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कैंसर के ‘जीन कोड’ का पता चला | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीकी वैज्ञानिक स्तन और कोलोन कैंसर के लिए ज़िम्मेदार जेनेटिक कोड को पूरी तरह से समझ पाने में सफल हो गए हैं. इस सफलता के बाद अब कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से पीड़ित लोगों के इलाज में काफ़ी मदद मिल सकती है. इस जेनेटिक मैप से पता चलता है कि लगभग 200 उत्परिवर्तित जीन ऐसे हैं जो ट्यूमर के पैदा होने और बढ़ने में मददगार होते हैं. पहले इस तथ्य से चिकित्सा विज्ञानी अपरिचित थे. 'साइंस' में छपी रिपोर्ट के अनुसार इस खोज से कैंसर के बारे में काफ़ी शुरुआती अवस्था में पता चल पाएगा जिससे डॉक्टरों का काम आसान हो जाएगा. जॉन्स हॉपकिंस किमेल कैंसर सेंटर का कहना है कि अध्ययन के परिणाम सुझाते हैं कि विशेषज्ञ कैंसर को जितना जटिल समझते रहे हैं, यह उससे कहीं अधिक है. एकदम अलग स्तन और कोलोन कैंसर के उत्परिवर्तित जीन लगभग एकदम भिन्न होते हैं. इससे साफ़ है कि दोनों तरह के कैंसर के बढ़ने का तरीका भी बिल्कुल भिन्न होता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा लगता है कि हर ट्यूमर का अलग जेनेटिक ब्लूप्रिंट होता है. शायद यही वज़ह है कि हर मरीज़ में कैंसर का चरित्र अलग-अलग होता है. रिपोर्ट के सहलेखक डॉक्टर विक्टर वेलकूलेस्कू कहते हैं, ‘‘कोई भी दो मरीज़ एक समान नहीं होते.’’ अब वैज्ञानिक इस बात का अध्ययन करेंगे कि स्तन और कोलोन कैंसर में उत्परिवर्तन कैसे होता है. नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के डॉक्टर अन्ना बार्कर का कहना है, ‘‘ किसी भी कैंसर की दवा के विकास के लिए अधिक लक्ष्य उपलब्ध होने से मरीज़ों को ज़्यादा क़ारगर और कम कष्टकारी थेरेपी मिल पाएगी.’’ ब्रिटेन कैंसर रिसर्च के एड यॉग कहते हैं कि यह एक अहम खोज है. इस अध्ययन से ज़्यादातर ऐसे जीनों के बारे में पता चला है जिन्हें पहले कैंसर से नहीं जोड़ा जाता था. | इससे जुड़ी ख़बरें सूर्य की किरणों से सर्जरी31 जुलाई, 2003 | पहला पन्ना कैंसर की पहचान करेगी ब्रा24 मई, 2002 | पहला पन्ना कैंसर का ख़तरा घटाइए20 जुलाई, 2002 | पहला पन्ना चिप्स से कैंसर?26 जून, 2002 | पहला पन्ना दिल की बीमारी का जीन11 अगस्त, 2002 | पहला पन्ना कैंसर की काट03 दिसंबरजनवरी, 2001 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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