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अंपायरिंग के ख़िलाफ़ अपील पर विचार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानी आईसीसी ऐसे प्रस्ताव पर विचार कर रही है जिसके तहत टीमों को अंपायरों के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करने की अनुमति होगी. इस प्रस्ताव के तहत हर पारी में टीम का कप्तान अंपायर के तीन फ़ैसलों के ख़िलाफ़ टीवी अंपायर से अपील कर सकेगा. हालाँकि अगले साल आईसीसी की क्रिकेट कमेटी की बैठक से पहले इस पर शायद ही पूरी तरह विचार हो पाए. अगर इस प्रस्ताव को हरी झंडी मिल गई तो पहले इसे एक दिवसीय मैचों में आज़माया जाएगा. अमरीका में नेशनल फ़ुटबॉल लीग में इसी तरह की व्यवस्था लागू है. इसके तहत टीमों को हरेक हाफ़ में रेफ़री के दो फ़ैसलों को चुनौती देने का अधिकार है. टीमों की चुनौती के बाद टीवी रिप्ले की मदद से इस पर निर्णय होता है. प्रयोग आईसीसी ने अंपायरों के फ़ैसले सटीक और सही हों, इसके लिए हाल के वर्षों में कई प्रयोग किए हैं.
शोध के अनुसार मैदान पर अंपायरों का फ़ैसला 92 फ़ीसदी सही होता है लेकिन आईसीसी का मानना है कि वह इसमें सुधार कर इसे 94 फ़ीसदी के स्तर तक ले जाना चाहता है. हाल ही में आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफ़ी के दौरान अंपायरों को स्टंप माइक्रोफ़ोन से जोड़ दिया गया था. एक ईयरपीस के ज़रिए वे स्टंप माइक्रोफ़ोन से आवाज़ आसानी से सुन सकते थे. पहली बार इसे दक्षिण अफ़्रीका के घरेलू क्रिकेट में आज़माया गया था. आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफ़ी के दौरान टीवी अंपायरों को नो बॉल पर भी फ़ैसला देने का अधिकार दिया गया था. हालाँकि कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि तकनीक के ज़्यादा इस्तेमाल से मैदान पर अंपायरों की भूमिका कम ही होगी. इस साल आईसीसी के अंपायर ऑफ़ द ईयर पुरस्कार से सम्मानित न्यूज़ीलैंड के साइमन टॉफ़ल ने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा था कि वे तकनीक के ख़िलाफ़ नहीं हैं लेकिन वे इसे लेकर सतर्क ज़रूर हैं. |
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