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ध्वनि से सात गुना तेज़ रफ़्तार
अल्ट्रा सुपर सोनिक इंजन
उड़ान में सिर्फ़ आठ सेकंड का समय लगा
एक ऐसे नए जैट इंजन का सफल परीक्षण किया गया है जो ध्वनि की गति से सात गुना ज़्यादा तेज़ रफ़्तार से उड़ान भर सकता है.

हैयशॉट-3 नामक इस इंजन का परीक्षण ऑस्ट्रेलिया में एडिलेड शहर के उत्तर में लगभग 500 किलोमीटर उत्तर में किया गया.

यह इंजन 35 किलोमीटर ऊँची उड़ान भरने के बाद पृथ्वी पर वापिस आ गया और इसने रफ़्तार विशेषज्ञों की यह उम्मीद पूरी कर दी कि यह ध्वनि की गति से कई गुना ज़्यादा रफ़्तार से उड़ सकता है.

परीक्षण के दौरान इसकी रफ़्तार 9000 किलोमीटर प्रतिघंटा मापी गई.

उम्मीद की जा रही है कि ब्रिटेन में निर्मित इस इंजन के परीक्षण के बाद अब बहुत तेज़ रफ़्तार वाले हवाई सफ़र के दौर की शुरूआत हो सकती है.

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का एक दल इस परीक्षण के नतीजों का विश्लेषण कर रहा है और यह पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि यह परीक्षण किस हद तक कामयाब रहा है.

वैज्ञानिकों के पास इस जैट इंजन की उड़ान को परखने के लिए सिर्फ़ आठ सेकंड का समय था और इस उड़ान के बाद यह इंजन ज़मीन पर आकर ध्वस्त हो गया.

इसके निर्माण पर दस लाख पाउंड का ख़र्च आया था और इसे ब्रिटेन की रक्षा उपकरण बनाने वाली कंपनी क्वायंटीक्यू ने बनाया था.

महंगा लेकिन अदभुत

इस कंपनी की एक शोधकर्ता रशेल ओवन का कहना था कि ऐसा नज़र आता है कि सबकुछ पूर्व योजना के अनुसार ही हुआ.

इस इंजन को बहुत सरल रखा गया है. इसमें ऐसे कोई पुर्ज़े नहीं लगे हैं जिनका चलना ज़रूरी हो और इसे हाइड्रोजन ईंधन को जलाने के लिए जो ऑक्सीज़न की ज़रूरत होती है उसे यह वायुमंडल से ले लेता है.

अदभुत कामयाबी
 यह सुनिश्चित कर पाना कि उड़ान सही तरीके से हो जाए, एक बहुत ही अदभुत अहसास है. ऐसे परीक्षणों में बहुत ही जटिल और कठिन परिस्थितियों से जूझना होता है.
डॉक्टर एलन पॉल

इसी वजह से यह परंपरागत रॉकेट इंजनों से बिल्कुल भिन्न है क्योंकि इसे अपनी ख़ुद का ऑक्सीज़न भंडार ले जाने की ज़रूरत नहीं है. इसका मतलब है कि इस इंजन का इस्तेमाल करने वाला इंजन ज़्यादा वज़न ले जा सकता है.

हालाँकि स्क्रैमजैट श्रेणी का यह इंजन तब तक काम करना शुरू नहीं करता है जब तक कि यह ध्वनि की गति से पाँच गुना ज़्यादा रफ़्तार नहीं पकड़ लेता.

इसी रफ़्तार पर इस इंजन से होकर गुज़रने वाली हवा पर दबाव बनता है और उसमें उतनी गर्मी हो पाती है कि ईंधन को जला सके. इसी रफ़्तार पर फिर गैसों का इस तरह से चक्र बनता है कि वह इंजन को तेज़ रफ़्तार से आगे की तरफ़ धकेलती हैं.

क्वींसलैंड विश्वविद्यालय में हैयशॉट कार्यक्रम की इस परियोजना के अध्यक्ष डॉक्टर एलन पॉल इस परीक्षण से काफ़ी प्रसन्न थे.

उन्होंने कहा, "यह सुनिश्चित कर पाना कि उड़ान सही तरीके से हो जाए, एक बहुत ही अदभुत अहसास है. ऐसे परीक्षणों में बहुत ही जटिल और कठिन परिस्थितियों से जूझना होता है."

"आप जैसे तलवार की धार पर चल रहे होते हैं और ऐसा परीक्षण कर रहे होते हैं जिसे पहले किसी ने नहीं किया. ऐसे में ग़लतियों की भी बहुत संभावना रहती है."

वर्ष 2006 में इसी तरह के दो और परीक्षण किए जाएंगे.

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