|
एशियाई हेपेटाइटिस-सी के ख़तरे में | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
शोधकर्ताओं ने कहा है कि ब्रिटेन में रहने वाले एशियाई मूल के हज़ारों लोगों की जिगर की बीमारियों से मौत का ख़तरा है. शोधकर्ताओं का कहना है कि पहली पीढ़ी के ज़्यादातर एशियाई लोग हेपेटाइटिस सी से संक्रमित थे और उनसे पैदा होने वाले बच्चों में इसका ख़तरा बढ़ रहा है जिससे उनके जिगर प्रभावित होते हैं. इससे पहले वैज्ञानिकों का मानना था कि हेपेटाइटिस-सी से संक्रमित लोगों में से सिर्फ़ एक तिहाई में ही सूत्रणरोग पनपता है. बार्ट्स, क्वीन मैरी और रॉयल फ्री हॉस्पिटल के वैज्ञानिकों का यह शोध कार्य क्लीनिकल गैस्ट्रोएंटेरोलोजी एंड हीपाटोलोजी में प्रकाशित हुआ है. हेपेटाइटिस-सी नाम की बीमारी एक ऐसे विषाणु की वजह से होती है जो रक्त के ज़रिए फैलता है और रक्त में ही पलता है. यह संक्रमण कई साल तक बिना पता चले ही फैला रह सकता है लेकिन अगर इसका इलाज नहीं किया जाए तो इससे जिगर को भारी नुक़सान हो सकता है जिसे सूत्रण रोग कहा जाता है. अगर शुरुआती अवस्था में इसका पता चल जाए तो इसका इलाज किया जा सकता है लेकिन अगर समय पर इलाज नहीं हो तो यह जानलेवा भी साबित हो सकता है. इससे पहले के अध्ययनों में कहा गया था कि की सूत्रण रोग उन्हीं लोगों में हो सकता है जो हेपेटाइटिस-सी विषाणु से 20-30 वर्षों तक संक्रमित रहे हों. इस अवस्था तक आते-आते सूत्रणरोग का ख़तरा बीस प्रतिशत हो जाता है. क्वीन मैरी अस्पताल में यकृत विज्ञान विभाग के प्रोफ़ेसर ग्राहम फ़ोस्टर और उनके सहयोगियों की कोशिश रही है कि इस संक्रमण के दीर्घकालीन ख़तरे क्या हो सकते हैं. अपने शोध के तहत उन्होंने 143 ऐसे एशियाई वयस्कों के स्वास्थ्य का अध्ययन किया जो 20-80 साल पहले जब पाकिस्तान या बांग्लादेश में बच्चे के रूप में गए थे तो हेपेटाइटिस-सी विषाणु से संक्रमित हो गए थे. गंभीर ख़तरा इस टीमे ने यह पता लगाने की कोशिश की कि उनमें से कितने लोगों को सूत्रणरोग हुआ और उनकी तुलना उन 239 ब्रितानी मरीज़ों से की जो उनके अस्पताल में भर्ती किए गए. उन्होंने पाया कि जिन एशियाई लोगों को साठ साल से ज़्यादा समय से हेपेटाइटिस-सी का संक्रमण था उनमें से 71 प्रतिशत मरीज़ों को सूत्रणरोग हुआ था. जबकि ब्रितानी लोगों में यह प्रतिशत सिर्फ़ 25 प्रतिशत पाया गया जोकि एशियाई मूल के लोगों से काफ़ी कम था. डॉक्टर फ़ोस्टर का कहना है कि यह पहला मौक़ा है कि इतने बड़े पैमाने पर इस तरह का अध्ययन हो सका है और इस संक्रमण को रोकने के लिए उपाय करने होंगे जिनमें जागरूकता फैलाना भी एक उपाय है. डॉक्टर फ़ोस्टर ने कहा कि ब्रिटेन में रहने वाले एशियाई मूल के लाखों लोग हेपेटाइटिस-सी के संक्रमण के ख़तरे के दायरे में हों. उन्होंने कहा कि पूर्वी लंदन में वे एक कार्यक्रम शुरू कर रहे हैं जिसके तहत हेपेटाइटिस-सी संक्रमण की जाँच की जाएगी. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||