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मनुष्य चिम्पांज़ी से बेहतर क्यों | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इस संसार में मनुष्य से सबसे ज़्यादा समानता रखने वाला कोई जीव है तो वो है चिम्पांज़ी. लेकिन एक ओर कई समानताओं पर आप आश्चर्यचकित हो सकते हैं तो दोनों में कई अंतरों से भी आप मुँह नहीं मोड़ सकते. अब वैज्ञानिक इसका पता लगाने के लिए अपना सर खपा रहे हैं कि इतनी समानता होने के बावजूद किसी चीज़ को जानने-समझने और उस पर अपनी पारखी नज़र रखने का मानव गुण चिम्पांज़ी में क्यों नहीं. जर्मनी के वैज्ञानिक जल्द ही मनुष्य और चिम्पांज़ी के जीन में अंतर को लेकर अपने शोध के पहले नतीजे का ऐलान करने वाले हैं. वैज्ञानिकों की यह टीम यह जानने की कोशिश कर रही है कि इन दोनों की जीन आकृतियों में इतनी समानता के बावजूद मनुष्य ने अपने ख़ास गुणों का कैसे विकास कर लिया है. अंतर लाइपज़िग के मैक्स प्लैंक इंस्टीच्यूट के प्रोफ़ेसर स्वांके पाबे मनुष्य और चिम्पांज़ी की जीन आकृतियों की तुलना में जुटे हैं. उनका कहना है कि इनकी जीन आकृतियों में छोटा लेकिन महत्वपूर्ण अंतर पाया गया है. पाबे बताते हैं कि सबसे बड़ा अंतर हमारे सूँधने की शक्ति है. उन्होंने बताया, "हमें मनुष्य के सभी जीनों के 15 प्रतिशत हिस्सों में वो चीज़ नहीं मिली जो सूँधने के लिए हमारी नाकों में आने वाली गंधों की कोडिंग करते हैं. यानी हमारी सूँधने की शक्ति उनसे कम है." लेकिन मनुष्य के जीन में कई अच्छी चीज़े भी पाई गईं. मनुष्य बोली और भाषा के स्तर पर चिम्पांज़ियों से बेहतर है. शोध के क्रम में बोली और भाषा से जुड़े जीनों में दो तरह का अंतर पाया गया और यह बदलाव क़रीब दो लाख साल पहले हुआ जब पहली बार आधुनिक मानव का विकास हो रहा था. पाबे ने बताया कि एक और ख़ास जीन का अध्ययन किया जा रहा है जिसमें ऑक्सफ़ोर्ड के वैज्ञानिक भी सहयोग कर रहे हैं. प्रोफ़ेसर पाबे ने बताया कि इस शोध से वैज्ञानिकों को मानव जाति की विशेषता और उसका जीन से संबंध के बारे में नई जानकारियाँ मिलेंगी. |
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