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'महिला क्रिकेट उपेक्षा का शिकार' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली राज का मानना है कि भारत में महिला क्रिकेट उपेक्षा का शिकार है. विश्वकप में उपविजेता होने के बाद भी देश के एक बड़े वर्ग को अब भी नहीं पता कि भारत में महिला क्रिकेट टीम भी है. 23 वर्षीय मिताली राज 10 साल की उम्र से क्रिकेट खेल रही हैं. 2003 और 2005 की रैंकिंग में वे महिला क्रिकेट में पहले नंबर पर हैं. इंग्लैंड के विरुद्ध 214 रनों का विश्व रिकार्ड भी उनके नाम है लेकिन देश में महिला क्रिकेट की हालत के कारण मिताली हताश हैं. उन्माद की हद तक लोकप्रिय क्रिकेट के कम ही प्रशंसकों को यह पता होगा कि क्रिकेट का पहला विश्व कप पुरुषों का नहीं, महिला क्रिकेट टीमों के बीच हुआ था. पुरुषों का पहला विश्व कप 1975 में इंग्लैंड में हुआ था और उससे 2 साल पहले 1973 में ही महिलाओं ने विश्व कप खेल कर बाजी मार ली थी. लेकिन इतना सब होने के बाद भी महिला क्रिकेट लोकप्रिय क्यों नहीं हो पाया? इसका जवाब भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली तल्ख़ी के साथ देती हैं- “ पुरुष मानसिकता के कारण!” प्रचार मिताली का कहना है कि पुरुष क्रिकेटरों का विश्व कप होता है तो सब तरफ़ केवल क्रिकेट छाया रहता है लेकिन महिला क्रिकेटरों का विश्व कप कब हुआ, इसका किसी को पता तक नहीं चला. अधिकांश लोग अब भी यह बात हजम नहीं कर पाते क्रिकेट का खेल महिलाओं के लिए भी है. उनका कहना है कि भारत में तो महिला क्रिकेट का और भी बुरा हाल है मिताली ने कहा, "विश्व कप में दूसरे नंबर पर रहने के बाद भी हमें एक दिवसीय मैचों के लिए एक हज़ार रुपए और टेस्ट मैचों के लिए दो हज़ार रुपए मिलते हैं. पुरुष क्रिकेटरों को क्या-क्या मिलता है, इसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते." 17 साल की उम्र से भारतीय महिला क्रिकेट टीम का प्रतिनिधित्व करने वाली मिताली राज ने आयरलैंड के ख़िलाफ़ अपने पहले ही मैच में 114 रन बना कर टीम में अपना स्थान सुनिश्चित कर लिया था. बाद में इंग्लैंड के विरुद्ध खेले गए टेस्ट मैच में मिताली ने शानदार 214 रन बना कर एक नया विश्व कीर्तिमान भी स्थापित किया. महिला विश्व क्रिकेट में मारे गए कुल जमा 5 दोहरे शतकों में मिताली का नाम भी शुमार किया जाने लगा. पूर्णिमा राय, अंजू जैन और अंजूम चोपड़ा जैसी चोटी की महिला क्रिकेटरों के अनुभव का लाभ मिताली को मिला, लेकिन देश में महिला क्रिकेट को लेकर जो उदासीनता है, उसके कारण उनके हौसले बुलंद होने के बजाय, कहीं-कहीं कमज़ोर जान पड़ते हैं. सुविधाएँ वे कहती हैं कि इंग्लैंड, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण अफ़्रीका और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में पुरुष और महिलाओं का एक ही क्रिकेट बोर्ड है और एक हद तक उन्हें समान सुविधाएं भी दी जाती हैं. लेकिन आज तक भारतीय महिला क्रिकेट टीम को बीसीसीआई से मान्यता भी नहीं मिली है. बीसीसीआई से मान्यता मिल गयी होती तो हमें स्पांसर मिलते, ज़्यादा मैच मिलते और महिला क्रिकेटरों के हौसले बुलंद होते.
मिताली का कहना है कि आज आर्थिक रुप से कमज़ोर होने के कारण विदेशी दौरे को लेकर हमें दस बार सोचना पड़ता है. विदेशी दौरे के अवसर मिलते तो हमारे प्रदर्शन में सुधार आता. भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान का मानना है कि मीडिया में भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जिसके लिए महिला क्रिकेट का कोई महत्व ही नहीं है. वे कहती हैं- “भारत जब विश्व कप के फाइनल में पहुंचा तो लाइव टेलीकास्ट की बात तो छोड़ दें, रिकॉर्डिंग या मुख्य अंश भी भारतीय चैनलों पर नहीं दिखाया गया. ” विश्व कप में फाइनल तक पहुंचने के बाद उपविजेता के पदक से संतोष करने वाली मिताली का कहना है कि आज की तारीख़ में हमारे पास हेमलता काला, अंजुम चोपड़ा, रुमेली धर और नीतु डेविड जैसी अनुभवी खिलाड़ी हैं. और अभी हमारा पूरा ध्यान आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और न्यूजीलैंड के साथ होने वाली घरेलू श्रृंखलाओं पर है लेकिन मान कर चलें कि आने वाला विश्व कप हमारा होगा. |
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