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गुरुवार, 22 जनवरी, 2004 को 21:52 GMT तक के समाचार
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अब किसानों के लिए भी कॉल सेंटर
खेतों में काम करते लोग
किसानों को समस्याओं के हल मुफ़्त में सुलझाए जाएँगे

भारत के लाखों किसान फसलों और मवोशियों की बीमारियों से निपटने के लिये अब एक अनोखे मित्र पर भरोसा कर सकेंगे.

भारत के किसान अब एक सरकारी योजना के तहत उस सहूलियत का फायदा उठा सकेंगे जो भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास का एक महत्वपूर्ण प्रतीक हैं, और वो हैं – कॉल सेंटर.

इस नि:शुल्क सेवा के अंतर्गत किसान, कृषि विज्ञान की पढ़ाई कर रहे लोगों से बात कर पाएंगे जो उन्हें खेती से जुड़ी समस्याओं पर सलाह देंगे.

इसमें ख़ास बात यह है कि ये कई भाषाएँ बोल सकते हैं.

लेकिन किसानों को एक संदेह है कि यह सब एक राजनैतिक चाल का हिस्सा है जो चुनावों के नज़दीक आने के कारण चली जा रही है.

दावा

भारत की अधिकतर जनता गाँवों में रहती है और खेतीबाड़ी पर निर्भर है.

कॉल सेंटर के अतिरिक्त, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किसानों के लिए एक नया टेलीविज़न और रेडियो कार्यक्रम भी शुरु किया है.

फसल कटने के बाद
किसान यूनियनों को लगता है कि यह राजनीतिक चाल भी हो सकती है

इस कार्यक्रम का लक्ष्य है किसानों को खेतीबाड़ी, बाग़बानी और पशु-पालन के नए और बेहतर तरीक़ों से परिचित कराना.

कृषि राज्य मंत्री हुकमदेव नारायण यादव ने बीबीसी को बताया कि यह पूरे राष्ट्र और ख़ासकर कृषि क्षेत्र में एक ऐतिहासिक क़दम होगा.

उन्होंने कहा, "ये कार्यक्रम और कॉल सेंटर कृषि उद्योग की ओर देश की प्रगति में अहम भूमिका निभाएंगे."

इस सेवा के लिए कुल मिला कर आठ कॉल सेंटर उपलब्ध होंगे और सभी पूरे सप्ताह खुले रहेंगे.

ये सेंटर देश के हर प्रांत की समस्याओं पर ध्यान देंगे और पैकेजिंग, बीजों के प्रकार, यातायात और उत्पादन के भंडारण जैसी विभिन्न समस्याओं पर सवाल हल किये जाएंगे.

सेंटर के अधिकारी किसानों को अंकित मूल्य और उनके उत्पादन की प्रवृति की जानकारी भी देंगे.

इस योजना से जुड़े राहुल भंडारी ने कहा, "यदि कोई समस्या फ़ोन पर न सुलझाई जा सकी, तो उन्हें विशेषज्ञों तक पहुँचाया जाएगा और समस्याओं को फ़ोन, खेतों या व्यक्तिगत मुलाक़ातों से सुलझाया जाएगा."

लेकिन....

लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी फ़ोन की सुविधा है, सभी किसानों की मुश्किलों का समाधान करना कठिन होगा.

दिल्ली के कृषि वैज्ञानिक अभिजीत सेन कहते हैं कि टेलीविज़न और रेडियो से काफी सहायता मिल सकती है.

शायद इसी को ध्यान में रखकर दूरदर्शन सप्ताह में छह दिन एक घंटे का कृषि से जुड़े कार्यक्रमों का प्रसारण करेगा और एफएम रेडियो स्टेशन भी ऐसे प्रसारण के लिये तैयार हैं.

अधिकारियों का कहना है कि ये कार्यक्रम प्रादेशिक भाषाओं में होंगे.

लेकिन किसान यूनियनों का कहना है कि ये सब चुनावों से पहले की राजनैतिक चाल है.

उनका कहना है कि सरकार को टेलिविज़न और रेडियो के चैनल शुरु करने की जगह कृषि उत्पादों के दाम कम करने पर ध्यान देना चाहिए.

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