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गुरुवार, 29 अप्रैल, 2004 को 16:45 GMT तक के समाचार
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गर्मियों में पैदा माँओं के बच्चे कम
नवजात शिशु
शोधकर्ताओं ने कई शिशुओं के बारे में पूरी जानकारी ली.
अध्ययनकर्ताओं के मुताब़िक जो महिलाऐं गर्मी के महीनों में पैदा होती हैं, उनके बच्चों की संख्या अन्य महीनों में पैदा हुई महिलाओं के मुक़ाबले कम होती है.

ऑस्ट्रिया की यूनिवर्सिटी ऑफ विएना के अध्ययनकर्ताओं का दावा है कि आधुनिक गर्भनिरोधक तरीक़ों के इस्तेमाल के बावजूद इस तथ्य में सच्चाई है.

ह्यूमन रिपरोडक्शन जरनल के लेख में उन्होंने कहा है कि ये खोज पिछले कुछ सालों में जनसंख्या में हो रहे बदलाव को दर्शाता है.

हालाँकि उन्होंने ये भी साफ़ किया कि बच्चा न होने की समस्या का किसी भी महीने से लेना-देना नहीं है.

अध्ययनकर्ताओं ने 45 साल की उम्र से ऊपर की ऑस्ट्रिया की 3000 महिलाओं पर नज़र डाली.

उन्हें पता चला कि औसतन जून और अगस्त के दौरान पैदा होने वाली महिलाओं के बच्चों की संख्या दूसरों के मुक़ाबले कम थी.

जुलाई में पैदा होने वाली महिलाओं के बच्चों की संख्या दिसंबर में पैदा होने वाले बच्चों की तुलना में 0.3 प्रतिशत कम थी.

इसके अलाव कनाडा और हॉलैंड में हुए अध्ययन भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि गर्मियों में पैदा होने वाली माँऐं कम बच्चे पैदा करती हैं.

भ्रूण विकास

रिसर्च टीम की अगुवाई करने वाली विएना की यूनिवर्सिटी ऑफ वेटेरिनरी मेडिसिन की डॉ सुज़ैन ह्यूबर

कहती हैं, "इससे संकेत मिलता है कि आधुनिक जीवन के प्रभाव और गर्भनिरोधक तरीक़ों के इस्तेमाल के बावजूद पहले की और अभी की महिलाओं की प्रजनन क्षमता पर महीनों का असर पड़ता रहा है."

उन्होंने बीबीसी न्यूज़लाईन को बताया कि जन्म के माह और प्रजनन प्रक्रिया के बीच संबंध होने के कई कारण हो सकते हैं.

लेकिन, उन्होंने कहा, "भ्रूण विकास और बचपन की स्थितियों ही जनन क्षमता पर असर डालती हैं."

"इस शुरूआती विकास के दौरान के हालात प्रजनन क्रिया को प्रभावित कर सकते हैं."

"गर्म इलाक़ों में मौसम के साथ ही बाहर का तापमान बदलता रहता है. इसलिए जीवन के शुरूआती दौर के हालात बदलते मौसम और सामाजिक परिवेश से प्रभावित होते हैं. इससे विकास पर असर पड़ता है, जो आगे चलकर जीवन की दूसरी गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है."

अब अध्ययनकर्ता इस बात पर भी शोध करना चाहते हैं कि महिलाओं की भविष्य की प्रजनन क्षमता पर अपनी माँ के गर्भ में रहने के समय का ज़्यादा असर पड़ता है या ज़िन्दगी के शुरूआती दौर का.

लेकिन ब्रिटिश फ़र्टिलिटी सोसायटी के डॉ मार्क हैमिलटन का कहना है कि प्रजनन के ऐसे मौसमी चलन इंसानों की जगह पशुओं में ज़्यादा देखे जाते हैं.

 लेकिन इंसानों में अगर इस तरह का अंतर होगा भी तो बहुत थोड़ा ही होगा.
डॉ मार्क हैमिल्टन, ब्रिटिश फ़र्टिलिटी सोसायटी

"इसलिए हिरण जैसी प्रजातियों में इसके उदाहरण मिलते हैं. इनमें पतझड़ के समय कामोन्माद आरंभ होता है, जिससे मादाऐं गर्भधारण करती हैं और बसंत तक बच्चे पैदा होते हैं. "

"लेकिन इंसानों में अगर इस तरह का अंतर होगा भी तो बहुत थोड़ा ही होगा. ख़ासतौर पर इस युग में जब आप कहीं भी आसानी से जा सकते हैं और खाना-पीना और स्वास्थ्य सुविधाऐं आपको आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं तो इस तरह के चलन के कोई मायने नहीं रह जाते. "

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