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शुक्रवार, 23 मार्च, 2007 को 10:15 GMT तक के समाचार
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स्क्वॉश में बेहतर प्रदर्शन करते ग़रीब बच्चे

खिलाड़ी
स्क्वॉश खेलने वालों में गुजरात के दंगा पीड़ित बच्चे भी हैं
स्क्वॉश वैसे तो अमीरों का खेल माना जाता है लेकिन जब कुछ ग़रीब बच्चों को स्क्वॉश खेलने का मौका मिला तो वो राष्ट्रीय रैंकिग में स्थान बनाने में सफल रहे.

ऐसे ही एक किशोर हैं कुश जिनके मां-बाप मेहनत मज़दूरी करते हैं लेकिन कुश को मौका मिला तो वो स्कवॉश में अंडर 11 में नंबर वन हैं.

जी हां, 11 वर्ष के कम उम्र वर्ग में नंबर वन खिलाड़ी.

इन बच्चों में से एक के पिता सिलाई का काम करते हैं. वो कहते हैं, "पढ़ने का मौका मिला है. हम तो सिलाई कर के गुज़ारा करते थे. तीन हज़ार रुपए मिलते थे."

इसी तरह दीपक 13 वर्ष से कम उम्र के वर्ग में तीसरे नंबर पर हैं. इन दोनों का सपना है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने का.

कुश और दीपक जैसे क़रीब दस ग़रीब बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ-साथ स्क्वॉश की ट्रेनिंग दे रही है दिल्ली की एक संस्था- हमदर्द एजुकेशन सोसायटी.

सराहनीय प्रयास

सोसायटी के निदेशक समर हमीद कहते हैं, "दो बच्चे नेशनल लेवल के हैं. दीपक धामपुर का है जहाँ उसके पिता चीनी मिल में मज़दूरी करते हैं. हम चाहते हैं कि ग़रीब बच्चों के सपने भी पूरे हो सकें."

 पढ़ने का मौका मिला है. हम तो सिलाई कर के गुज़ारा करते थे. तीन हज़ार रुपए मिलते थे
एक बच्चे के परिजन

हाल ही में ऑल इंडिया जूनियर स्क्वॉश चैंपियनशिप में दीपक सेमीफाइनल में पहुंचे. वो कहते हैं, "अच्छा लगता है. सपने पूरे हो रहे हैं. मैं चाहता हूं कि बड़ा होकर और अच्छा प्लेयर बन सकूं."

इन बच्चों की पढ़ाई और ट्रेनिंग का आर्थिक ज़िम्मा उठाया है उद्योगपति और दिल्ली स्क्वॉश एसोसिएशन के सचिव विजय गोयल ने.

वो कहते हैं, "अमीर बच्चों को सब मिलता है. क्या ग़रीबों के सपने नहीं होते. मैंने यही सोचा कि अगर इनके सपनों को पूरा करने के लिए कुछ किया जाए तो अच्छा होगा."

दर्द की दवा

ऐसी ही ट्रेनिंग कुछ बच्चियों को भी दी जा रही है और इनमें से कुछ तो वो हैं जिनके मां-बाप गुजरात के दंगों की भेंट चढ़ गए.

 पापा जेल में हैं, दंगें के दौरान पापा बाहर निकले और पुलिस पकड़ कर ले गई ...तबसे वो जेल में हैं....मैं उन्हें इंसाफ़ दिलाना चाहती हूँ
एक दंगापीड़ित लड़की

नीलोफ़र, फ़रहीन ऐसे ही कुछ नाम हैं जो स्क्वॉश में आगे बढ़ना चाहती हैं.

फ़रहीन से बात करना मुश्किल है. कुछ पूछते ही वो रोने लगती हैं. कहती हैं, "पापा जेल में हैं, दंगें के दौरान पापा बाहर निकले और पुलिस पकड़ कर ले गई ...तबसे वो जेल में हैं....मैं उन्हें इंसाफ़ दिलाना चाहती हूँ."

फ़रहीन वकील बनना चाहती हैं ताकि अपने पिता को इंसाफ़ दिला सके.

ट्रेनिंग के दौरान खेलने से उनका बीती बातों से ध्यान बंटता है और ट्रेनिंग देने वाले ये उम्मीद करते हैं कि दंगों के घाव भी इसी तरह भर सकेंगे.

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