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मशीनों के ख़तरे का हमें अंदाज़ा तक नहीं
हॉलीवुड में तमाम ऐसी फ़िल्में बनीं हैं, जिनमें मशीनों को इंसानों से भी अक़्लमंद दिखाया गया है. कई फ़िल्मों में तो ऐसी अक़्लमंद मशीनों की वजह से इंसानियत को बहुत बड़ी चुनौती मिलने की कहानियां भी दिखाई गई हैं.
बहुत से वैज्ञानिक इन फ़िल्मी क़िस्सों के हक़ीक़त में तब्दील होने का डर जताते रहे हैं. वैज्ञानिक स्टीफ़न हॉकिंग से लेकर कारोबारी एलन मस्क और माइक्रोसॉफ्ट के मालिक बिल गेट्स तक ये कह चुके हैं कि आने वाले वक़्त में इंसानों को सुपरस्मार्ट मशीनों से चुनौती मिल सकती है. इसीलिए एलन मस्क जैसे वैज्ञानिक ओपन एआई जैसे प्रोजेक्ट में पैसे लगा रहे हैं. जिससे मानवता की मददगार अक़्लमंद मशीनें तैयार की जाएंगी.
हालांकि बहुत से लोग कहते हैं कि आगे चल के इंसानों को रोबोट से ख़तरा होगा, ये डर बेमानी है.
हालांकि जिस तरह से हम मशीनी दिमाग़ पर निर्भर होते जा रहे हैं, उससे ख़तरे तो बढ़े ही हैं. इंसान ने साइंस की तरक़्क़ी के साथ बहुत सी स्मार्ट मशीनें बना ली हैं. हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसी मशीनों का दखल बढ़ता जा रहा है. इसके अपने ख़तरे हैं. हो सकता है कि ये ख़तरे कुछ ऐसे हों जिनका हमें अंदाज़ा तक नहीं.
पहले तो ये समझना होगा कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस है क्या?
फैक्ट्रियों में बहुत सी मशीनें ऐसी होती हैं जो एक ही काम को बार-बार करती रहती हैं. लेकिन उन मशीनों को स्मार्ट नहीं कहा जा सकता. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वो है जो इंसानों के निर्देश को समझे, चेहरे पहचाने, ख़ुद से गाड़ियां चलाए, या फिर किसी गेम में जीतने के लिए खेले.
अब ये आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस हमारी कई तरह से मदद करते हैं. जैसे एपल का सीरी या माइक्रोसॉफ्ट का कोर्टाना. ये दोनों हमारे निर्देश पर कई तरह के काम करते हैं. बहुत से होटलों में रोबोट, मेहमानों की मेज़बानी करते हैं.
आज ऑटोमैटिक कारें बनाई जा रही हैं. इसी तरह बहुत से कंप्यूटर प्रोग्राम हैं, जो कई फ़ैसले करने में हमारी मदद करते हैं. जैसे गूगल की आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस कंपनी डीपमाइंड, ब्रिटिश नेशनल हेल्थ सर्विस के साथ मिलकर कई प्रोजेक्ट पर काम कर रही है. आज कल मशीनें इंसान की सर्जरी तक कर रही हैं. वो इंसान के शरीर में तमाम बीमारियों का पता लगाती हैं.
बनावटी अक़्ल की मदद से आज बहुत से तजुर्बे किए जा रहे हैं. नई दवाएं तैयार की जा रही हैं. नए केमिकल तलाशे जा रहे हैं. जो काम करने में इंसान को ज़्यादा वक़्त लगता है, वो इन मशीनी दिमाग़ों की मदद से चुटकियों में निपटाया जा रहा है.
इसी तरह बहुत से पेचीदा सिस्टम को चलाने में भी इन आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद ली जा रही है. जैसे पूरी दुनिया में जहाज़ों की आवाजाही का सिस्टम कंप्यूटर की मदद से चलाया जा रहा है. कौन जहाज़ कब, किस रास्ते से गुज़रेगा, कहां सामान पहुंचाएगा, ये सब मशीनें तय करके निर्देश देती हैं. इसी तरह खनन उद्योग से लेकर अंतरिक्ष तक में इस मशीनी दिमाग़ का इस्तेमाल, इंसान की मदद के लिए किया जा रहा है.
शेयर बाज़ार से लेकर बीमा कंपनियां तक, मशीनी दिमाग़ की मदद से चल रही हैं. एयर ट्रैफिक कंट्रोल के लिए भी इस आर्टिफ़िशियल अक़्ल का इस्तेमाल किया जा रहा है. जैसे जैसे तकनीक तरक़्क़ी कर रही है, वैसे-वैसे स्मार्ट मशीनों का हमारी ज़िंदगी में दखल बढ़ता जा रहा है.
अब जब हमारी ज़िंदगी मशीनों की आदी होती जा रही है, तो किसी स्मार्ट रोबोट के बाग़ी होने से ज़्यादा ख़तरा, मशीनों पर हमारी बढ़ती निर्भरता है.
मशीनों में आंकड़े भरकर उनसे नतीजे निकालने को कहा जाता है. मगर कई बार आंकड़ों का हेर-फेर इन मशीनों को ग़लत नतीजे निकालने की तरफ़ धकेल सकता है. ऐसे में हम स्मार्ट मशीनों की ग़लतियों के शिकार बन सकते हैं.
आज की तारीख़ में मशीनें बीमारियों का पता लगाने से लेकर इंसानों के अपराधी बनने की आदत तक का पता लगा रही हैं. ऐसे में हमें मशीनों से हमेशा सही जवाब की उम्मीद नहीं लगानी चाहिए. उनके दिये जवाबों की दोबारा से पड़ताल करना ज़रूरी है.
अब जब हम मशीनी दिमाग़ को अपने दिमाग़ जैसा ही बना रहे हैं. तो, ये तो तय है कि इसमें ख़ूबियां भी होंगी और खामियां भी. इन दोनों से निपटने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए.
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