|
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सचिन तेंदुलकर ने दिए टिप्स: आकाश चोपड़ा
लंबे समय से भारतीय क्रिकेट टीम की समस्या रही है सलामी बल्लेबाज़. ख़ासकर टेस्ट टीम में तो न जाने कितने खिलाड़ी इस भूमिका में आज़माए गए. लेकिन अभी तक क्रिकेट बोर्ड की तलाश पूरी नहीं हुई है. न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ हाल ही में ख़त्म हुई टेस्ट सिरीज़ में दिल्ली के आकाश चोपड़ा को वीरेंदर सहवाग के साथ उतारा गया और आकाश चोपड़ा ने अभी तक अपने प्रदर्शन से तो यही उम्मीद जगाई है कि शायद बोर्ड की इस तलाश को आख़िरकार विराम लग ही जाएगा. अतुल प्रभाकर ने आकाश चोपड़ा से ख़ास बातचीत में क्रिकेट के साथ-साथ उनके जीवन के हरेक पहलुओं को छूने की कोशिश की. आइए इसे जानें ख़ुद आकाश चोपड़ा की ज़ुबानी. बचपन-मेरा बचपन दिल्ली में बीता. जब सात साल का था. तभी अंडर 15 की टीम में ट्रायल के लिए लिया गया. ट्रायल में तारक सिन्हा साहब सबसे एक कैच करवा कर देख रहे थे. जब मेरी बारी आई, तो उन्होंने आसमान की ओर गेंद उछाल दी और सच मानिए मेरे लिए वो कैच भी आसमानी ही था. ख़ैर मैंने कैच तो कर लिया, लेकिन तारक साहब को प्रभावित नहीं कर पाया. उन्होंने समझा मैंने तुक्के में ही गेंद पकड़ ली. तो भई, मुझे दोबारा कैच करने को कहा गया और फिर गेंद मेरे हाथों में आकर चिपक गई. तो इस तरह मेरा और उनका रिश्ता शुरू हुआ और आज भी वे ही मेरे कोच हैं. क्रिकेटर न होता, तो क्या होता. कहना जरा मुश्किल है. लेकिन शायद ऐसा होता, तो मैं डॉक्टर होता, क्योंकि पढ़ाई में हमेशा से मैं अच्छा रहा हूँ.
क्रिकेट- बल्लेबाज़ी मेरी प्राथमिकता रही है और टीम में मेरी भूमिका बल्लेबाज़ के रूप में ही है. पिछले छह साल से प्रथम श्रेणी क्रिकेट में हूँ. लेकिन अभी भी सीख रहा हूँ, क्योंकि क्रिकेट सीखने के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं. पिछले दो-तीन सालों से टेस्ट टीम में आने के लिए दस्तक दे रहा था. सचिन तेंदुलकर, माइक अथर्टन, रमन लांबा मेरे आदर्श रहे हैं. अब ऑस्ट्रेलिया दौरे को ध्यान में रखकर तैयारी कर रहा हूँ. ऑस्ट्रेलियाई टीम को उनके देश में हराना एक चुनौती है. डर तो सिर्फ़ वेस्टइंडीज़ के तेज़ गेंदबाज़ मैल्कम मार्शल से लगता था. ख़ैर वे तो अब हैं नहीं. आजकल का कोई गेंदबाज़ मुझे डरा नहीं सकता. पहला टेस्ट मैच- मैच से पहली रात कुछ नर्वस था. लेकिन नींद ठीक से आ गई थी. सचिन ने भी बढ़ावा दिया और काफ़ी टिप्स भी मिले. फिर भी पहला टेस्ट खेलने का अपना दबाव तो होता ही है. जब पहली ही गेंद पर रन बनाने में सफल रहा, तो दबाव कुछ कम हुआ. धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य सा हो गया. हाँ, इस बात का ज़रूर मलाल रहा कि पहली पारी में शतक नहीं बना पाया. टीम के सभी सदस्यों का मेरे प्रति व्यवहार अच्छा था और उन्होंने इस बात की कमी महसूस नहीं होने दी कि मैं टीम में नया हूँ.
पिच पर डराना धमकाना- ये तो क्रिकेट में चलता है. घरेलू क्रिकेट में भी होता है. दूसरे टेस्ट के आख़िरी दिन न्यूज़ीलैंड के खिलाड़ी हर तरह से दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन मैं मानता हूँ कि इसे नज़रअंदाज़ करना चाहिए. निजी ज़िंदगी- मैं आगरा में पैदा हुआ. माता-पिता की इकलौती संतान हूँ. शांत स्वभाव का हूँ. हर तरह का संगीत और माँ के हाथ का बना खाना बेहद पसंद है. ख़ास तौर पर अरबी की सब्जी और सफेद चने. ख़ुद कुछ भी नहीं बना सकता ऑमलेट भी नहीं. लेकिन चाय तो ज़रूर बना सकता हूँ. हिंदी, अंग्रेज़ी के अलावा थोड़ी बहुत पंजाबी भी बोल लेता हूँ. मेरे पिता मेरे सबसे क़रीबी दोस्त है. मेरे माता-पिता को इसका पूरा भरोसा था कि मैं एक दिन टेस्ट टीम में शामिल हो जाऊँगा. बचपन से ही अर्जुन द्वारा चिड़िया की एक आँख पर निशाना लगाने वाली कहानी प्रेरणा देती रही. विश्वास- भगवान में मेरा अटूट विश्वास है. हर दिन नियम से माँ झंडेवाली की पूजा करता हूँ. चोट के बाद जिस तरह से मैं भारतीय टीम में चुना गया और जैसे घटनाक्रम रहे, ऐसा केवल भगवान ही कर सकता है. नियम से प्रतिदिन आठ घंटे क्रिकेट को देता हूँ. लंबे समय तक भारतीय टीम में बने रहना मेरा लक्ष्य है, क्योंकि टीम में पहुँचने से ज़्यादा मुश्किल टीम में बने रहना है. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||