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ख़तरनाक वायरस को नष्ट करने का आदेश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 18 देशों में चार हज़ार प्रयोगशालाओं से अनुरोध किया है कि वे इनफ़्लुएंज़ा वायरस के उन ख़तरनाक नमूनों को नष्ट कर दें जो एक संगठन ने उन्हें ग़लती से भेज दिए थे. ये वो 'एशियन फ़्लू' वायरस है जिससे पूरी दुनिया में 1957 में लगभग 40 लाख लोगों की मौत हो गई थी. लेकिन ये वायरस 1968 में लुप्त हो गया. विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेषज्ञ क्लॉस स्टोहर ने बीबीसी को बताया कि 1968 के बाद पैदा होने वाले किसी भी व्यक्ति के शरीर में इस वायरस से लड़ने की क्षमता नहीं होगी. उनका कहना था, "यदि इस वायरस का संक्रमण होता है तो वह बहुत जल्दी से फैल जाएगा." उनका कहना था कि इससे पूरी दुनिया में खलबली मच सकती है, चाहे ऐसा होने की संभावना कम है. कॉलेज ऑफ़ अमेरिकन पैथोलोजिस्ट्स नाम के अमरीकी संगठन ने ये नमूने भेजे थे. इस संगठन ने माना है कि ये एक ग़लती थी और इससे सबक सीखने की ज़रूरत है. ये अधिकतर प्रयोगशालाएँ अमरीका में हैं और केवल 61 ही अमरीका के बाहर हैं. फ़िलहाल उन देशों की विस्तृत सूची नहीं दी गई है जिन्हें ये वायरस भेजा गया है लेकिन इसमें यूरोप, एशिया और मध्य पूर्व के देश शामिल हैं. |
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