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सोमवार, 24 नवंबर, 2003 को 06:29 GMT तक के समाचार
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अब टेढ़े नहीं होंगे शीशम के पेड़

शीशम का नया क्लोन
कई जगह से शीशम लेकर नया क्लोन तैयार हुआ है

अब टेढ़े-मेढ़े नहीं होंगे शीशम के पेड़. देहरादून स्थित भारतीय वन अनुसंधान में शीशम का ऐसा क्लोन तैयार किया गया है जिससे पेड़ न केवल बिल्कुल सीधे होंगे, जल्दी बढ़ेंगे बल्कि उनमें कीड़े भी नहीं लगेंगे.

इस क्लोन को भारतीय वन अनुसंधान यानी एफ़आरआई के वैज्ञानिकों ने छह साल की कड़ी मेहनत के बाद तैयार किया है.

उन्हें इस योजना के लिए विश्व बैंक से आर्थिक मदद मिली थी.

एफ़आरआई में वनस्पतियों के शरीर विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉक्टर टीसी पोखरियाल बताते हैं, "हमने जम्मू-कश्मीर, नेपाल, असम और हिमालय की तराई जहाँ-जहाँ भी शीशम होते हैं, शीशम के बेहतरीन क्लोन जमा किए."

उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक भाषा में इन पेड़ों को सीपीटी यानी कैंडिडेट प्लस ट्री कहते हैं. ऐसे पेड़ हज़ारों लाखों में एक होते हैं.

सफल प्रयोग

पोखरियाल ने बताया कि इनसे क्लोन पदार्थ लेकर एक नया क्लोन तैयार किया गया और अब परिणाम आपके सामने है.

 हमने जम्मू-कश्मीर, नेपाल, असम और हिमालय की तराई जहाँ-जहाँ भी शीशम होते हैं, शीशम के बेहतरीन क्लोन जमा किए

टीसी पोखरियाल

उनका कहना है कि क्लोनिंग की इस विधि से शीशम के पेड़ों के टेढ़े-मेढ़े होने की अनुवांशिक समस्या सुलझ गई है क्योंकि क्लोनिंग से तैयार पौधा चाहे जिस भी पर्यावरण में पनपेगा उनके तने बिल्कुल सीधे होंगे.

शीशम का वैज्ञानिक नाम डैलबर्जिया सीसो है. टिकाऊ और सस्ती होने के कारण सागवान के बाद शीशम ही देश में सबसे ज़्यादा प्रचलित इमारती लकड़ी है. वर्तमान में इसके दो या तीन प्रतिशत पेड़ ही सीधे होते हैं.

ज़्यादातर पेड़ों के टेढ़े-मेढ़े होने और उनमें अधिक शाखाएँ निकल जाने के कारण उनसे कम मात्रा में उपयोगी लकड़ी हासिल हो पाती है.

अगर उपज के आँकड़ों को देखें तो शीशम की उत्पादकता अब तक हर साल 0.5 से 1.5 घन मीटर प्रति हेक्टेयर रही है.

अब इस क्लोन से तैयार पेड़ों की उत्पादकता हर साल तीन घन मीटर प्रति हेक्टेयर से कहीं ज़्यादा होगी.

फ़ायदा

इस परियोजना पर काम कर रहे वनस्पतिशास्त्री डॉक्टर सुभाष नौटियाल कहते हैं, "अधिक उत्पादकता के साथ-साथ इस क्लोन का फ़ायदा ये भी है कि कि यह थोड़े समय ही बाद बढ़ जाएगा और इसमें कीड़े भी नहीं लगेंगे."

डॉक्टर नौटियाल बताते हैं कि क्लोन पदार्थ के चयन की ये प्रक्रिया अभी आगे भी चल रही है और किस पर्यावरण में कौन सा क्लोन ज़्यादा बेहतर रहेगा इस लिहाज से भी पौधे तैयार किए जा रहे हैं.

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि बड़े पैमाने पर इन पौधों को लगाए जाने के बाद जंगलों पर आबादी का दबाव कम हो सकेगा और विदेशों से महंगी लकड़ी के आयात की समस्या भी हल हो सकेगी.

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