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ऑफ़िस में काम का तनाव ऐसे करें दूर
- Author, बीबीसी कैपिटल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
आज की रफ़्तार भरी ज़िंदगी में तनाव बहुत है. उम्मीदों और टारगेट के बीच तालमेल बिठाना होता है. दफ़्तर और घर के बीच सामंजस्य होना चाहिए. पेशेवर ज़िंदगी और निजी चुनौतियों का टकराव अक्सर हम पर हावी होने लगता है.
क्या है इनसे निपटने का तरीक़ा?
यूं तो इसका कोई जादुई नुस्खा नहीं है. मगर जानकार कुछ टिप्स देते हैं जिनसे आप घर और दफ़्तर की उम्मीदों के टकराव को कम कर सकते हैं. बेहतर तालमेल से ज़िंदगी में तनाव कम कर सकते हैं.
बीबीसी ने इस बारे में जब ट्विटर के यूरोप में वाइस प्रेसीडेंट ब्रूस डेस्ली से बात की, तो उन्होंने 6 नुस्खे बताए. ब्रूस ने कहा कि इनको आज़मा कर देखिए, आपकी ज़िंदगी का तनाव काफ़ी कम हो जाएगा.
तो, चलिए आपको भी बता देते हैं ब्रूस डेस्ली के बताए वो 6 नुस्खे जिनसे आप निजी और पेशेवर ज़िंदगी में बेहतर तालमेल बिठाकर तनाव कम कर सकते हैं.
1. ई-मेल को बंद कर दीजिए
बहुत से लोग दफ़्तर के बाहर भी अक्सर अपने ई-मेल चेक करते रहते हैं. तमाम रिसर्च ने ये बात साबित की है कि बार-बार ई-मेल बॉक्स में झांकते रहने से आपका तनाव ही बढ़ता है. उससे हासिल कुछ ख़ास नहीं होता.
ब्रूस कहते हैं कि दफ़्तर से निकलिए तो तय वक़्त के लिए अपना ई-मेल बंद कर दीजिए. छुट्टी के दिन तो ई-मेल से बिल्कुल ही दूरी बना लें. ये आपके तनाव को काफ़ी हद तक कम कर देगा.
2. अपना लंच ज़रूर करिए
दफ़्तर में अक्सर लोग काम के चलते लंच नहीं करते. कुछ लोग डेस्क पर ही लंच को निपटा देते हैं. ब्रूस डेस्ली सलाह देते हैं कि लंच को निपटाइए नहीं. उसका लुत्फ़ लीजिए.
लंच के वक़्त अपनी मेज से दूरी बनाकर कहीं और जाकर बैठिए और खाने का मज़ा लीजिए. लोग करते ये हैं कि अपनी मेज पर बैठे-बैठे ही लंच बॉक्स खोला और खाने को जैसे-तैसे ठूंस लिया. न खाने का स्वाद मिला, न लंच ब्रेक का कोई मतलब हुआ.
लंच को आप तनाव भरे माहौल से ब्रेक का मौक़ा मानिए और हमेशा अपने वर्क स्टेशन से दूर बैठकर ही लंच कीजिए. कैफेटेरिया में या फिर दफ़्तर के पास के किसी रेस्तरां में.
3. भिक्षु बनिए
ब्रूस कहते हैं कि घर और दफ़्तर की भाग-दौड़ और शोर-शराबा ऐसा होता है कि आपको दिमाग़ी सुकून मिल ही नहीं पाता.
इससे बचने के लिए वो सलाह देते हैं कि सुबह के वक़्त किसी ऐसी जगह जाकर बैठिए जहां, न शोर हो, न आपके सुकून में कोई ख़लल पड़े. ऐसी शांत जगह पर जाकर कम से कम डेढ़ घंटे तक वक़्त गुज़ारिए.
ब्रूस कहते हैं कि अगर आप रोज़ ऐसा नहीं कर सकते, तो हफ़्ते में दो-तीन दिन ही सही, मॉन्क मोड यानी भिक्षु बनकर एक शांत जगह पर बैठिए. अपने अंदर चल रहे झंझावात को शांत कीजिए. ये नुस्खा भी आपके तनाव को काफ़ी कम कर देगा.
4. लोगों से बातें करिए
आज ज़्यादातर कंपनियां नए आइडिया की तलाश में रहती हैं. वो चाहती हैं कि दफ़्तर में कामकाजी लोग अपनी क्रिएटिविटी का बेहतरीन मुजाहिरा करें.
अमरीका के मशहूर मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी ने हाल ही में इस बारे में रिसर्च की है. रिसर्च के मुताबिक़, अगर दफ़्तर में लोग एक-दूसरे से ढेर सारी बातें करेंगे, तो इससे उनकी क्रिएटिविटी बढ़ेगी.
एक रिसर्चर ने तो ये भी सलाह दी कि दफ़्तर की कॉफ़ी मशीन या पानी की मशीन को जितनी दूर रखा जाए, उतना ही अच्छा. लोग पानी पीने या कॉफ़ी लेने के लिए वहां जाएंगे. एक-दूसरे से बातें करेंगे. ये उनका दिमाग़ी सुकून भी बढ़ाएगा और क्रिएटिविटी भी.
रिसर्च से ये बात साबित हुई है कि जिस दफ़्तर में लोग एक-दूसरे से ज़्यादा से ज़्यादा बातें करते हैं वहां के लोगों के पास नए आइडिया ज़्यादा आते हैं.
तो, देर किस बात की है...बतियाना शुरू कीजिए आप भी.
5. डिजिटल ब्रेक लीजिए
आज हम दफ़्तर में हैं तो कंप्यूटर में आंखे गड़ाए बैठे हैं. घर आए तो मोबाइल और लैपटॉप पर नज़रें लगी रहती हैं. रह-रहकर मोबाइल पर कोई संदेश या मेल चेक आने का अंदेशा होता है.
ब्रूस कहते हैं कि हफ़्ते में कुछ वक़्त आप डिजिटल ब्रेक ज़रूर लीजिए. मेल से लैपटॉप से, मोबाइल से दूरी बना लीजिए. देर रात तक लैपटॉप पर काम करने की आदत है, तो छुट्टी के दिन कम से कम ऐसा बिल्कुल ही ना करें.
अगर आप छुट्टी के दिन भी मोबाइल और लैपटॉप पर लगे रहते हैं, तो ऑफ़ के बाद भी आप थकान ही महसूस करेंगे. तरोताज़ा होने के लिए ही आपको वीकली ऑफ़ मिलता है. ब्रूस कहते हैं कि उसका भरपूर इस्तेमाल कीजिए. दो दिन के लिए लीजिए डिजिटल ब्रेक
6. 40 घंटे बहुत हैं
आज माहौल ये बन गया है कि जो शख़्स दफ़्तर में ज़्यादा वक़्त बिताता है, वही ज़्यादा काम करता है. कुछ लोग एक बार दफ़्तर आ जाते हैं, तो घर जाने का नाम ही नहीं लेते. उनका ऐसा करना बाक़ी लोगों पर भी, दफ़्तर मे ज़्यादा वक़्त गुज़ारने का दबाव बनाता है.
आप भी अगर इस दुष्चक्र के शिकार हैं तो ब्रूस डेस्ली की सलाह सुनिए. वो कहते हैं कि हफ़्ते में चालीस घंटे काम करना पर्याप्त है.
इससे ज़्यादा काम न होता है, न कोई करता है. दफ़्तर में देर तक रुककर ज़्यादातर लोग ख़ाली माहौल बनाते हैं. उनकी प्रोडक्टिविटी उतनी ही रहती है, जितनी 40 घंटे ईमानदारी से काम करने वालों की.
ब्रूस के मुताबिक़, आप हफ़्ते में 40 घंटे ईमानदारी से दफ़्तर में काम कीजिए. बाक़ी वक़्त ज़िंदगी के दूसरे कामों में लगाएं. इतना पर्याप्त है. इससे ज़्यादा वक़्त देने की ज़रूरत नहीं है दफ़्तर को.
तो, अगर आप भी घर और दफ़्तर के बीच खींचतान की वजह से तनाव के शिकार हैं, तो इन नुस्खों पर अमल करें. यक़ीनन आपको फ़ायदा होगा.
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