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दुनिया भर की कारों जितना प्रदूषण फैलाते हैं केवल 15 समुद्री जहाज़
- Author, क्रिस ब्राउनिक
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
मशीनों का ज़माना है. हर काम इंसान के बजाय मशीनों से कराने की कोशिश हो रही है.
अब जैसे, दुनिया भर में कई कंपनियां ड्राइवर लेस कारें चलाने का प्रयोग कर रही हैं. अमरीका में तो ख़ुद से चलने वाली बसों और ट्रकों का ट्रायल भी चल रहा है.
बात यहीं तक रहती तो भी ठीक था, अब तो कई कंपनियां ऐसी हैं, जो ख़ुद से चलने वाले पानी के जहाज़ो का तजुर्बा भी कर रही हैं.
ऐसी ही एक कंपनी है, फिनलैंड की वार्टसिला. अगस्त महीने में इस कंपनी के एक इंजीनियर ने अमरीका के कैलिफोर्निया में बैठकर, स्कॉटलैंड के पास एक जहाज़ को चलाया. इस इंजीनियर ने जीपीएस और दूसरी नई तकनीक की मदद से जहाज़ को तमाम ख़तरों से बचाते हुए सुरक्षित ठिकाने पर पहुंचाया.
कैप्टन की ज़रूरत ख़त्म
वार्टसिला का मानना है कि भविष्य के लिए हमें ऐसे स्मार्ट जहाज़ बनाने ही होंगे. इससे जहाज़ के मालिकों को पता होगा कि उनके जहाज़ समंदर में कहां हैं, किस रफ़्तार से आगे बढ़ रहे हैं. वो कब तक अपने ठिकानों पर पहुंचेंगे.
बात सिर्फ़ यहीं तक सीमित नहीं है. वार्टसिला के जहाज़ को तो इंजीनियर चला रहे थे रिमोट से. अब तो ऐसे जहाज़ बनाने की कोशिश हो रही है, जिसे कंप्यूटर के ज़रिए चलाया जाएगा. यानी जहाज़ के कैप्टन की ज़रूरत ही ख़त्म हो जाएगी.
ये बात कितनी अहम है, इसके लिए हमें सबसे पहले जहाज़ों की अहमियत समझनी होगी. आज दुनिया भर के कारोबार का सबसे बड़ा हिस्सा पानी के बड़े-बड़े जहाज़ों के ज़रिए होता है. डीज़ल से चलने वाले बड़े-बड़े जहाज़ समंदर की लहरों पर चलते हुए सामान दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचाते हैं.
पूरी दुनिया की कारों के बराबर प्रदूषण
इनके ज़रिए प्रदूषण भी बहुत फैलता है. आप ये जानकर हैरान हो जाएंगे कि दुनिया के 15 सबसे बड़े पानी के जहाज़ मिलकर उतना प्रदूषण फैलाते हैं, जितना दुनिया की सारी कारें मिलकर करती हैं.
पिछली एक सदी में जहाज़ बनाने में बहुत ज़्यादा नई तकनीक का इस्तेमाल नहीं हुआ है. ऐसे में इस सेक्टर में सुधार की बहुत उम्मीद दिखती है. ज़रूरत भी है.
अगर हम तकनीक के इस्तेमाल से ख़ुद से चलने वाले हल्के जहाज़ बनाकर उन्हें कामयाबी से चला सकते हैं, तो ये अर्थव्यवस्था और दुनिया की आबो-हवा के लिए बहुत बड़ी बात होगी.
नॉर्वे की एक कंपनी कॉन्ग्सबर्ग ने तो पूरी तरह से ऑटोमैटिक जहाज़ का तजुर्बा भी शुरू कर दिया है. कॉन्ग्सबर्ग ने द ह्रॉन और यारा बिर्कलैंड नाम के दो ऐसे जहाज़ बनाने शुरू किए हैं, जो पूरी तरह से आटोमैटिक होंगे. बिर्कलैंड 80 मीटर लंबा मालवाहक जहाज़ होगा. ये पूरी तरह से बिजली से चलेगा और 2018 के आख़िर में समंदर में उतारा जाएगा.
कंपनी के निदेशक पीटर ड्यू कहते हैं कि इस जहाज़ में इतने शानदार सेंसर लगे हैं कि अगर इस के सामने समंदर में तैरती हुई बीयर की बोतल भी आ जाएगी, तो उससे भी बचकर निकलने की कोशिश करेगा.
इस जहाज़ में ऐसी तकनीक लगाई गई है कि इसके सेंसर समुद्री जानवरों और बीयर या चट्टान जैसी चीज़ों में फ़र्क़ कर सकेंगे. ऐसे में इस जहाज़ के लिए समंदर में बिना कैप्टन के चलना आसान होगा.
मगर इसमें सब से बड़ी दिक़्क़त ये आएगी कि अभी दुनिया के समुद्री नियम ऑटोमैटिक जहाज़ों की इजाज़त नहीं देते.
ब्रिटेन की साउथैम्पटन यूनिवर्सिटी ने अंदाज़ा लगाया है कि ख़ुद से चलने वाले ऐसे जहाज़ जल्द ही समंदर में उतारे जाने लगेंगे. फिर इनके लिए समुद्री नियम-क़ायदे बदलने की ज़रूरत होगी.
ग्लास फ़ाइबर से बनेंगे जहाज़
पीटर ड्यू कहते हैं कि किसी एक देश की समुद्री सीमा के भीतर तो आटोमैटिक जहाज़ चलाने आसान होंगे. क्योंकि उसके लिए एक देश को अपने क़ानून बदलने होंगे. मगर, दुनिया भर के लिए एक क़ानून बनाने में वक़्त लगेगा.
तब तक कंपनियां अपने देश के समुद्री दायरे में ऐसे आटोमैटिक जहाज़ों को चलाकर नई तकनीक का तजुर्बा हासिल कर सकती हैं.
दूसरी नई बात जो करने की कोशिश हो रही है, वो है हल्के जहाज़ बनाने की. अब जो जहाज़ हज़ारों टन तेल लेकर सफर करते हैं, उन्हें हल्का बनाना तो मुश्किल है. क्योंकि इससे ख़तरा बढ़ेगा. लेकिन दूसरे जहाज़ों को ग्लास फाइबर के इस्तेमाल से हल्का बनाने की कोशिश शुरू हो गई है.
यूरोपीय यूनियन ने हाल ही में फाइबरशिप नाम से एक प्रोजेक्ट शुरू किया है. इस प्रोजेक्ट में कार्गो यानी मालवाहक जहाज़ के सामने और नीचे का हिस्सा फाइबर से बनाने की कोशिश की जाएगी. साथ ही ये भी ध्यान रखा जाएगा कि इनकी मज़बूती पर असर न पड़े. ऐसे जहाज़ जो 50 मीटर से ज़्यादा लंबे होते हैं, उन्हें इस फाइबरशिप प्रोजेक्ट के तहत बनाया जाएगा.
हालांकि भारी मालवाहक जहाज़ अभी भी स्टील से ही बनाए जाएंगे.
इसी तरह जापान की कंपनी इको मरीन पावर जहाज़ों पर ऐसे पतवार लगा रही है, जिनमें सोलर पैनल हों. इससे अपने चलने भर की बिजली जहाज़ ख़ुद पैदा कर सकेंगे. कंपनी के निदेशक ग्रेग ऐट्किंसन कहते हैं कि तकनीक सुधर रही है. खर्च कम हो रहा है. ऐसे में पतवार पर सोलर पैनल लगाकर काफ़ी पैसे बचाए जा सकते हैं.
थ्री-डी प्रिंटिंग तकनीक
ऐट्किंसन कहते हैं कि पतवार पर सोलर पैनल और जहाज़ पर पवनचक्की लगाकर बड़े जहाज़ अपनी ज़रूरत का 80 फ़ीसद तक ईंधन ख़ुद से बना सकते हैं. बाक़ी के लिए डीज़ल जैसे ईंधन का इस्तेमाल होता रहेगा.
इको मरीन कंपनी अपने ऐसे मालवाहक जहाज़ का जल्द ही परीक्षण करने वाली है. ऐसे ही और भी जहाज़ बनाने की तैयारी दुनिया की दूसरी कंपनियां भी कर रही हैं.
मगर इसमें सबसे बड़ी दिक़्क़त नई तकनीक की आ रही है. इसके लिए भारी लागत की ज़रूरत है. जोख़िम भी है. क्योंकि समंदर में तूफ़ान में फंसने पर सोलर पैनल वाले पतवार जहाज़ को नुक़सान भी पहुंचा सकते हैं.
जहाज़ बनाने में थ्री-डी प्रिंटिंग तकनीक की भी मदद ली जा रही है. हाल ही में जहाज़ के कुछ कल-पुर्ज़े बनाने के लिए नीदरलैंड की एक कंपनी ने थ्री-डी प्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल किया था.
इसका फ़ायदा ये होगा कि समंदर में कोई कल-पुर्ज़ा टूटने पर जहाज़ पर ही थ्रीडी प्रिंटिंग की मदद से उसे फ़ौरन बनाया जा सकेगा. इससे जहाज़ फंसेंगे नहीं. उनकी मरम्मत का ख़र्च भी कम होगा.
अगर ये सारे तकनीकी तजुर्बे कामयाब होते हैं, तो दुनिया भर में जहाज़ का कारोबार पूरी तरह से बदल जाएगा.
(मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)
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