|
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विश्व स्वास्थ्य संगठन पर मलेरिया को लेकर आरोप
विश्व स्वास्थ्य संगठन पर आरोप लगा है कि उसने अमरीका और अन्य देशों के दबाव में अफ़्रीकी देशों में मलेरिया की प्रभावी दवा उपलब्ध नहीं कराई. ब्रिटिश मेडिकल जर्नल 'लैनसेट' में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है जिसमें वैज्ञानिकों ने आरोप लगाया है कि बाज़ार में उपलब्ध सबसे प्रभावी दवाओं के बजाए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कम असरदार दवाएँ उपलब्ध कराईं. वैज्ञानिकों का कहना है कि क्लोरोक्विन और सल्फ़ाडोक्सिन-पाइरिमैथामाइन जैसी दवाएँ अब असरदार नहीं रही हैं. शोध से पता चला है कि आर्टेमिसिनिन क्लास कॉबीनेशन थेरेपी यानी एसीटी मलेरिया में काफ़ी असरदार रही है. लेकिन ये क्लोरोक्विन से लगभग दस गुना महँगी है और आरोप है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसलिए एसीटी का इस्तेमाल नहीं किया. रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके कारण अफ़्रीका में हज़ारों बच्चों की मलेरिया के कारण मौत हो गई. लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन के अधिकारी इस आरोप से इनकार करते हैं. उनका कहना है कि वर्ष 2001 से विश्व स्वास्थ्य संगठन अफ़्रीकी देशों को प्रोत्साहित कर रहा है कि वे एसीटी का इस्तेमाल करें. मलेरिया से मौत विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1998 में एक अभियान छेड़ा था कि 2010 तक मलेरिया के कारण होने वाली मौतों को आधा किया जा सके. मच्छरों से पैदा होने वाली इस बीमारी से हर साल दुनियाभर में क़रीब 10 लाख लोगों की मौत हो जाती है. अफ़्रीका इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित है और यहीं इस बीमारी से सबसे अधिक मौतें भी होती हैं. पुरानी मलेरिया रोधी दवाओं के उतने प्रभावकारी न होने के कारण अफ़्रीका में मृत्यु दर बढ़ रही है. यहाँ ज़्यादा बच्चों की मौत एड्स से नहीं, बल्कि मलेरिया के कारण होती है. मलेरिया के ख़िलाफ़ कई तरह की परियोजनाओं और कार्यक्रमों से जुड़े लोगों का मानना है कि अब भी इसके लिए ज़रूरी सहायता नहीं मिल पा रही है. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||