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पाउडर की तरह रखा जा सकेगा ख़ून | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कृत्रिम ख़ून के अणु बनाने के शोध में लगे चिकित्सकों का दावा है कि इससे ख़ून चढ़ाने की प्रक्रिया में क्रांतिकारी परिवर्तन हो सकता है. ख़ून चढ़ाना चिकित्सा की एक सामान्य प्रकिया है और इससे अब तक अनेक लोगों की जान बचाई जा सकी है. लेकिन चिकित्सक संक्रमित ख़ून के ख़तरे से बचने के लिए ख़ून की अप्राकृतिक नक़ल तैयार करने में लगे हैं. ‘यूरो ब्लड् सबस्टीट्यूट प्रोजेक्ट’ के डाक्टर केन लोवे ने बीबीसी से बातचीत में बताया है कि कृत्रिम ख़ून के सभी पहलुओं की भली-भांति जाँच की जाएगी. ख़ून चढ़ाने की वर्तमान प्रकिया में बहुत कुछ व्यर्थ चला जाता है. ब्रिटेन में तो दस प्रतिशत ख़ून रोगियों तक पहुँच ही नहीं पाता. यह काफ़ी ख़र्चीला भी है. एक यूनिट ख़ून को निकालने, उसकी जाँच और संभाल में लगभग दस हज़ार रुपये का ख़र्च आता है. ख़ून की जाँच का काम शुरु होने से पहले कई हज़ार लोग संक्रमित ख़ून की वजह से एचआईवी संक्रमण का शिकार हो गए. एड्स महामारी के कारण भी ख़ून चढ़ाए जाने की प्रक्रिया को भारी धक्का लगा है. कृत्रिम ख़ून में उसके संक्रमित न होने की गारंटी रहेगी. डाक्टर केन लोवे का कहना है कि उन देशों में कृत्रिम ख़ून के कारण क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाएगा जिन देशों में प्राकृतिक ख़ून के संक्रमित होने की क़ाफी संभावना रहती है. गाय के रक्त का इस्तेमाल दक्षिण अफ्रीका में गाय के रक्त से निकाले गए रक्त उत्पाद को पहले से ही काम में लाने की अनुमति दी जा चुकी है. अप्राकृतिक ख़ून से ख़ून चढ़ाने की परंपरागत प्रक्रिया से जुड़ी कई समस्याओं का समाधान किया जा सकता है. इस समय रक्तदान से एकत्र किए गए प्राकृतिक ख़ून को केवल 35 दिन के भीतर ही काम में लाया जा सकता है. उसके बाद उसे फैंकना पड़ता है. इस ख़ून को संभाल कर रखने के लिए उसे कम तापमान पर रखा जाना भी ज़रुरी होता है, जबकि नए अप्राकृतिक ख़ून को एक साल तक इस्तेमाल में लाया जा सकता है और इसके लिए तापमान की भी कोई समस्या नहीं होती. ऐसेक्स विश्वविद्यालय में बायो-कैमिस्ट्री के प्रोफेसर और ‘यूरो ब्लड् प्रोजेक्ट’ से जुड़े क्रिस कूपर का कहना है, “हम पाउडर वाले दूध की तरह ही पाउडर वाला ख़ून बनाने में जुटे हैं. इसे पैकेट में रखा जा सकेगा और ज़रुरत पड़ने पर तरल किया जा सकेगा.” रक्त में हीमेग्लोबिन नाम का प्रोटीन पाया जाता है जो उसे लाल रंग प्रदान करता है. लाल रक्त कोशिकाओं में कई हीमियोग्लोबिन अणु जुड़े रहते हैं और इन्हीं के ज़रिए आक्सीजन और कार्बनडाईआक्साइड हमारे शरीर तक पहुँचती और निकलती है. डाक्टर लोवे का कहना है, “अप्राकृतिक रक्त वास्तव में ग़लत नाम है. हम पूरी तौर पर ख़ून का दूसरा रुप बनाने की बजाए ऐसा पदार्थ बनाने में लगे हैं जो अप्राकृतिक रुप से आक्सीजन ले जाने का काम करे, रक्त चूंकि कई पदार्थों का एक जटिल मिश्रण है और शरीर में उत्तकों तक आक्सीजन ले जाने के अलावा उसके कई और काम भी हैं.” रक्त के इस स्थानापन्न पदार्थ को सीधे शरीर में चढ़ा दिया जाएगा और इससे अप्राकृतिक हीमोग्लोबिन को समेट कर ले जाने के लिए जटिल अप्राकृतिक रक्त कोशिकाओं को बनाने की ज़रुरत नहीं रह जाएगी. ख़ून के विकल्प कृत्रिम ख़ून बनाने के शोध को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है. अमरीका के शोधार्थी ‘फलेरोकार्बन्स’ रक्त का कृत्रिम विकल्प बनाने में जुटे हैं. यह रसायन ‘टेफ़लान’ से मिलते-जुलते है, जो रसोईघर में काम आने वाले नॉन-स्टिक बर्तनों पर लगा रहता है. इन रसायनों में बड़ी मात्रा में आक्सीजन को घोल लेने की क्षमता होती है.
इस तरह के कृत्रिम पदार्थों को कई देशों में शल्यचिकित्सा के दौरान इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी गई है, लेकिन इन पदार्थों को संग्रह कर के रखना एक बड़ी समस्या है. उधर यूरो ब्लड सबस्टीट्यूट ग्रुप ने दूसरा रास्ता अपनाया है. इसके तहत शरीर मे उत्तकों तक आक्सीजन ले जाने के प्राकृतिक तरीक़े का स्थानापन्न तैयार करना है. डाक्टर लोवे के अनुसार हीमोग्लोबिन की तरह के कुछ प्रोटीनों का विकास किया गया है जो कि ख़ून से भी बेहतर हैं. उनका कहना है कि मुख्य बाधा इस तरह बनाए गए हीमोग्लोबिन की काम में लाई जाने वाली मात्रा का विकास करना है. डाक्टर लोवे का कहना है कि हमारी सोच का अनूठापन यह है कि हम ख़मीर जैसे सूक्ष्म जीवाणुओं का इस्तेमाल करेंगें. उन्हें आशा है कि इस तरह के कृत्रिम ख़ून को बड़ी मात्रा में उसी प्रकार से बनाया जा सकेगा जिस तकनीक से मधुमेह के रोगियों के लिए इंसुलिन का उत्पादन किया जाता है. प्रोफेसर कूपर का मानना है कि मुझे पूरा विश्वास है कि आने वाले दस वर्षों में बाज़ार में ख़ून की तरह के कई दूसरे पदार्थ उपलब्ध होंगें जिनका इस्तेमाल असली ख़ून की तरह किया जा सकेगा. |
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