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देर हुई तो..... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गर्भवती होने में किसी महिला को कितना समय लगता है, उसका बच्चे के लिंग से भला क्या संबंध? अगर वैज्ञानिकों की माने तो कोई महिला गर्भ धारण करने में जितना ज़्यादा समय लेती है, उसे लड़का पैदा होने के आसार भी उतने ही बढ़ जाते हैं. डच वैज्ञानिकों ने कुल 5283 ऐसी महिलाओं के बारे में तथ्य जुटाए जिन्होंने 2001 और 2003 के बीच एक बच्चे को जन्म दिया था. ब्रितानी मेडिकल पत्रिका के शोध से पता चला है कि जिन 498 महिलाओं को गर्भवती होने में एक साल से ज़्यादा का समय लगा, उन्हें लड़का होने के आसर लगभग 58 प्रतिशत थे. लेकिन जिन 4785 महिलाओं ने जल्दी गर्भ धारण नहीं किया उन्हें लड़का पैदा होने के आसार 51 फ़ीसदी थे. लड़का या लड़की? शोधकर्ताओं ने स्वभाविक रूप से गर्भधारण के मामले में अपना निष्कर्ष निकाला है. इसके मुताबिक़ गर्भवती होने के लिए लगने वाले हर साल के बदले लड़का होने के आसार भी चार फ़ीसदी ज़्यादा हो जाते हैं. लेकिन कृत्रिम तरीके से गर्भ धारण के मामलों में ये गणित काम नहीं करता. शोधकर्ता डॉक्टर लुक स्मिट्स का कहना है कि उनके शोध से शायद इस बात का जवाब मिल पाए कि दुनिया में लड़कों और लड़कियों की संख्या के बीच फ़र्क़ क्यों है. दुनिया में औसतन 105 लड़कों के मुकाबले 100 लड़िकयाँ हैं. वजह स्पर्म यानि वीर्य में महिला और पुरुष शुक्राणु(वाई) समान मात्रा में होते हैं. लेकिन इस बात के आसार ज़्यादा होते हैं कि पुरुष भ्रूण की गर्भ में ही मौत हो जाए. इसे देखते हुए वैज्ञानिक ये पता लगाने की कोशिश करते रहे हैं कि लड़कियों के मुकाबले लड़कों को जन्म दर ज़्यादा क्यों है. डॉक्टर लुक स्मिट्स का तर्क है कि उनकी जाँच इसी सिंद्बात को बल देती है कि गर्भधारण ‘महिला के सर्विक्स में म्यूकस की चिकनाई’ पर निर्भर करता है. जितनी ज़्यादा चिकनाई होगी, शुक्राणु को म्यूकस में जाने में उतनी ही मुश्किल होगी. वाई यानि पुरुष शुक्राणु हल्के होते हैं. इसलिए अगर महिला देर से गर्भधरण करती है, तो शायद इसका कारण हो सकता है कि उसका म्यूकस ज़्यादा चिकनाई वाला है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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