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डीन जोन्स की एक ग़लती जिसे वो आख़िरी सांस तक ठीक करने में जुटे रहे
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
डीन जोन्स अपने जीवन के आख़िरी पल तक क्रिकेट से जुड़े रहे. मुंबई में कार्डियक अरेस्ट के चलते मौत होने से पहले तक वे इंडियन प्रीमियर लीग को कवर कर रही टीम का हिस्सा रहे.
आज के युवाओं के लिए डीन जोन्स भले ही आईपीएल प्रेज़ेंटर या न्यूज़ चैनलों पर एक्सपर्ट रहे हों लेकिन क्रिकेट के दीवानों को मालूम है कि डीन जोन्स अपने दौर के बेहद स्टाइलिश बल्लेबाज़ रहे, इतना ही नहीं उन्हें उस दौर में वनडे क्रिकेट का सबसे बेहतरीन बल्लेबाज़ आंका जाता रहा.
उनके क्रिकेट से जुड़ी क़ाबिलियत पर बात करें, उससे पहले उनके व्यक्तित्व के उस पहलू की बात, जिसके कारण वो सुर्ख़ियां बनाते रहे.
अपनी मौत से कुछ ही घंटे पहले वे उस शख़्स को ट्विटर पर जवाब दे रहे थे जिन्होंने उनकी कमेंट्री की आलोचना करते हुए लिखा था, "डीन जोन्स सबसे ज़्यादा परेशान करने वाले क्रिकेट कमेंटेटर हैं. वे ऐसे ही शख़्स भी होंगे, ऐसा दिख रहा है. स्टार स्पोर्ट्स इंडिया को उन्हें तत्काल हटा देना चाहिए नहीं तो आईपीएल 2020 म्यूट पर ही देखना पड़ेगा."
डीन जोन्स ने इस शख़्स को ट्वीट कर ही जवाब दिया, "आप देख रहे हैं, जानकर ख़ुशी हुई...आप म्यूट बटन दबाइए.'' हालांकि बाद में यूज़र ने वह ट्विट हटा लिया.
अपने इसी अंदाज़ और युवाओं से इंटरएक्टिव होने के चलते डीन जोन्स ट्विटर पर सबसे लोकप्रिय क्रिकेटरों में से एक रहे. ट्विटर पर उनके तीन लाख 60 हज़ार के क़रीब फ़ॉलोअर हैं. उनके इस ट्वीट पर जोन्स के ढेरों प्रशंसक उनकी कमेंट्री की तारीफ़ करते नज़र आए. लेकिन इन सबमें शायद ही किसी को अंदाज़ा होगा कि अगले आईपीएल मैच के दौरान टीवी स्टूडियो में बने डग आउट में करतब दिखाते डीन जोंस नहीं होंगे.
परफ़ेक्शन की चाहत
डीन जोन्स उन लोगों में शामिल रहे हैं जिन्होंने क्रिकेट को टीवी पर तमाशाई अंदाज़ में पेश करने के बाज़ार और उसकी ज़रूरत को बहुत पहले समझ लिया था. एनडीटीवी में मैंने देखा था कि टीवी पर अपने हर शो के लिए डीन जोन्स बड़ी मेहनत करते थे. वे भारत के हर शहर और हर स्थानीय खिलाड़ी के बारे में पूरा होम वर्क करते. क्रिकेट पर जानकारी तो थी लेकिन वे हर बात को जिस पैशन से कहते थे वो उन्हें औरों से अलग बनाता था.
इन सबके साथ अपने कपड़ों और अपने प्रेज़ेंटेशन में वे हर दिन कुछ नया प्रयोग करने की कोशिश करते. कई बार तो बेहतर करने की कोशिश में रीटेक पर रीटेक भी देते थे. एनडीटीवी पर उनका शो प्रोफ़ेसर डीनो इतना मशहूर रहा है कि ट्विटर पर उन्होंने अपना हैंडल ही प्रोफ़ेसर डीनो रख लिया था.
इतना ही नहीं कभी कभी तो वे मार्निंग स्पोर्ट्स शो के लिए एंकर से भी पहले ऑफ़िस पहुँच जाते थे. और उस समय का इस्तेमाल क्रिकेट से जुड़े क़िस्सों के लिए ख़ूब करते. वे बैट बनाने वाली एक ऑस्ट्रेलियन कंपनी के ब्रैंड एंबेसडर भी थे तो लिहाज़ा जो कोई उनसे क्रिकेट की ठीक ठाक बात कर लेता उसके लिए अगले दिन वे एक बैट के साथ हाज़िर होते और गिफ़्ट के तौर पर थमा देते.
एक इंसान के तौर पर वे कितने ग्राउंडेड थे, इसको दर्शाने वाला एक वीडियो भी सोशल मीडिया में ख़ूब देखा जा रहा है, जिसमें वे स्टेडियम के बाहर बिखरा कचरा उठाकर ख़ुद ही डस्टबिन में डाल रहे हैं.
कहते हैं कि आदमी ठोकर खाकर सीखता है, क्रिकेट कमेंट्री में डीन जोन्स वो ठोकर खा चुके थे. 2006 में टेन स्पोर्ट्स पर कमेंट्री करते हुए डीन जोंस ने लाइव मैच में हाशिम अमला की दाढ़ी के चलते उन्हें 'द टेररिस्ट' कह दिया था जिसके बाद टेन स्पोर्ट्स ने उनका अनुबंध तत्काल रद्द कर दिया था. मैच के चौथे दिन कुमार संगाकारा का कैच अमला ने लपका था. जोन्स ने कहा था, "द टेररिस्ट हैज़ गॉट अनदर विकेट."
जोन्स को अपनी इस ग़लती का ख़मियाज़ा भुगतना पड़ा और उनके पास सालों साल तक कमेंट्री का कोई काम नहीं रहा. वैसे तकनीकी पहलू यह भी है कि उन्हें लगा था कि उस वक़्त टीवी पर एड-ब्रेक चल रहा होगा, जो श्रीलंका में चल भी रहा था लेकिन उसी प्रसारण में दक्षिण अफ्रीका में कोई एड ब्रेक नहीं था जिसके चलते हंगामा मच गया था. डीन जोन्स ने माफ़ी ज़रूर माँगी थी लेकिन ब्रॉडकॉस्टर के तौर पर उन पर ऐसा दाग़ लग चुका था जो शायद कभी नहीं मिटने वाला था.
ये दूसरी बात है कि डीन जोन्स ने अपनी ओर से उस वाक़ये को भूलकर आगे बढ़ने की कोशिश जारी रखी. इसलिए भारतीय समाचार चैनलों में एक्सपर्ट के तौर पर जुड़ गए, ऑस्ट्रेलियाई अख़बारों में वे पहले से ही कॉलम लिख रहे थे.
दरअसल डीन जोन्स उस मिट्टी के बने थे जिसने हार मानना सीखा ही नहीं था. अस्सी के दशक में अपनी बल्लेबाज़ी से वे उस ऑस्ट्रेलियाई टीम का हिस्सा थे जो धीरे-धीरे खेल के हर मैदान में वेस्टइंडीज़ की बादशाहत को पछाड़ने में जुटी थी. वे अपने दौर के बेहद स्टाइलिश क्रिकेटर तो थे ही साथ ही उनमें आख़िरी दम तक संघर्ष करने का दमख़म भी मौजूद था.
क्रिकेटर के तौर पर शुरुआत
24 मार्च, 1961 में विक्टोरिया में जन्में डीन जोन्स को महज़ 23 साल की उम्र में ही ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम में जगह मिल गई थी, उस दौर में जब 23 साल की उम्र में ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम में जगह बनाना बड़े मार्के की बात थी.
1984 में वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ सिरीज़ के दूसरे पोर्ट ऑफ़ स्पेन टेस्ट में उतरने वाली टीम के अंतिम प्लेइंग इलेवन में जोन्स शामिल नहीं थे और बीमार भी थे. लेकिन एक दूसरे क्रिकेटर के ज़्यादा बीमार होने पर उन्हें आख़िरी पल में टीम में शामिल किया गया और पहली पारी में उन्होंने 48 रन बनाए, इसे डीन जोन्स अपने करियर की सबसे अहम पारी मानते रहे.
डीन जोन्स नंबर सात बल्लेबाज़ के तौर पर खेलने उतरे थे तब तक जोएल गारनर, मैल्कम मार्शल और वेन डेनियल के सामने ऑस्ट्रेलिया की पाँच विकेट महज़ 85 रन पर गिर चुकी थी. लेकिन जोन्स क़रीब तीन घंटे तक विकेट पर टिक गए और एलन बॉर्डर के साथ 100 रनों की साझेदारी की.
लेकिन उनकी जिस पारी को दुनिया किसी भी ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर की सबसे शानदार पारी मानती है वो उन्होंने अपने करियर के तीसरे ही टेस्ट में चेन्नई में खेली थी. टेस्ट इतिहास के महज़ दूसरे टाई टेस्ट मैच में 1986 में चेन्नई की गर्मी और नमी से वो ख़ुद को असहज पा रहे थे. कई जगहों पर इसका ज़िक्र है कि जब उन्हें बल्लेबाज़ी करने में मुश्किल हो रही थी तो कप्तान एलन बॉर्डर ने उनसे कह दिया था कि "अगर नहीं हो पा रहा है तो आउट हो कर वापस जाओ, किसी रियल ऑस्ट्रेलियाई को आने दो, क्वींसलैंडर को आने दो."
बॉर्डर ख़ुद क्वींसलैंड के थे और जोन्स विक्टोरिया के. जोन्स अगर आउट होते तो आने वाले ग्रेग रिची क्वींसलैंड के थे. बॉर्डर के उलाहने को जोन्स ने दिल पर ले लिया और आठ घंटे 22 मिनट तक विकेट पर टिक कर उन्होंने 210 रनों की पारी खेल दी. इस दौरान मैदान पर उनकी हालत इतनी बिगड़ी कि उन्हें पारी के बाद सीधे अस्पताल में भर्ती कराया गया था. इसके बाद जोंस ने पीछे मुड़कर नहीं देखा.
लोगों को चौंकाते रहे डीन जोन्स
1987 में टीम को वर्ल्ड चैंपियन बनाने में उनका अहम योगदान रहा. वे उन चुनिंदा ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ों में रहे जो तेज़ गेंदबाज़ों की तरह ही स्पिन गेंदबाज़ी पर भी रन बटोरने की कला जानते थे. उस ज़माने में जब वनडे क्रिकेट भी धीमी रफ़्तार में आगे बढ़ा करता था तब डीन जोन्स का स्ट्राइक रेट 72 से ज़्यादा का रहा. उस दौर के ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर मोटे तगड़े होते थे तब डीन जोन्स एक फ़ील्डर के तौर पर बाज़ की तेज़ी से गेंद पर झपटते थे.
52 टेस्ट मैचों में 3,631 रन और 164 वनडे मैचों में छह हज़ार से ज़्यादा रनों से डीन जोन्स अपने ज़माने में कितने ख़तरनाक बल्लेबाज़ थे इसका अंदाज़ा नहीं होता है. लेकिन जिन लोगों ने उन्हें खेलते हुए देखा है उन्हें एहसास है कि वे किसी भी गेंदबाज़ की लाइन लेंथ बिगाड़ने की क़ाबिलियत रखते थे.
डीन जोन्स बाद में क्रिकेट कोच भी बनाना चाहते थे और ग्रेग चैपल को जब भारतीय टीम ने कोच बनाया तब वे दूसरे दावेदार थे. 2016 में वे पाकिस्तान के क्लब इस्लामबाद यूनाइटेड्स के हेड कोच भी बने और उनकी टीम ने उस साल पहली बार लीग भी जीत लिया. क्रिकेट में तकनीक के इस्तेमाल पर उनका ज़ोर था. लिहाज़ा आधुनिकतम गैजेट्स की मदद से क्रिकेट के बारीक से बारीक विश्लेषण करने में उनका कोई सानी नहीं था. कभी नेचुरल टैलेंट के दम पर ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट में पहुंचे जोंस समय के साथ खुद को इम्प्रोवाइज़ करते रहे.
इन सबके बीच सबसे बड़ी बात यह रही है कि वे लोगों को चौंकाते रहे, कभी अपने क्रिकेट से तो कभी कमेंट्री से.
बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि क्रिकेट के मैदान में सन ग्लास का इस्तेमाल डीन जोन्स ने ही शुरू किया था. उन्होंने यह तेज़ धूप और धूलकण से बचने के लिए किया था लेकिन तब क्रिकेटरों के लिए विज्ञापन के उतने मौके नहीं थे. उनको सन ग्लास का एड मिल गया था. धूप से बचने के लिए सन क्रीम और बांह तक स्किन कवर पहनने का चलन भी उनकी ही देन था.
जुलाई 2010 में उन्होंने लोगों को यह कहते हुए चौंका दिया था कि एक फ्लाइट अटेनडेंट से उनका नौ साल तक अफ़ेयर रहा और वे एक बेटे के पिता भी हैं जिन्हें उन्होंने कभी नहीं देखा है. डीन जोंस के परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटियां हैं.
ऐसे ही चौंकाते हुए वे दुनिया से चले गए. लेकिन जब तक रहे तब क्रिकेट ही उनका ओढना-बिछौना बना रहा. क्रिकेट से डीन जोन्स को बहुत कुछ हासिल हुआ लेकिन वे भी क्रिकेट को कुछ देने में पीछे नहीं रहे.
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