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इटर: तलाश अनंत ऊर्जा के स्रोत की
इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर(इटर) परियोजना यूरोपीय संघ, कनाडा, जापान, रूस, चीन और दक्षिण कोरिया का साझा उद्दम है. इस परियोजना का उद्देश्य है एक दशक के भीतर एक परमाणु संलयन रिएक्टर बनाना. इस फ़्यूज़न रिएक्टर पर पाँच अरब डॉलर की लागत आएगी. इटर के ज़रिए परमाणु संलयन के क्षेत्र में अब तक हुए प्रयोगों को व्यावसायिक उत्पादन के चरण में बदलने की कोशिश की जाएगी. संलयन की प्रक्रिया परमाणु संलयन ही वह प्रक्रिया है जिससे सूर्य समेत तमाम तारों को ऊर्जा मिलती है. सूर्य की बात करें तो उसका केंद्र एक परमाणु संलयन भट्टी की तरह काम करता है. सूर्य के केंद्र में भयानक दबाव की स्थिति और डेढ़ करोड़ डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा का तापमान परमाणु नाभिकों को आपस में जुड़ने के लिए बाध्य करता है. और इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है. कोई चालीस लाख टन पदार्थ प्रति सेकेंड प्रकाश के रूप में परिवर्तित होता है. कृत्रिम परमाणु संलयन कृत्रिम परमाणु संलयन के लिए नाभिकीय संयंत्र या रिएक्टर में ड्यूटेरियम और ट्रिटियम को ईंधन के रूप में प्रयोग में लाया जाता है.
ये दोनों तत्व हाइड्रोजन परमाणु के ही विशेष प्रकार हैं. इन कणों को क़रीब 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस तापमान पर गर्म किया जाता है. इतने ज़्यादा तापमान की ज़रूरत इसलिए पड़ती है क्योंकि धरती पर सूर्य के केंद्र में मौजूद भारी दबाव की स्थिति पैदा किया जाना असंभव है. इस तापमान पर ड्यूटेरियम और ट्रिटियम आपस में मिल कर हीलियम अणु का निर्माण करते हैं. और इसी के साथ तेज़ गति के न्यूट्रॉन मुक्त हुए हैं. नाभिकीय संलयन पर आधारित बिजली संयंत्र में ऐसी व्यवस्था होगी कि न्यूट्रॉनों को अतिसक्रियता से पैदा होने वाली गर्मी को विद्युत टरबाइन चलाने में इस्तेमाल किया जा सके. फ़ायदे परमाणु संलयन की प्रक्रिया से बिजली पैदा करना कई कारणों से पारंपरिक परमाणु ऊर्जा से बेहतर है जिसमें कि परमाणु विखंडन के सिद्धांत को अमल में लाया जाता है. संलयन भट्टी में समुद्र के सामान्य जल को ईंधन के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है. ऐसे संयंत्र से न तो कोई ग्रीन हाउस गैस पैदा होगा और न ही रेडियोधर्मी कचरे की समस्या सामने आएगी. लेकिन तमाम फ़ायदों के बावजूद परमाणु संलयन को आसानी से प्रयोग में ला सकने की तकनीक अभी तक सामने नहीं आ पाई है. |
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