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चेचक पर अनुसंधान के संबंध में चर्चा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विश्व स्वास्थ्य संगठन की जिनेवा में बैठक हो रही है जिसमें चेचक वायरस पर और अनुसंधान की अनुमति दिए जाने के संबंध में चर्चा होगी. स्वास्थ्य संगठन की इस बैठक में 192 सदस्य देश हिस्सा ले रहे हैं और इसमें वायरस के जेनेटिक बदलाव की सिफ़ारिश पर चर्चा होगी. वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे इस बीमारी के इलाज में तेजी आएगी. जबकि आलोचकों का कहना है कि चेचक को समाप्त करने का एक ही तरीक़ा है कि इसके वायरस के नमूने नष्ट कर दिए जाने चाहिए. चेचक एक बेहद ख़तरनाक बीमारी रही है और इसने दशकों तक लोगों की जान ली है. चेचक का शिकार होने वाले क़रीब तीस प्रतिशत मरीज़ मौत के मुँह में चले जाते हैं और जो जीवित बचते हैं वे चेचक के दाग़ों के शिकार हो जाते हैं. चेचक छूत की बीमारी है और इसका विषाणु तेज़ी से फैलता है भयावह रूप ग़ौरतलब है कि 1980 में चेचक को दुनिया से ख़त्म हो चुकी बीमारी के रूप में घोषित कर दिया गया था. दरअसल 2001 में अमरीका के तीन महत्वपूर्ण बाज़ारों में जो जैविक पदार्थों का इस्तेमाल करके हमले किए गए थे वहाँ से चेचक के हमलों की आशंका ने जन्म लिया था. समस्या यह थी कि चेचक से बचने के लिए पर्याप्त दवाइयाँ नहीं थी जिसके लिए सरकार को लोगों के ज़बर्दस्त विरोध का सामना करना पड़ा था. 1980 में जब से चेचक को समाप्त घोषित किया है तब से चेचक के विषाणु आधिकारिक रूप से सिर्फ़ दो जगह रखे जा रहे हैं. ये हैं अमरीका का बीमारी नियंत्रण केंद्र और साइबेरिया का वेक्टर संस्थान. |
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