क्या हवाई सफ़र का तौर-तरीक़ा अब बदलने वाला है?

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- Author, डायन सेल्किर्क
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
पिछले साल दिसंबर महीने में कनाडा में एक छोटे से विमान ने बहुत ही छोटी सी उड़ान भरी.
इसने महज़ चार मिनट का सफ़र तय किया. लेकिन, ये छोटी सी उड़ान एविएशन सेक्टर के लिए लंबी छलांग कही जा रही है.
कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में ये सिक्स सीटर विमान डे हैविलैंड, रिचमंड नाम की जगह पर फ्रेज़र नदी पर उतरा. ये एक सी-प्लेन था.
जो पानी से उड़ान भर कर पानी में ही उतर सकता था. ये उड़ान कई महीनों की मशक़्क़त का नतीजा थी.
जिसमें विमान कंपनी हार्बर एयर के साथ तकनीकी कंपनी मैग्नीएक्स का भी योगदान था.
असल में ये पहली उड़ान थी, जिसमें विमान ने जेट फ्यूल के बजाय बैटरी का इस्तेमाल कर के हवा में छलांग लगाई थी.

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सोलर एनर्जी
हार्बर एयर के संस्थापक ग्रेग मैक्डोगल ख़ुद ये विमान उड़ा रहे थे. उन्होंने चार मिनट का ये सफ़र तय करने के बाद बताया कि वो इस उड़ान के लिए कई वर्षों से प्रयासरत थे.
हार्बर एयर के पास 40 कारोबारी विमान हैं, जो पानी में तैर सकते हैं. वो अमरीका और कनाडा के तटीय इलाक़ों के लोगों को छोटी उड़ानों का सफर कराते हैं.
ग्रेग मैक्डोगल लंबे समय से अपनी विमान कंपनी को ग्रीन बनाने के लिए प्रयासरत हैं. 2007 में ही उनकी कंपनी कार्बन न्यूट्रल हो गई थी.
उनके विमानों के गोदाम में सोलर पैनल लगे हैं. कंपनी के ज़्यादातर दफ़्तर सोलर एनर्जी से चलते हैं. लेकिन, ग्रेग इतने भर से संतुष्ट नहीं थे.
वो चाहते थे कि उनके विमान भी हरित ईंधन यानी कार्बन उत्सर्जन न करने वाले ईंधन पर चलें. जैसे कि इलेक्ट्रिक कारें. लेकिन, कोई अच्छा रास्ता नहीं सूझ रहा था.

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पहली इलेक्ट्रिक विमान
तभी फ़रवरी 2019 में मैग्नीएक्स के रोई गैंजार्सकी ने उनसे संपर्क किया. वो ग्रेग के छोटे विमानों को उड़ान की ताक़त देने के लिए बैटरी मुहैया कराने को तैयार थे.
ये दोनों ही कंपनियां पर्यावरण को बचाने के लिए संघर्षरत हैं. मक़सद एक थे, तो फ़ौरन दिल भी मिले. ग्रेग और रोई की टीमों के बीच भी अच्छा तालमेल हो गया.
क़रीब 11 महीनों के प्रयास के बाद हार्बर एयर का पहला विमान बैटरी से उड़ान भरने को तैयार था. वैसे, ये पहली इलेक्ट्रिक विमान उड़ान नहीं थी.
इलेक्ट्रिक विमान पिछली सदी के 70 के दशक से ही चलन में हैं. लेकिन, इलेक्ट्रिक विमान हल्के होते हैं और थोड़ी दूर तक का ही सफ़र तय कर सकते हैं.
इसलिए ये प्रयोगात्मक स्तर तक सीमित रहे. सौर ऊर्जा से चलने वाले विमान भी भारी होने की वजह से उड़ान की लंबी छलांग नहीं लगा सके.
इस वजह से इनमें किसी की दिलचस्पी नहीं रह गई थी.

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एयर टैक्सी से लेकर एयर एंबुलेंस तक
लेकिन, जैसे-जैसे पर्यावरण का संकट गहराता जा रहा है, वैसे-वैसे एक बार फिर से विमान कंपनियां इलेक्ट्रिक विमान बनाने की दिशा में कोशिश कर रही हैं.
इस वक़्त दुनिया में इलेक्ट्रिक विमान के 170 प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है. इनका इस्तेमाल, निजी छोटे विमानों, शहरी एयर टैक्सी से लेकर एयर एंबुलेंस में करने का प्रयास है.
एयरबस जैसी बड़ी कंपनियों ने भी 2021 तक पहला इलेक्ट्रिक विमान उड़ान के लिए तैयार करने का एलान किया है.
मगर, एयरबस के इस विमान के चार में से केवल एक इंजन में बैटरी का प्रयोग होगा. बाक़ी इंजन अभी भी जीवाश्म ईंधन यानी एयर टर्बाइन फ्यूल का प्रयोग करेंगे.
इसी वजह से हार्बर एयर की ये छोटी सी उड़ान, विमानन के क्षेत्र की लंबी छलांग कही जा रही है.

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ताक़तवर बैटरी की ज़रूरत
चूंकि हार्बर एयर के विमान छोटे होते हैं. कम दूरी के सफ़र में काम आते हैं. इसलिए हार्बर एयर के विमानों को बैटरी से उड़ाना ज़्यादा आसान होगा.
हालांकि हार्बर एयर की इंजीनियरिंग और क्वालिटी मैनेजर एरिका होल्त्ज़ कहती हैं कि अभी भी लोगों को इलेक्ट्रिक विमानों की सुरक्षा पर भरोसा नहीं है.
यही फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती है. हालांकि एरिका नाउम्मीद नहीं हैं. वो कहती हैं कि एविएशन सेक्टर में पिछले 50 वर्षों में कोई नई तकनीक नहीं ईजाद हुई है.
ऐसे में बैटरी से विमान को उड़ाना एक बड़े परिवर्तन का संकेत है. इस मामले में सबसे बड़ी चुनौती है, बैटरी की क्षमता का विस्तार करना.
बहुत से विशेषज्ञों को आशंका है कि विमान उड़ाने के लिए जितनी ताक़तवर बैटरी की ज़रूरत है, वो जल्द उपलब्ध नहीं होने जा रही है.

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एविएशन सेक्टर
इसी मामले में हार्बर एयर क़िस्मतवाली कंपनी है. क्योंकि, उसकी उड़ानें छोटी दूरी की हैं. और विमान भी भारी नहीं हैं. तो मौजूदा तकनीक से उनका काम चल जाएगा.
कंपनी को उम्मीद है कि अगले दो वर्षों में उनकी पहली इलेक्ट्रिक कमर्शियल उड़ान हवा में जाने को तैयार होगी.
हालांकि, इससे एविएशन सेक्टर में बहुत बड़ा फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला. मगर, ये प्रतीकात्मक बदलाव बहुत बड़ा संदेश देता है.
आज दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन का 2.4 प्रतिशत, विमानों की उड़ान से निकलता है.
इनमें से भी 24 फ़ीसद कार्बन उत्सर्जन केवल अमेरिका में उड़ने वाले विमानों से पैदा होता है. गैरी और रोई कहते हैं, इसमे कमी लाना बहुत बड़ा प्रेरक तत्व है.
ये दोनों मानते हैं कि वो इलेक्ट्रिक विमान उड़ाने की अगुवाई इस उम्मीद में कर रहे हैं कि अन्य कंपनियां भी उनके दिखाए रास्ते पर चलेंगी.

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