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मंगलवार, 18 सितंबर, 2007 को 14:41 GMT तक के समाचार
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चलना संभल संभल के...

धोनी
धोनी के पहले ट्वेन्टी 20 टीम का कप्तान बनाया गया था
महेंद्र सिंह धोनी के कप्तान बनने से पहले ही उनके शहर राँची में जश्न शुरू हो गया था. माही वे....के गाने ख़ूब बज रहे हैं.

हो भी क्यों ना.. लंबे समय बाद छोटे शहर के एक लड़के ने भारतीय टीम के कप्तान का प्रतिष्ठित पद हासिल किया है.

लेकिन राँची से कोसों दूर डरबन में ट्वेन्टी 20 विश्व कप के अगले मैच की तैयारी में जुटे धोनी के लिए राह आसान नहीं. ख़ासकर उस स्थिति में जब उनका एसिड टेस्ट ऑस्ट्रेलिया जैसी चैम्पियन टीम के ख़िलाफ़ है.

दरअसल धोनी को भारतीय टीम के अगले कप्तान के रूप में उसी समय से देखा जाने लगा था जब उन्हें वनडे मैचों में उप कप्तान बनाया गया था.

ट्वेन्टी 20 में टीम की कमान सौंपकर बोर्ड ने ये बात और स्पष्ट कर दी कि धोनी में उन्हें भविष्य का कप्तान दिखता है. लेकिन इतनी जल्दी धोनी को भारतीय टीम की कमान मिल जाएगी, ये शायद धोनी ने भी नहीं सोचा होगा.

धोनी भारतीय टीम के विकेटकीपर हैं. बहुत कम मौक़ों पर ही किसी विकेटकीपर को टीम की कमान सौंपी जाती है. वैसे देखा जाए तो विकेट के पीछे से क्रिकेट पर सबसे अच्छी और पारखी नज़र विकेटकीपर की होती है.

इस लिहाज़ से किसी विकेटकीपर को कप्तान बनाना कोई बुरी बात नहीं क्योंकि टीम की रणनीति में बहुत बड़ा हिस्सा होते हैं विकेटकीपर.

जल्दबाज़ी?

धोनी के शहर राँची में जश्न का माहौल है

चलिए इसमें तो कोई बुराई नहीं कि किसी विकेटकीपर को टीम की कमान सौंपी जाए. लेकिन क्या धोनी को बहुत जल्दी भारतीय टीम का कप्तान बना दिया गया है?

क्या धोनी भारत जैसी टीम की कप्तानी का दबाव झेल पाएँगे? क्या धोनी बड़े-बड़े अनुभवी खिलाड़ियों के बीच अपनी बात रख पाएँगे? क्या धोनी लंबे समय से टीम में चल रही गुटबाज़ी को ख़त्म कर पाएँगे? ये सब ऐसे सवाल हैं जो इस ख़ुशी के क्षण में भी डरबन में बैठे धोनी को परेशान कर रहे होंगे.

राहुल द्रविड़ ने जब कप्तानी पद छोड़ी तो सबसे ज़्यादा चर्चा हुई सचिन तेंदुलकर के नाम की. धोनी तो थे ही. युवराज और सौरभ गांगुली का भी नाम चर्चा में था.

मीडिया रिपोर्टों की मानें तो सचिन ने बीसीसीआई के प्रस्ताव को ठुकरा दिया. हालाँकि बीसीसीआई ऐसे किसी प्रस्ताव से इनकार कर रहा है.

लेकिन हो सकता है कि वे टेस्ट मैचों में टीम की कप्तानी संभालने को तैयार हो जाएँ, लेकिन एक ऐसा शख़्स जो कम से कम वनडे मैच खेलने की बात करता हो, उसे वनडे की कप्तानी सौंपना बेमानी ही होता.

बात युवराज की. तो युवराज इसलिए पिछड़े कि उनका प्रदर्शन उतना अच्छा नहीं रह रहा. साथ ही उनके नकचढ़े व्यवहार की भी दुहाई दी जा रही है.

गांगुली थे बेहतर विकल्प?

कई लोग गांगुली को कप्तान बनाने की हिमायत कर रहे थे

लेकिन सौरभ गांगुली पर बात आकर फिर रुक जाती है. एक ऐसा खिलाड़ी, जो कप्तान रहा तो सुर्ख़ियाँ बटोरा, कप्तानी छूटी तो सुर्ख़ियों में छूटी और वापसी भी सुर्ख़ियों वाली.

बोर्ड ने क्या गांगुली के नाम पर विचार किया- सबके मन में ये सवाल ज़रूर उमड़-घुमड़ रहा होगा. लेकिन बोर्ड की राजनीति समझने वालों के लिए इसका जवाब ढूँढ़ना कठिन नहीं.

सीधे और सपाट शब्दों में कहें तो गांगुली सबसे बेहतर विकल्प हो सकते थे. सौरभ गांगुली के कप्तानी में धोनी को भी और सँवरने का मौक़ा मिलता.

जो बोर्ड अभी से उनमें विश्व कप का कप्तान ढूँढ़ रहा है, उसे थोड़ा इंतज़ार तो करना ही चाहिए था. ख़ैर ऐसा हुआ नहीं.

तो आख़िरकार बात आई माही यानी महेंद्र सिंह धोनी की. धोनी अच्छे खिलाड़ी हैं. उनका बल्ला कई बार बोला है...बोला क्या गरजा है.

वे व्यवहार कुशल हैं. मैदान पर उनकी मेहनत दिखती है. लेकिन क्या ये काफ़ी है किसी खिलाड़ी को कप्तान बनाने कै लिए.

चुनौतियाँ

कप्तान के तौर पर धोनी को कई चुनौतियों का सामना करना होगा

धोनी ने अपना पहला वनडे मैच दिसंबर 2004 में खेला था और पहला टेस्ट दिसंबर 2005 में.

यानी सिर्फ़ तीन साल में उन्हें कप्तानी सौंप दी गई है. इन तीन वर्षों में धोनी ने कई देशों का दौरा किया. कई अहम पारियाँ खेली. लेकिन रणनीति के लिहाज़ से टीम में कितना योगदान दिया- इस पर सवाल उठ सकते हैं.

धोनी की एक और मुसीबत टीम में तीन पूर्व कप्तानों का होना भी साबित हो सकती है. राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर और सौरभ गांगुली की उपस्थिति में टीम का कमान संभालना आसान नहीं होगा.

भारतीय टीम में गुटबाज़ी की बात लंबे समय से होती रही है. जानकारों की मानें तो राहुल द्रविड़ के कार्यकाल में ये गुटबाज़ी तेज़ ही हुई है. विश्व कप के दौरान ये गुटबाज़ी मैदान पर भी देखने को मिली थी.

क्या धोनी इससे निपट पाएँगे- ये सवाल भी लाख टके हैं. क्या धोनी इन टॉप खिलाड़ियों के बीच अपनी बात रख पाएँगे- भारतीय टीम को जो लोग क़रीब से जानते हैं, वे भी इस पर संदेह से जवाब देंगे.

सबसे बड़ी बात ये कि धोनी को उस देश का कप्तान बनाया गया है, जहाँ क्रिकेट धर्म है और क्रिकेट की दीवानगी पागलपन के हद तक जाती है.

आज धोनी का राँची भले ही जश्न में डूबा है, विश्व कप में हार के बाद उसी राँची में उनके पुतले फूँके गए थे और घर पर पथराव हुए थे.

भारत का कप्तान होना ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ़्रीका के कप्तान होने से ज़्यादा अहम है. क्योंकि भारत के कप्तान से आशाएँ माउंट एवरेस्ट की तरह होती है..सबसे ऊँची.

धोनी के लिए सबसे सकारात्मक बात हैं- उनका संयत व्यवहार. ट्वेन्टी 20 मैच में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मैच में उनका संयत व्यवहार नज़र आया जो क्रिकेट के दबाव के बीच उनका सबसे धारदार हथियार साबित हो सकता है.

दूसरी अच्छी बात-टीम में धोनी की लोकप्रियता है. लेकिन कप्तान बनने के बाद ये लोकप्रियता क़ायम रहती है या नहीं- इसे देखना होगा. साथ ही धोनी किस तरह इसे बनाए रखते हैं- ये उनकी क्रिकेट की समझ के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक रणनीति पर भी निर्भर करेगा.

चयनकर्ताओं की ओर से जल्दबाज़ी की बात इसलिए हो रही है क्योंकि धोनी में अभी बहुत क्रिकेट बाक़ी है. धोनी से उम्मीदें भी बहुत हैं. अभी वे सिर्फ़ 26 साल के हैं.

डर यही है कि अगर धोनी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे, तो कहीं समय से पहले ही इस सितारे का सूरज अस्त ना हो जाए. इसलिए भारत के भविष्य धोनी का वर्तमान मुझे डरा रहा है.

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