भरोसा नहीं था.

एंटीबॉडी असल में एक प्रोटीन होती है, जो हमारा शरीर किसी संक्रमण के दौरान बनाता है. इससे हमारे शरीर पर हमला करने वाले वायरस, कीटाणु या किसी अन्य रोगी बनाने वाले जीव को निशाना बनाया जाता है. ये एंटीबॉडी उस विषाणु से लिपट कर उसे ख़त्म कर देते हैं. या फिर हमारे शरीर की इम्यून कोशिकाओं को आदेश देते हैं कि वो इन हमलावर विषाणुओं या कीटाणुओं को ख़त्म कर दें.

किसी भी संक्रमण के बाद हमारे ख़ून में एंटीबॉडी प्रोटीन बची रह जाती हैं. ऐसा इसलिए होता है कि अगर कहीं वो हमलावर वायरस या बैक्टीरिया दोबारा शरीर में आए, तो उसे फिर से ख़त्म किया जा सके.

लेकिन, नए कोरोना वायरस के साथ भी ऐसा हो ये ज़रूरी नहीं. हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन की मारिया वान कर्खोव ने चेतावनी दी थी कि ये वायरस इससे पहले इंसान के शरीर में कभी नहीं रहा था.

इंपीरियल कॉलेज लंदन की कैटरीना पोलॉक कहती हैं कि, 'अभी ये वायरस हमारे शरीर के लिए नया है. अभी हम इसके बारे में बहुत सी नई बातें जान रहे हैं. किसे ये वायरस संक्रमित करता है और ये क्यों सबसे अहम सवाल है. अगर इस वायरस से कोई भी संक्रमित नहीं होगा, तो हमारी चिंता दूर होगी.'

जब भी कोई नया वायरस इंसानों पर हमला करता है. तो हर व्यक्ति का शरीर उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता के मुताबिक़ उससे मुक़ाबला करता है. ये हर इंसान में अलग होती है. जो उसकी उम्र, लड़ने की शक्ति और आनुवांशिक कारणों से निर्धारित होती है.

आम तौर पर संक्रमण होने पर हमारे शरीर का तापमान बढ़ जाता है. शरीर में वायरस को निगलने वाली कोशिकाएं फैगोसाइट्स बनने लगती हैं. जल्द ही वायरस को शरीर से मार भगाया जाता है. इसे एडैप्टिव इम्यून रिस्पॉन्स या प्रतिक्रियात्मक प्रतिरोधक क्षमता कहते हैं.

हमारे शरीर में दो तरह की इम्यून कोशिकाएं होती हैं. टी (T) और बी (B) कोशिकाएं. बी कोशिकाएं, पहले हमला कर चुके कीटाणुओं या विषाणुओं से लड़ने के लिए एंटीबॉडी निर्मित करती हैं.

अमरीका की येल यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर एइकिको इवासाकी कहती हैं कि, 'टी कोशिकाएं हमारे शरीर की उन कोशिकाओं को ख़त्म कर देती हैं, जिनमें वायरस का संक्रमण हो चुका होता है.'

किसी भी वायरस का पहला संक्रमण होने पर हमारे शरीर को उससे निपटने में थोड़ा समय लगता है. मगर दूसरी बार उसी वायरस के अटैक से निपटने को हमारा शरीर तैयार होता है. क्योंकि तब तक एंटीबॉडी का निर्माण हो चुका होता है.

मगर, ये सिद्धांत कोरोना वायरस पर लागू होता है या नहीं, फिलहाल कहना मुश्किल है. अब तक की रिसर्च ये बताती हैं कि एक बार संक्रमित हो चुके व्यक्ति पर अगर कोरोना वायरस दोबारा हमला करता है, तो वो फिर से संक्रमित हो सकता है. ये रिसर्च चूहों और मकाक बंदरों पर हुई है.

चीन में कोरोना वायरस के संक्रमण से ठीक हुए तीस फ़ीसद लोगों में एंटीबॉडी नहीं पाए गए. यानी ये लोग बिना वायरस से लड़ने की एंटीबॉडी प्रोटीन विकसित किए हुए ही ठीक हो गए थे.

प्रोफ़ेसर इवासाकी कहती हैं कि, 'शायद इन लोगों की टी कोशिकाओं ने ज़्यादा फ़ुर्ती से काम किया. और वायरस को मार भगाया. इसलिए एंटीबॉडी विकसित नहीं हुई.'

नए कोरोना वायरस के कुछ मरीज़ों को ठीक हुए लोगों के प्लाज़्मा से सुरक्षित किया जा सकता है. प्लाज़्मा असल मे हमारे ख़ून का सीरम होता है. जो किसी वायरस के संक्रमण से ठीक हुए व्यक्ति से ख़ून निकाल कर, उसमें से बाक़ी कोशिकाएं छांट कर तैयार किया जाता है. तब केवल सीरम या एंटीबॉडी बचता है. जिसे मरीज़ों को चढ़ाया जाता है. इसे सीरम थेरेपी भी कहते हैं.

लेकिन, प्रोफ़ेसर एइकिको इवासाकी का कहना है कि प्लाज़्मा थेरेपी को बहुत से लोगों के इलाज के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. इसके लिए कोरोना वायस से ठीक हुए लोगों से ख़ून निकालना होगा. फिर उसमें से एंटीबॉडी वाला सीरम अलग करना होगा. फिर इसे मरीज़ों को चढ़ाया जाएगा. ये ख़ून देने और ख़ून चढ़ाने जैसी प्रक्रिया है. फिर भी मरीज़ को ठीक होने में समय लगेगा. ये इलाज अस्पतालों में ही मुमकिन है. दूर दराज़ के इलाक़ों में कोरोना वायरस के मरीज़ों की प्लाज़्मा थेरेपी कर पाना संभव नहीं.

आम तौर पर किसी वायरस का प्रकोप फैलने के बाद बहुत से लोगों में इससे लड़ने की क्षमता विकसित हो जाती है. लेकिन, इसमें कई बरस लग सकते हैं. इसीलिए, साइंस पत्रिका ने कहा है कि हमें शायद 2022 तक सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना पड़े.

कोरोना वायरस के अन्य प्रकोपों, जैसे कि सार्स या मर्स का टीका भी अब तक नहीं खोजा जा सका है.

वायरस के प्रकोप से ठीक हुए व्यक्ति को काम पर लौटने की इजाज़त देने से पहले उसका पीसीआर टेस्ट फिर से करना होगा. जिससे ये पता चले कि उसके शरीर में ज़िंदा वायरस तो नहीं.

प्रोफ़ेसर इवासाकी कहती हैं कि क़रीब तीस फ़ीसद लोगों में वायरस से लड़ने की एंटीबॉडी नहीं बनती.

वहीं कैटरीना पोलॉक का कहना है कि, 'अभी ये महामारी फैल ही रही है और इस पर रिसर्च भी जारी है. ऐसे में हम लोगों के ज़हन में उठ रहे हर सवाल का जवाब नहीं दे सकते.'

इसलिए, लॉकडाउन से कब छुटकारा मिलेगा. दुनिया कोरोना वायरस से पहले वाली सामान्य ज़िंदगी कब जी सकेगी. ये बता पाना मुश्किल है.

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