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जलवायु परिवर्तन से बढ़ेंगे मरुस्थल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के एक शोध में कहा गया है कि अफ्रीका में ग्लोबल वार्मिंग यानी तापमान बढ़ने के कारण हरी भरी ज़मीन मरुस्थल में बदल सकती है. शोध में जलवायु परिवर्तन के कारण ज़मीन के आकार प्रकार में होने वाले परिवर्तनों पर पहली बार ध्यान केंद्रित किया गया था. प्रतिष्ठित नेचर पत्रिका में छपे इस शोध के अनुसार कालाहारी मरुस्थल की रेत बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण और क्षेत्रों में फैल सकती है और हरी भरी ज़मीन मरुस्थल में तब्दील हो सकती हैं. इसमें कहा गया है कि अगर खेती योग्य ज़मीन मरुस्थल में बदलने लगी तो इसके घातक सामाजिक परिणामों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. प्रोफ़ेसर डेविड थॉमस के नेतृत्व में किए गए यह शोध किया गया है. इस दल ने नेताओं से अपील की है कि ऐसे नीतियों को बढ़ावा न दें जिनसे खेती योग्य ज़मीन मरुस्थल में बदलने का डर है. प्रोफ़ेसर थॉमस ने बीबीसी से कहा, "हमने बोत्सवाना में देखा है कि यूरोपीय संघ की मदद से उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है जिसका फ़ायदा पूरे देश को हुआ है. अगर रेत का बढ़ना जारी रहा तो विकास की सारी योजनाएँ धरी की धरी रह जाएंगी." आँकड़ों की पड़ताल ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय की इस टीम ने कंप्यूटर के तीन अलग-अलग मॉडलों के ज़रिए अगले दशक में जलवायु परिवर्तन संबंधी जानकारी देने वाले आँकड़े एकत्र किए हैं. इन आँकड़ों का इस्तेमाल इस टीम ने कालाहारी मरुस्थल से जोड़ कर किया. इसमें पाया गया कि अगर बारिश कम होती रही, तेज़ सूखी हवाएँ लंबे समय तक चलती रहीं तो कालाहारी की रेत आगे बढ़ेगी जिससे ज़मीन पर रेत ही रेत फैल जाएगी. बदलती दुनिया टीम का कहना है कि ज़मीन के आकार प्रकार में इस तरह के परिवर्तन का पूरी दुनिया पर असर पड़ेगा. थॉमस कहते हैं, "हमने ग्लेशियरों यानी हिमनदों के पिघलने और तटीय इलाक़ों के बदलाव पर बहुत ध्यान दिया है लेकिन अफ्रीका पर किसी का ध्यान नहीं गया है और इस मसले की गंभीरता को को समझने की कोशिश नहीं की गई है. " दुनिया के आठ धनी देशों के संगठन - जी8 की बैठक छह जुलाई से स्कॉटलैंड में हो रही है जहाँ अफ्रीका के विकास और जलवायु परिवर्तन पर चर्चा होनी है. |
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