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मुहावरे आपकी पहचान हैं
- Author, मार्क पीटर्स
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
किसी भाषा को दमदार तभी कहा जा सकता है जब उसमें हरेक भाव को व्यक्त करने के लिए हर तरह का शब्द मौजूद हो. अगर उसमें बड़ी संख्या में कहावतें, मुहावरें और लोकोक्तियां मौजूद हों तो कहने ही क्या.
कहने को तो मुहावरे और कहावतें चंद शब्दों से मिलकर बनते हैं, लेकिन उनके मतलब बहुत गहरे होते हैं. ऐसा नहीं है कि मुहावरे या कहावतें किसी एक ख़ास ज़बान का ही हिस्सा हों या किसी एक ख़ास देश से उनका ताल्लुक़ हो, बल्कि ये सब जगह बिखरे हुए हैं.
यहां तक कि हरेक इलाक़े की स्थानीय भाषाओं में भी बहुत तरह के मुहावरे बना लिए जाते हैं.
कुछ कहावते हैं तो ऐसी हैं जो हर इलाक़े में मिल जाती हैं. जैसे 'बिना दर्द झेले कभी कुछ हासिल नहीं हो सकता'. या फिर 'अंगूर खट्टे हैं'.
कहावतें ज़िंदगी के हरेक पहलू को छूती हैं. और हर तरह के वक़्त की नज़ाकत को बयान करने के लिए काफ़ी होती हैं. कहावतों को बहुत नामों से जाना जाता है. इसे आप लोकोक्ति कह सकते हैं, मिसाल कह सकते हैं, मुहावरा भी कह सकते हैं.
कहावतों को चंद शब्दों में परिभाषित करना आसान नहीं. ऐसा भी नहीं है कि पुरानी पीढ़ी के लोग ही मुहावरों का इस्तेमाल करते रहे हैं. बल्कि नौजवान नस्ल भी इनका भरपूर इस्तेमाल करते हैं.
अगर कोई अपनी भाषा में मुहावरों का इस्तेमाल करता है तो माना जाता है उस शख़्स को भाषा की अच्छी समझ है. जैसे मान लीजिए, किसी आशिक़ का अपनी माशूक़ा से रिश्ता ख़त्म हुआ है, तो आप उसे ये मिसाल देकर समझा सकते हैं. 'तू नहीं तो और सही और नहीं तो और सही'. यानि अगर एक लड़की से रिश्ता टूट गया तो उसमें इतना परेशान होने की ज़रूरत नहीं है, और बहुत मिल जाएंगी जो तुम्हारा हाथ थाम लेंगी.
कुछ मुहावरे ऐसे भी हैं जिनका बहुत ज़्यादा इस्तेमाल हो चुका है. जैसे ये मुहावरा- 'जो होता है अच्छे के लिए होता है'. या 'हर बात की एक वजह होती है' या 'ईश्वर तुम्हें वही देता है जो तुम संभाल सकते हो'. इस तरह के घिसे-पिटे मुहावरों के इस्तेमाल को कुछ लोग कम अक़्ली की सनद भी मानते हैं.
उनके मुताबिक़ अगर किसी भाषा में नई मिसालें शामिल नहीं की जा रही हैं, तो इससे साफ़ पता चलता है कि लोगों की क्रिएटिविटी में कमी आ रहा है या उसका ठीक इस्तेमाल नहीं हो रहा है.
याल बुक ऑफ़ कोटेशन के सह-संपादक फ्रेड शैपिरो का कहना है कि कारोबारी दुनिया में अलग ही तरह की कहावतें इस्तेमाल की जाती है.
प्रोफ़ेसर शैपिरो का कहना है कि कारोबार की दुनिया में वक्त ही पैसा है. कारोबारी लोगों के पास लंबी बातें सुनने का समय नहीं होता. इसलिए उनकी कोशिश रहती है कि चंद शब्दों में बात पूरी कर ली जाए. कारोबार में मक़सद बड़े होते हैं. आज ज़िंदगी बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रही है. सभी की कोशिश रहती है कम से कम शब्दों में अपनी बात कह दी जाए. इसीलिए ट्विटर का चलन लोगों के बीच खूब बढ़ा है.
शैपिरो का कहना है मुहावरों में भाषा की सादगी होती है, लिहाज़ा उन्हें याद रखना आसान होता है. लेखक जॉन लाथम का कहना है मुहावरे वक़्त के दायरे से परे होते हैं. उनका कोई ख़ास समय नहीं होता. ये इंसानी तजुर्बे की बुनियाद पर बनते हैं.
हरेक मुहावरे और कहावत का जन्म कभी ना कभी कहीं ना कहीं हुआ होता है. लेकिन कब और कहां, ये कह पाना मुश्किल है. किसी भी मुहावरे या कहावत का इतिहास तलाश करना ऐसा ही है जैसे किसी खेत में सुई तलाशना. जिस तरह पुरातत्वविज्ञानियों ने जीवाश्म से इस बात को साबित कर दिया है कि इंसानी वजूद की तारीख़ हमारी सोच से भी पुरानी है. इसी तरह हो सकता है कुछ मुहावरे भी उतने ही पुराने हों. मुहावरे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को विरासत में दिए जाते हैं.
जिस तरह से एक भाषा में समय अनुसार बदलाव होते रहते हैं, उसी तरह मुहावरों में भी वक़्त के मुताबिक़ तब्दीली आती रही है.
अगर किसी लम्हे की हिमायत में कोई मुहावरा है तो उसी लम्हे की मुख़ालफ़त में भी मुहावरा मौजूद है. जैसे एक पुरानी कहावत है. 'एक मर्द के बग़ैर औरत का वजूद ऐसे ही है, जैसे किसी मछली के लिए साइकिल' यानि जिस तरह मछली के लिए साइकिल का कोई उपयोग नहीं है उसी तरह एक औरत के लिए आदमी का वजूद किसी काम का नहीं है. उसके बग़ैर भी औरत का गुज़ारा चल सकता है. ये मिसाल नारीवादी विचारधारा वाली एक लेखिका की है.
1975 में प्रोफेसर शैपीरो को इसी मिसाल के बरअक्स एक मिसाल ऑस्ट्रेलिया के सिडनी मॉर्निग हेराल्ड में देखने को मिली.
मुहावरे और कोटेशन के बीच बहुत बारीक फ़र्क़ है. मुहावरे कब कैसे बने, ये कहना मुश्किल है लेकिन कोटेशन के बारे में इस बात की पुख़्तगी होती है कि ये कब बनीं और किसकी कोटेशन है. मिसाल के लिए अल्बर्ट आइंस्टाइन या अब्राहम लिंकन ने जो बड़ी बड़ी बातें कहीं वो उनके नाम के साथ मंसूब हो गईं.
मुहावरे कोटेशन से ज़्यादा लोकप्रिय इसलिए भी हो पाए क्योंकि ये लोगों को एक दूसरे से जोड़ते हैं. और हमारे पुरखों की समझ से रूबरू कराते हैं. कारोबारी ज़िंदगी में ये समझ सहकर्मियों का हौसला बढ़ाने के काम आती है. अगर मिसाल बहुत सादा हो तो उसका एक नुक़सान ये भी होता है कि लोग सादा तरीक़े से सोचने लगते हैं. किसी मुश्किल आइडिया पर सोचने की आदत ख़त्म हो जाती है.
मगर, जैसा कि एक कहावत है-सितारों के आगे जहां और भी हैं...तो जहां पुरानी कहावत ख़त्म होगी, वहां नया मुहावरा शुरू हो जाएगा.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)
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