पायलट के बग़ैर उड़ सकने वाले विमानों के सामने हैं ये तीन चुनौतियां

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आज का दौर ऑटोमेशन का है. सब काम मशीनें ख़ुद करना सीख रही हैं. बिना ड्राइवर की कार के बाद जल्द ही बिना पायलट वाले हवाई जहाज़ आने वाले हैं. इस साल पेरिस एयर शो में यूरोपीय विमान निर्माता कंपनी एयरबस ने कहा कि वो बिना पायलट वाले विमान के लिए एयर ट्रैफ़िक के नियंत्रकों को राज़ी करने की कोशिश कर रही है.
आज दुनिया भर में विमान यात्राएं करने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है. इसके लिए अगले 20 बरस में 8 लाख पायलटों की ज़रूरत होगी. लेकिन, नए पायलटों की उपलब्धता इस ज़रूरत को पूरा नहीं कर पा रही है. अमरीकी एयरलाइन कंपनी बोइंग का कहना है कि पायलटों की कमी, उड्डयन उद्योग के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनने जा रही है.
इस चुनौती से निपटने में नई तकनीक मदद कर सकती है. पायलट के बग़ैर उड़ सकने वाले विमानों की आमद स्वागत योग्य तो है, लेकिन इस राह में बड़ी चुनौतियां भी हैं. इन में से तीन प्रमुख हैं.

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राजनीति
कोई भी नई चीज़ आती है, तो किसी को फ़ायदा होता है और किसी को नुक़सान. जब कारों को ईजाद किया गया तो उससे रेलवे में रोज़गार करने वालो को झटका लगा. रेलगाड़ियों से चलने वालों की संख्या में कमी आई. इससे पहले जब रेलवे का आविष्कार हुआ था, तो उसने नहरों और नदियों से होने वाले परिवह को कमोबेश ख़त्म कर दिया था. इसका नतीजा ये हुआ था कि कुछ लोगों को नई नौकरियां मिलीं. वहीं पुराने पेशे में काम करने वाले कुछ लोगों की नौकरियां चली गईं.
निकोलस कार ने अपनी किताब 'द ग्लास केज' में ये बात बड़े अच्छे अंदाज़ में कही है. निकोलस ने लिखा है कि, 'ऐसा कोई भी आर्थिक नियम नहीं है कि नई तकनीक से सभी को फ़ायदा ही होगा.'
बिना पायलट वाले विमान इसकी बढ़िया मिसाल हैं. इस तकनीक से हवाई यात्रा में तो इंक़लाब आएगा. लेकिन, इसकी क़ीमत नौकरियां गंवा कर हासिल होगी. बहुत से पायलटों की नौकरी चली जाएगी. एयरलाइन उद्योग में दसियों हज़ार लोग नौकरी करते हैं. जो अरबों मुसाफ़िरों को उनकी मंज़िलों तक पहुंचाते हैं. ये काम मशीनों के हवाले करने से इसे करने वालों की नौकरी जाएगी. फिर उन्हें रोज़ी चलाने के लिए नया हुनर सीखना होगा.
यहीं राजनीति होने लगती है. एयरलाइनों के पायलटों की मज़बूत यूनियनें हैं. जो मोलभाव करती हैं. एयरलाइन कंपनियों पर दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवाती हैं.
जैसे कि एयरलाइन पायलटएसोसिएशन यानी अल्पा (Alpa). दुनिया भर में इसके 63 हज़ार सदस्य हैं. 1960 के दशक में विमानों के कॉकपिट में तीन क्रू मेंबर हुआ करते थे. दो पायलट और एक फ्लाइट इंजीनियर होता था. लेकिन, तकनीक की तरक़्क़ी से फ्लाइट इंजीनियर की ज़रूरत नहीं रह गई. लेकिन पायलट एसोसिएशन ने इसका विरोध किया. जिसकी वजह से फ्लाइट इंजीनियरों को दूसरी नौकरी दी गई. ऐसे ही मोलभाव हम तब देखेंगे, जब बिना पायलट वाले विमान लॉन्च होंगे.
इन पायलटों के साथ लड़ाई में वो लोग भी शामिल होंगे, जो पायलटों को ट्रेनिंग देते हैं. इसी तरह वो यूनिवर्सिटी, कॉलेज और फ्लाइट स्कूल होंगे, जो पायलट तैयार करते हैं. क्योंकि पायलटलेस तकनीक से इनकी नौकरियों को भी ख़तरा होगा.

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बीमा
विमान सस्ते नहीं होते हैं. बोइंग 737 जैसा विमान क़रीब 10 करोड़ डॉलर में आता है. इससे बड़ा यानी बोइंग 777 विमान क़रीब 30 करोड़ डॉलर का पड़ता है. 2011 में अमेरिकन एयरलाइंस ने अपने विमानों के बेड़े की मरम्मत में 30 अरब डॉलर ख़र्च किए थे. भारतीय एयरलाइन इंडिगो ने भी अपने विमानों की मरम्मत में मोटी रक़म ख़र्च किए थे. इस लागत को वसूल करने के लिए कंपनियों को विमानों की उड़ान बढ़ानी पड़ती है. इससे हादसे होने के ख़तरे बढ़ जाते हैं.
इस नुक़सान से बचने के लिए एयरलाइन कंपनियां बीमा कराती हैं. एयरलाइंस, बीमा कराने का प्रीमियम कितना देती हैं, इसका सिर्फ़ अंदाज़ा लगाया जा सकता है. लेकिन, बीमा कंपनियां प्रतिद्वंदी से मुक़ाबले के लिए अपने रेट छुपा कर रखती हैं. लेकिन, एयरलाइन उद्योग को इसके लिए हर साल अरबों रुपए ख़र्च करने पड़ते हैं. इसका असर उनके मुनाफ़े पर भी पड़ता है.
सवाल ये उठता है कि अगर बिना पायलट वाले विमान आ गए, तो इसका बीमा पर कितना असर पड़ेगा? होना तो ये चाहिए कि बीमा का प्रीमियम कम हो जाए. क्योंकि मशीनें बेहतर तरीक़े से विमान उड़ाएंगी. इससे हादसों की आशंका कम होगी. हालांकि हक़ीक़त में बीमा कम होगा, ये अभी नहीं कहा जा सकता है.
आज के विमान आला दर्ज़े की तकनीक की मदद से उड़ते हैं. जिससे हादसों की आशंका कम होती जाती है. ये विमान हज़ारों कोड की मदद से उड़ाए जाते हैं. लेकिन, इनसे नए तरह का ख़तरा पैदा होता है. 2015 में बोइंग के ड्रीमलाइनर का एक सॉफ्टवेयर गड़बड़ था, जिसे इंजीनियर पकड़ नहीं सके. इससे उस में आग लगने का ख़तरा जताया गया था. एयरबस 350 में भी हाल ही में ऐसी ही कमी पकड़ी गई. ये भी सॉफ्टवेयर की कमी से हुआ था.
आज विमानों के कोड हैक किए जाने का भी ख़तरा सामने खड़ा है. 2008 में ही सरकारों ने ये आशंका जताई थी कि बोइंग के ड्रीमलाइनर को कंप्यूटर से हैक किया जा सकता है. फिर पायलट जो कमांड देगा, वो विमान नहीं मानेगा.
बिना पायलट वाले विमानों के साथ ये ख़तरा और बढ़ेगा. ख़तरा बढ़ेगा, तो विमानों का बीमा भी बढ़ेगा.

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तनख़्वाह
पायलटों को मोटी तनख़्वाह मिलती है. पांच साल के तजुर्बे वाले पायलटों की तनख़्वाह डेढ़ लाख डॉलर की दर से शुरू होती है. वहीं सीनियर पायलटों की तनख़्वाह ढाई लाख डॉलर तक हो सकती है. अब एयरलाइन उद्योग अपने ख़र्च घटा रहे हैं. ऐसे में पायलटों की तनख़्वाह में जाने वाली ये मोटी रक़म बिना पायलट वाले विमानों से बचाई जा सकती है.
स्विस बैंक यूबीएस का अनुमान है कि कॉकपिट से इंसानों को हटा देने से हर साल क़रीब 35 अरब डॉलर का ख़र्च बचाया जा सकता है. इससे एयरलाइन उद्योग का ख़र्च कम होगा. इसीलिए एयरबस और बोइंग कंपनियां पायलटलेस विमानों को लेकर उत्साहित हैं.
हालांकि आटोमैटिक होने का ये मतलब नहीं कि विमान उड़ाने में इंसानों की ज़रूरत ख़त्म हो जाएगी. हां उनकी संख्या कम ज़रूर होगी. अगर इमरजेंसी के लिए भी विमान में एक पायलट होगा, तो भी विमान कंपनियों का ख़र्च क़रीब 20 अरब डॉलर तक कम होगा.
मगर, इस में विमान निर्माताओं को आशंका है. वो कहते हैं कि अगर एक पायलट विमान में होगा और एक ज़मीन से निगरानी करेगा, तो वो एक साथ कितने विमानों की निगरानी कर सकेगा? और दूसरा पायलट रखना ही पड़ा, तो उसका ख़र्च विमान कंपनियों को क़रीब 12 अरब डॉलर का पड़ेगा. इसका मतलब ये हुआ कि एयरलाइंस का इतना मुनाफ़ा कम हो जाएगा. कुल मिलाकर, पायलट के बग़ैर उड़ने वाले इस विमान पर कमोबेश उतना ही ख़र्च विमान कंपनियों को देना होगा. हां, अगर ज़मीन पर मौजूद एक पायलट कई विमानों पर नज़र रख सकेगा, तो एयरलाइंस का ख़र्च कम होगा. लेकिन, इस में जोखिम भी होगा. क्योंकि सवाल ये होगा कि अगर कोई विमान मुश्किल में होगा तो उसकी मदद करते हुए क्या ज़मीन में बैठा पायलट दूसरे विमानों की निगरानी कर सकेगा?
जब तक इंसान में ये ख़ूबी नहीं आएगी, बिना पायलट वाले विमानों का सपना अधूरा ही रहेगा.
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