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क्यों नहीं आँसू बहाते पुरुष? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ऐसा क्यों है कि महिलाएँ अपनी तकलीफ़ पर खुल कर रो लेती है जबकि पुरुष आँसू बहाना कमज़ोरी की निशानी मानते हैं? मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि पुरुष ग़लत सोचते हैं. वॉरिक विश्विद्यालय के प्रोफ़ेसर बर्नार्ड कैप का कहना है पुरुष अपनी भावनाओं को जिस तरह दबा कर रखते हैं वह उनकी सेहत के लिए बहुत नुक़सानदेह है. उनका कहना है कि वैसे इस बात को लेकर समाज के अलग-अलग वर्गों में अलग-अलग विचारधाराएँ हैं. "समाज के ऊँचे तबक़ों मे जबकि रोना शर्म की बात है निचले वर्गों में ऐसा नहीं है". प्रोफ़ेसर कैप का कहना है, "कुछ लोग अपनी भावनाओं पर क़ाबू रखना और किसी के सामने आँसू न बहाना मर्दानगी की निशानी मानते हैं".
खेल में हार पर आँसू हालाँकि फ़ुटबॉल मैच के बाद प्रशंसकों और खिलाड़ियों का आँसू बहाना अब एक आम सी बात होती जा रही है. एक अन्य मनोवैज्ञानिक रॉन ब्रेसी का कहना है कि अब पुरुष अपनी भावनाओं का खुल कर इज़हार करने लगे हैं. लेकिन कुछ को अब भी यही लगता है कि इससे दुनिया की नज़रों में आपकी इज़्ज़त घट जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं है. वह उन आग बुझाने वाले कर्मचारियों की मिसाल देते हैं जो 11 सितंबर, 2001 के हमले के बाद लोगों को बचाते-बचाते अपनी भावनाओं पर क़ाबू नहीं रख पाए थे. ब्रेसी कहते हैं, "सब का यही मानना है कि वे बहादुर लोग थे. उनकी भावनाएँ बनावटी नहीं, असली थीं". वह कहते हैं कि पुरुष जिस तरह अपनी भावनाओं को दबाए रखते हैं उससे कई बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं. रोना एक थेरेपी ब्रेसी एक थेरेपी के दौरान पुरुषों को रोने के लिए प्रेरित करते हैं. उनका कहना है कि मेरे जो मरीज़ दिल खोल कर रो लेते हैं उनका कहना है कि वे बाद में बहुत बेहतर महसूस करते हैं. आपने कई जगह हँसने वाले क्लब देखे होंगे जिनके सदस्य किसी पार्क में एकत्र हो कर दिल खोल कर क़हक़हे लगाते हैं. अब अगर आपको ऐसे रोने वाले क्लब नज़र आएँ जिसके सदस्य दहाड़ें मार कर रोते पाए जाएँ तो हैरान मत होइएगा. |
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