
वीवीएस लक्ष्मण ने हाल ही में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लिया है
जब वीवीएस लक्ष्मण ने पिछले हफ्ते अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहा तो अखबार के पन्ने उनकी बल्लेबाज़ी की तारीफ़ से रंग गए.
सभी उनकी कलात्मक बल्लेबाज़ी की शान में कसीदे पढ़े. दरअसल बल्लेबाज़ी में कलाइयों के इस्तेमाल में लक्ष्मण बेजोड़ माने जाते थे.
हैदराबाद जितना अपनी बिरयानी के लिए मशहूर है, उतना ही कलात्मक बल्लेबाज़ पैदा करने के लिए भी जाना जाता है.
एमएल जयसिम्हा, मोहम्मद अज़हरूद्दीन और वीवीएस लक्ष्मण जिस तरह कलाइयो के इस्तेमाल से गेंद को किसी भी दिशा में मोड़ सकते थे उसका कोई सानी नहीं थी.
कलाइयों के बेहतरीन उपयोग करने वाले भारतीय बल्लेबाज़ों में विजय हज़ारे से विराट कोहली तक और सुनील गावस्कर- गुंडप्पा विश्वानाथ से तेंदुलकर-द्रविड़ तक शामिल हैं.
लेकिन क्या कलाइयों का खेलों में सफल उपयोग सिर्फ क्रिकेट खिलाड़ी ही कर रहे हैं?
कलात्मक हाथ

भारतीय बल्लेबाज़ कलात्मक बल्लेबाज़ी के लिए जाने जाते रहे हैं.
अगर विश्व स्तर पर सफल भारतीय खिलाड़ियों पर नज़र डालें तो पाएंगे की खेल का एक अंदाज़ सभी में था - कलाइयों का लाजवाब इस्तेमाल.
प्रकाश पादुकोण सही मायने में विश्व चैंपियन थे जिन्होंने बैडमिंटटन की सबसे मुश्किल माने जाने वाली ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन चैंपियनशिप जीती थी.
अस्सी के दशक में बैडमिंटन के खेल में बहुत कड़ी प्रतिस्पर्धा थी. रूडी हार्तानो, हान जियान, सुगियार्तो और मौर्टेन फ्रोस्ट जैसे खिलाड़ी प्रतिभा के धनी थे और आसानी से हार नहीं मानते थे.
फ्रोस्ट पादुकोण के अच्छे दोस्त और कड़े प्रतिद्वंदी थे. प्रकाश पादुकोण की जीवनी 'टच प्ले' की प्रस्तावना में उन्होंने लिखा, "जब मैं खेल रहा था उस वक्त चीन और इंडोनेशिया के खिलाड़ी बिजली के समान तेज़ी और ताकत के साथ खेलते थे. मुझे उन्हें हराने का कोई तरीक़ ढूंढना था."
प्रकाश ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होंने वो रास्ता खोज लिया था.
वो कलाइयों का बेहतरीन इस्तेमाल और जवाबी हमलों के साथ बड़े-बड़े खिलाड़ियों को छका रहे थे.
यही वो कलाइयों की कलात्मकता थी जिसे भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ियों ने 'अपना' कहा.
अपर्णा पोपट ने पिछले साल एक ब्लॉग में लिखा कि हर चैंपियन खिलाड़ी का एक अंदाज़ होता है जिसे बाद में युवा खिलाड़ी भी अपनाना चाहते हैं.
कलाइयों के इस्तेमाल में प्रकाश से सीखते हुए गोपीचंद, और साइना नेहवाल ने भी वो अंदाज़ अपनाया.
नफ़ासत
बैंडमिंटन के अलावा टेनिस में भी भारतीय खिलाड़ियों को 'अच्छे हाथों' से मदद मिली है.

बैडमिंटन में प्रकाश पादुकोण के कलाइयों के उपयोग से दूसरे भारतीय खिलाड़ियों ने बी सीखा.
रामानाथन कृष्णण को भारत के सबसे सफल टेनिस खिलाड़ियों में एक कहा जा सकता है - उन्होंने दो बार विंबलडन के सेमीफाइनल में जगह बनाई थी.
उन्हें भी टच आर्टिस्ट के नाम से जाना जाता था.
उनके बाद उनके बेटे रमेश कृष्णण और लिएंडर पेस भी लचीले हाथों की मदद से अच्छा प्रदर्शन किया.
इन सभी खेलों के बीच हम हॉकी को कैसे भूल सकते हैं.
भारत ने ओलंपिक में आठ स्वर्ण जीते. हॉकी की स्टिक पर भारतीय खिलाड़ियों की जादूगरी के बारे में और क्या कहा जा सकता है.
आज बेशक भारतीय हॉकी निचले स्तर पर है लेकिन अभी भी अंतरराष्ट्टरीय कोच भारतीय खिलाड़ियों के हाथों की कलात्मकता की तारीफ करते हैं.
33 साल की लीज़ा स्थालेकर ऑस्ट्रेलिया की महिला क्रिकेट टीम में एक दशक से ज्यादा समय से खेल रही हैं.
वो ऑस्ट्रेलिया की पहली महिला खिलाड़ी हैं जिन्होंनें टेस्ट में 1000 रन बनाए और 100 विकेट लिए. उनके पिता भारतीय मूल के हैं और हाल ही में उन्होंने एक इंटर्व्यू में कहा कि उनकी सफल बल्लेबाजी का राज़ 'भारतीय हाथ' होना है.
लंदन ओलंपिक में जब साइना नेहवाल ने नेट पर बेहतरीन ड्रॉप शॉट लगाए और कांस्य जीता तो एक बार फिर भारतीय खिलाड़ियों के 'हाथों की करामात' सामने आई .









