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खिलाड़ियों का गढ़ रहा है चंडीगढ़ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चंडीगढ़ के पास बिंद्रा फ़ार्म हाउस पर जीत का जश्न अब भी ख़त्म नहीं हुआ है- उस अभिनव जीत का जश्न जिसकी बदौलत भारत को पहली बार ओलंपिक में किसी व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक नसीब हुआ है. वैस तो अभिनव बिंद्रा की ये जीत किसी व्यक्ति विशेष, या परिवार की नहीं बल्कि पूरे देश की है लेकिन स्वाभाविक है कि जीत की ख़ुशी का नशा उनके गृह शहर चंडीगढ़ में कुछ ज़्यादा ही है. पंजाब और हरियाणा की राजधानी और ‘सिटी ब्यूटीफ़ुल’ कहे जाने वाले शहर चंडीगढ़ का नाम चंडी देवी के नाम पर पड़ा है- चंडी का गढ़, पर साथ ही इसकी पहचान आसानी से खिलाड़ियों के गढ़ के रूप में भी की जा सकती है.
देश का नाम रौशन करने वाले अभिनव बिंद्रा पहले खिलाड़ी नहीं है जिनका नाता इस शहर से रहा हो. चंडीगढ़ की छवि एक सुंदर, सुव्यवस्थित और साफ़ सुथरे शहर के तौर पर होती है. शिवालिक पहाड़ी के तले बसे इस छोटे से शहर के साथ भारत के कई बड़े-बड़े चैंपियन ख़िलाड़ियों का नाम जुड़ा रहा है जिन्होंने अपने-अपने तरीके से खेल को नए आयाम दिए हैं और सबसे बड़ी बात ये कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को पहचान दिलाई है. चैंपियन ही चैंपियन फ़्लाइंग सिख मिल्खा सिंह ने अपने जीवन के शुरुआती दिन तो चंडीगढ़ में नहीं बिताए लेकिन ये शहर उनकी ज़िंदगी का अहम हिस्सा रहा है. मिल्खा सिंह भले ही रोम ओलंपिक में पदक जीतने से चूक गए हों लेकिन भारत को उनका जैसा एथलीट शायद ही अब तक मिला हो. चंडीगढ़ में बरसों से रहने वाले मिल्खा सिंह से बेहतर भला कौन बता सकता है कि इस शहर के मिजाज़ के बारे में. मिल्खा सिंह कहते हैं, "ये बात सही है कि चंडीगढ़ ने अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी भारत को दिए हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है कि ये एक आधुनिक शहर है जहाँ अच्छी सुविधाएँ मौजूद हैं- हमारे पास क्रिकेट मैदान है, गोल्फ़ कोर्स हैं, हॉकी स्टेडियम, बैडमिंटन कोर्ट सब कुछ. अच्छे आधारभूत ढाँचे के कारण खिलाड़ियों को प्रशिक्षण में मदद मिलती है. बढ़िया कोच भी हमारे पास हैं." अपने शहर चंडीगढ़ और घर में मिल्खा सिंह अकेले चैंपियन खिलाड़ी नहीं है- उनके बेटे जीव मिल्खा सिंह गोल्फ़ चैंपियन हैं. गोल्फ़ की दुनिया में भारत का झंडा कम ही लोगों ने बुलंद किया है. शहर के जज़्बे को सलाम करते हुए मिल्खा सिंह कहते हैं, "खेल संस्कृति अभी ज़िंदा है यहाँ. आप देखेंगे कि माँ-बाप बच्चों के साथ स्टेडियम में मैदानों में आते हैं, दिलचस्पी लेते हैं. मैने ख़ुद अपने बेटे को हर मुमकिन मौका दिया." जीव मिल्खा सिंह उन चंद भारतीय गोल्फ़ खिलाड़ियों में से हैं जिन्होंने विश्व रैंकिंग में पहले 50 में जगह बनाई, यूरोपीय टूर में जीतने वाले वे सिर्फ़ दूसरे खिलाड़ी हैं. इसी साल में जून में उन्होंने ऑस्ट्रिया ओपन जीता. ये बात और है कि क्रिकेट के दीवानों वाले भारत देश में जीव मिल्खा सिंह जैसे खिलाड़ियों की बात उतने ज़ोर-शोर से नहीं होती जितनी धोनी या युवराज की होती है. क्रिकेट में भी आगे ख़ैर ज़िक्र क्रिकेट का और युवराज का छिड़ा है तो इसमें भी चंडीगढ़ पीछे नहीं है. आज के युवाओं में से कई के हीरो युवराज सिंह का नाता इसी शहर से है. चंड़ीगढ़ में रहकर क्रिकेट की बारीकियाँ सीखने वाले युवी ने जब ट्वेन्टी- 20 वर्ल्ड कप में छह छक्के जड़े तो वाकई के युवराज बन गए. 1983 में भारत का विश्व कप जीतना कोई छोटी-मोटी विजय नहीं थी, ये एक ऐसी घटना थी जिसने भारतीय क्रिकेट में क्रांति ला दी. इस जीत के सूत्रधारों में से एक बड़ा नाम था टीम के कप्तान कपिल देव का. चंडीगढ़ के क्रिकेट मैदानों पर ही उन्होंने गेंदबाज़ी के गुर सीखे और देश को मिला एक संपूर्ण क्रिकेट खिलाड़ी. वैसे बिना गुरु कोई भी शिष्य अपनी विधा में दक्ष नहीं हो सकता.कपिल ख़ुशकिस्मत थे उन्हें देश प्रेम आज़ाद जैसे कोच मिले. 60 के दशक से ही चंडीगढ़ को अपना बेस बनाने वाले देश प्रेम आज़ाद के हाथों से कपिल देव, योगराज सिंह और चेतन शर्म जैसे खिलाड़ियों ने प्रशिक्षण लिया है. शिष्य कपिल देव ने अपनी उपलब्धियों के बल पर अर्जुन पुरस्कार जीता था तो गुरु को 1986 में द्रोणाचार्या पुरस्कार मिला. कपिल देव और युवराज बनने की आकांक्षा लिए आज भी चंडीगढ़ में देश प्रेम आज़ाद क्रिकेट अकादमी में कितने ही होनहार खिलाड़ी दिन रात मेहनत करते हैं. क्रिकेट स्टेडियम में ही क्यों गोल्फ़, शूटिंग, बैडमिंटन सब विधाओं में ... मन में शायद यही उम्मीद लिए कि एक अभिनव जीत किसी दिन उन्हें भी नसीब होगी और मिल्खा सिंह जैसी हस्तियों की फ़ेहरिस्त में उनका भी नाम शुमार होगा. भावुक मिल्खा सिंह कहते हैं, "मैने ज़िंदगी में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 80 दौड़ों में हिस्सा लिया और उसमें से 77 जीतीं. मेरे हाथों से रोम ओलंपिक में पदक समझो गिर गया था. मेरी तमन्ना थी कि मैं जीते-जी ओलंपिक में किसी व्यक्तिगत स्पर्धा में भारतीय तिरंगा को लहराते हुए देखूँ. आज अभिनव ने मेरी ये इच्छा पूरी कर दी. मैं अपने बेटे के साथ कई देशों में जाता हूँ. भारत का बहुत नाम हो रहा है ..काश यही नाम खेल के क्षेत्र में हो जाए. मैं दुनिया भर में बसे भारतीयों से बस यही कहना चाहता हूँ कि हमारा ये फ़र्ज़ बनता है कि देश की इज़्ज़त को आगे बढ़ाएँ, जिस तिरंगे के लिए इतनी क़ुर्बानियाँ दीं उसकी शान खेलों में भी बनाए रखें." |
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